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भीतर छिपी रचनात्मकता की पुकार सुनें: भावनाओं के स्पंदन को समझना जरूरी
वासिलिविच कैंडिंस्की
Published by: Nitin Gautam
Updated Tue, 10 Mar 2026 07:35 AM IST
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सार
यदि कलाकार के भीतर सच्ची अनुभूति नहीं है, तो उसकी रचना सजावटी चीज बनकर रह जाती है, किंतु जब सृजन भीतर की आवश्यकता से प्रेरित होता है, तब वह दर्शक की आत्मा में सोए हुए कलाकार को जगा देता है।
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- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
रंग एक ऐसी शक्ति है, जो सीधे आत्मा को छूती है। रंग स्वयं एक जीवंत कंपन है। रंग ही कुंजी-पटल है, आंखें उसके हथौड़े हैं, और आत्मा अनेक तारों वाला पियानो। कलाकार वह संवेदनशील हाथ है, जो उद्देश्यपूर्वक किसी एक कुंजी को दबाता है, ताकि आत्मा में अनुगूंज उत्पन्न हो। जब रंग अपने शुद्ध स्वर में प्रकट होता है, तो वह शब्दों से परे जाकर मनुष्य के अंतरतम में प्रवेश करता है। वह केवल दृश्य अनुभव नहीं रहता, बल्कि एक आध्यात्मिक स्पर्श बन जाता है।
अपने कानों को संगीत के लिए खोलो, अपनी आंखों को चित्रकला के लिए जागृत करो, और विचारों के कोलाहल को कुछ क्षणों के लिए शांत कर दो। स्वयं से पूछो कि क्या यह कृति तुम्हें किसी ऐसे अनदेखे, अज्ञात लोक में विचरण करने का अवसर देती है, जहां पहले तुम कभी नहीं गए थे। यदि उत्तर हां है, तो फिर और क्या अपेक्षित है? कला का उद्देश्य बाहरी जगत की प्रतिकृति बनाना नहीं, बल्कि उस अदृश्य संसार का द्वार खोलना है, जो हमारे भीतर छिपा है। एक चित्रकार को केवल रूपों की नकल में संतोष नहीं मिलता, बल्कि वह अपनी भीतरी अनुभूतियों को व्यक्त करने की तीव्र आकांक्षा रखता है।
संगीत, जो कलाओं में सबसे अधिक अमूर्त और अनाकार है, कितनी सहजता से आत्मा को आंदोलित कर देता है। चित्रकार भी चाहता है कि उसके रंग भी संगीत की तरह ही गूंजें, जैसे वीणा के तार। इसी आकांक्षा से चित्रकला में लय की खोज जन्म लेती है, गणितीय और अमूर्त संरचनाओं का विकास होता है, रंगों की पुनरावृत्ति तथा उनके गतिशील संयोजन की इच्छा प्रकट होती है। प्रत्येक रंग का अपना आंतरिक स्वर होता है। पीला रंग एक तीव्र, बेचैन पुकार की तरह है, नीला रंग गहराई और शांति का प्रतीक है, जो आत्मा को भीतर की ओर खींचता है; लाल रंग में जीवन की ऊर्जा और दृढ़ संकल्प का कंपन है।
जब ये रंग एक-दूसरे के साथ संवाद करते हैं, तो वे एक दृश्य संगीत रचते हैं। चित्र तब केवल आकृतियों का समूह नहीं रहता, वह एक रचना बन जाता है। रूप और रंग का बाहरी सौंदर्य तभी सार्थक है, जब वह आंतरिक अनिवार्यता से जन्म ले। यदि कलाकार के भीतर कोई सच्ची अनुभूति नहीं है, तो उसकी रचना केवल सजावटी चीज बनकर रह जाती है, किंतु जब सृजन भीतर की आवश्यकता से प्रेरित होता है, तब वह दर्शक की आत्मा में सोए हुए कलाकार को जगा देता है। यही आध्यात्मिक कला का मूल उद्देश्य है।
जैसे-जैसे मनुष्य का आध्यात्मिक विकास होता है, कला भी भौतिक रूपों की निर्भरता से मुक्त होती जाती है। रंग, रेखा और रूप मिलकर आत्मा का एक अदृश्य नाटक रचते हैं। कलाकार उस नाटक का मौन संचालक है। वह जानता है कि कौन-सा रंग किस क्षण छूना है, किस लय में रेखा को प्रवाहित करना है, ताकि दर्शक केवल देखे नहीं, बल्कि अनुभव भी करे। (कंसर्निंग द स्पिरिचुअल इन आर्ट के अनूदित अंश)
भावनाओं के स्पंदन को समझें
रंगों की तरह जीवन में भी कंपन है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ता, पर हम उसे भीतर से अनुभव जरूर करते हैं। इसलिए, अपनी भावनाओं के स्पंदन को समझें। जैसे कलाकार रंगों से आत्मा की अनुगूंज रचता है, वैसे ही आप भी अपने विचारों, कर्मों और संवेदनाओं से जीवन का संगीत रच सकते हैं।
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अपने कानों को संगीत के लिए खोलो, अपनी आंखों को चित्रकला के लिए जागृत करो, और विचारों के कोलाहल को कुछ क्षणों के लिए शांत कर दो। स्वयं से पूछो कि क्या यह कृति तुम्हें किसी ऐसे अनदेखे, अज्ञात लोक में विचरण करने का अवसर देती है, जहां पहले तुम कभी नहीं गए थे। यदि उत्तर हां है, तो फिर और क्या अपेक्षित है? कला का उद्देश्य बाहरी जगत की प्रतिकृति बनाना नहीं, बल्कि उस अदृश्य संसार का द्वार खोलना है, जो हमारे भीतर छिपा है। एक चित्रकार को केवल रूपों की नकल में संतोष नहीं मिलता, बल्कि वह अपनी भीतरी अनुभूतियों को व्यक्त करने की तीव्र आकांक्षा रखता है।
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संगीत, जो कलाओं में सबसे अधिक अमूर्त और अनाकार है, कितनी सहजता से आत्मा को आंदोलित कर देता है। चित्रकार भी चाहता है कि उसके रंग भी संगीत की तरह ही गूंजें, जैसे वीणा के तार। इसी आकांक्षा से चित्रकला में लय की खोज जन्म लेती है, गणितीय और अमूर्त संरचनाओं का विकास होता है, रंगों की पुनरावृत्ति तथा उनके गतिशील संयोजन की इच्छा प्रकट होती है। प्रत्येक रंग का अपना आंतरिक स्वर होता है। पीला रंग एक तीव्र, बेचैन पुकार की तरह है, नीला रंग गहराई और शांति का प्रतीक है, जो आत्मा को भीतर की ओर खींचता है; लाल रंग में जीवन की ऊर्जा और दृढ़ संकल्प का कंपन है।
जब ये रंग एक-दूसरे के साथ संवाद करते हैं, तो वे एक दृश्य संगीत रचते हैं। चित्र तब केवल आकृतियों का समूह नहीं रहता, वह एक रचना बन जाता है। रूप और रंग का बाहरी सौंदर्य तभी सार्थक है, जब वह आंतरिक अनिवार्यता से जन्म ले। यदि कलाकार के भीतर कोई सच्ची अनुभूति नहीं है, तो उसकी रचना केवल सजावटी चीज बनकर रह जाती है, किंतु जब सृजन भीतर की आवश्यकता से प्रेरित होता है, तब वह दर्शक की आत्मा में सोए हुए कलाकार को जगा देता है। यही आध्यात्मिक कला का मूल उद्देश्य है।
जैसे-जैसे मनुष्य का आध्यात्मिक विकास होता है, कला भी भौतिक रूपों की निर्भरता से मुक्त होती जाती है। रंग, रेखा और रूप मिलकर आत्मा का एक अदृश्य नाटक रचते हैं। कलाकार उस नाटक का मौन संचालक है। वह जानता है कि कौन-सा रंग किस क्षण छूना है, किस लय में रेखा को प्रवाहित करना है, ताकि दर्शक केवल देखे नहीं, बल्कि अनुभव भी करे। (कंसर्निंग द स्पिरिचुअल इन आर्ट के अनूदित अंश)
भावनाओं के स्पंदन को समझें
रंगों की तरह जीवन में भी कंपन है, जो हमें दिखाई नहीं पड़ता, पर हम उसे भीतर से अनुभव जरूर करते हैं। इसलिए, अपनी भावनाओं के स्पंदन को समझें। जैसे कलाकार रंगों से आत्मा की अनुगूंज रचता है, वैसे ही आप भी अपने विचारों, कर्मों और संवेदनाओं से जीवन का संगीत रच सकते हैं।
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