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धुंध और ढलानों के बीच: शोला घास भूमि की अनकही कहानी
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सार
जहां बात होती है प्रकृति और पारिस्थिकी तंत्र की तो शोला का पारिस्थितिक तंत्र अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि यह न तो पूरी तरह जंगल हैं, और न ही केवल घास के मैदान हैं बल्कि दोनों का एक अद्भुत संगम हैं।
दक्षिण भारत की कई प्रमुख नदियां जैसे कावेरी, पेरियार और वैगई इन्हीं वनों से जन्म लेती हैं।
- फोटो : डेविड राजू (David V Raju)
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विस्तार
दक्षिण भारत की खूबसूरती देखते बनती है हर तरफ हरियाली और प्रकृति का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है साथ ही ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानो पहाड़ों पर बादल टिक कर बैठे हो और वहीं कहीं शांत और रहस्यमयी रूप में बसी हैं शोला घास भूमियां।
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यह एक ऐसी प्राकृतिक धरोहर है जो धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने से ओझल होती जा रही है। अगर बात करे ‘शोला’ शब्द की तो यह तमिल भाषा के ‘सोलै’ से बना है, जिसका अर्थ है उष्णकटिबंधीय वर्षावन।
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ये वन मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र की ऊंची पहाड़ियों में पाए जाते हैं, जहां इनकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 1500 मीटर या उससे अधिक होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, शोला घास भूमियां लगभग 20,000 वर्ष पुरानी हैं जिसका अर्थ यह है की शायद ये घास भूमियां मानव सभ्यता के आरंभ से बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद हैं।
जहां बात होती है प्रकृति और पारिस्थिकी तंत्र की तो शोला का पारिस्थितिक तंत्र अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि यह न तो पूरी तरह जंगल हैं, और न ही केवल घास के मैदान हैं बल्कि दोनों का एक अद्भुत संगम हैं। यहां छोटे-छोटे, सघन और सदा-हरित पेड़ों के बीच लहराती हरी घासें होती हैं जो की पहाड़ियों को एक जीवंत चरित्र प्रदान करती हैं।
इनकी मिट्टी में पानी को सोखने और लंबे समय तक सहेज कर रखने की अद्भुत क्षमता होती है, यही कारण है कि इन्हें “प्रकृति के वॉटर टॉवर” भी कहा जाता है। बरसात के बाद जब यह मिट्टी धीरे-धीरे पानी छोड़ती है, तो नीचे मौजूद घाटियों में झरने और नदियाँ बनती हैं।
दक्षिण भारत की कई प्रमुख नदियां जैसे कावेरी, पेरियार और वैगई इन्हीं वनों से जन्म लेती हैं। जब तक शोला वन स्वस्थ रहे, तब तक ये नदियां सालभर बहती रहीं। पर अब, जब इन वनों का तेज़ी से विनाश हो रहा है, तो कई इलाकों में गर्मियों में सूखे की स्थिति तक बनने लगी है। यह केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट की और भी संकेत करता है।
शोला घास भूमियां जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध हैं। यहां की नमी और स्थिर जलवायु अनेक दुर्लभ प्रजातियों के लिए एक उपयुक्त आवास बनाती है। नीलगिरि तहर और नीलगिरि लंगूर जैसे जीव केवल यहीं पाए जाते हैं। लेकिन यह जैविक समृद्धि अब संकट में है। पिछले सौ वर्षों में शोला घास भूमियों का क्षेत्रफल लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत तक घट गया है।
विदेशी पौधों जैसे यूकेलिप्टस और वॉटल के बागानों ने इनकी जगह ले ली है, जिससे मिट्टी की संरचना बदल गई और देशी प्रजातियां नष्ट होने लगीं हैं। इसके साथ ही, अनियंत्रित पर्यटन, सड़क निर्माण और जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और भी भीषण कर दिया है।
शोला के पौधे खुले में नहीं बल्कि छांव में पनपते हैं। जब उनका मूल आवास नष्ट हो जाता है, तो उन्हें फिर से स्थापित करना लगभग असंभव हो जाता है। इसीलिए इन वनों की पुनर्स्थापना एक बड़ी चुनौती है।
यदि इन्हें संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में दक्षिण भारत के जल स्रोतों पर गहरा असर पड़ सकता है। शोला घास भूमियां केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानव जीवन से भी गहराई से जुड़ी हैं।
ये वनों की वह परत हैं जो नदियों को जन्म देती हैं, मिट्टी को थामे रखती हैं और जलवायु को स्थिर बनाए रखती हैं।
अब समय है कि इन वनों को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ। देशी पौधों की पुनर्स्थापना, अनियंत्रित पर्यटन पर नियंत्रण, और स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करना इसके लिए आवश्यक है। हम सब मिलकर काम करें, तो इन वनों को फिर से जीवंत किया जा सकता है।
यदि हम ऐसा करने में असक्षम रहे तो यह विरासत शायद केवल तस्वीरों और कहानियों में रह जाएगी। इन्हे बचाना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की संभावना को बचाए रखना है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।