सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   other side rohnat village fighting existence decades still does not celebrate independence rebellion history

दूसरा पहलू: दशकों से वजूद की लड़ाई लड़ता एक गांव, आज भी आजादी का जश्न नहीं मनाता

Gurdeep Singh Gurdeep Singh
Updated Tue, 24 Mar 2026 06:58 AM IST
विज्ञापन
सार
हरियाणा के भिवानी जिले के रोहनात गांव के माथे पर लगे ‘बागी’ के कलंक को मिटाने के लिए 78 साल से लड़ाई जारी है।
loader
other side rohnat village fighting existence decades still does not celebrate independence rebellion history
रोहनात गांव - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

हरियाणा के भिवानी जिले का रोहनात महज गांव नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता और आजादी के मतवालों की वह दास्तान है, जिसे तोपों के गोलों से मिटाने की कोशिश की गई, लेकिन वह जनमानस के सीने में मशाल बनकर जलती रही। इस गांव का वजूद खत्म करने के लिए जमीन तक नीलाम कर दी गई। बागी गांव का कलंक माथे पर लगा दिया, जिसे मिटाने के लिए 78 साल से लड़ाई जारी है। व्यवस्था के खिलाफ विरोध जताने के लिए इस गांव ने कभी आजादी का जश्न नहीं मनाया।  


रोहनात का जर्रा-जर्रा इसकी गौरवगाथा बयां करता है। गांव में घुसते ही ऐतिहासिक कुआं ध्यान खींचता है। बताते हैं कि सैकड़ों महिलाओं ने अपनी अस्मत बचाने के लिए इसी कुएं में जलसमाधि ली थी। कुछ दूरी पर ही विशाल ठूंठ के रूप में खड़ा बूढ़ा बरगद अंग्रेजों की बर्बरता की मूक गवाही देता है। इसकी शाखाओं पर विद्रोही बेटों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।  


11 मई, 1857 की बात है। दिल्ली में पहले स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हुआ। मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने क्रांतिकारियों को संदेशा भिजवाया। रोहनात और इसके साथ लगते गांवों ने 29 मई, 1857 को अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया और उनके खजाने लूट लिए। जेल तोड़कर कैदियों को भगा दिया। 12 अंग्रेज अफसर हिसार और 11 हांसी में मारे गए। बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने 30 सितंबर, 1857 को गांव पुट्ठी मंगलखां में तोपें तैनात कर रोहनात पर भीषण गोलाबारी कर दी।

गांव के नेता बीरड़ दास बैरागी को तोप से उड़ा दिया। नोंदाराम जाट को रोड रोलर से कुचल दिया और रूपा खाती को बरगद पर फांसी दे दी। महिलाओं को अस्मत बचाने के लिए कुएं में छलांग लगानी पड़ी। हिसार के तत्कालीन उपायुक्त मिस्टर विलियम ख्वाजा ने हांसी के तहसीलदार को 14 सितंबर, 1857 को गांव की जमीन नीलाम करने का फरमान सुना दिया। 20 जुलाई, 1858 को 20,656 बीघा, 19 बिस्वे जमीन नीलाम कर इसे बागी गांव का दर्जा दे दिया।

इतिहासकार डॉ. महेंद्र सिंह बताते हैं कि रोहनात के लोग जमीन पर मालिकाना हक और दस्तावेज से बागी शब्द हटवाने की लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। रोहनात वासियों ने कभी आजादी का जश्न नहीं मनाया। उनका मानना है, वे आज भी गुलामी की दासता झेल रहे हैं। हालांकि, 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने यहां ध्वजारोहण कर आश्वासन दिया कि उनका खोया वजूद लौटाया जाएगा, पर ऐसा हुआ नहीं। यहां की नौजवान पीढ़ी पूर्वजों पर गर्व करती है, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने के बजाय बलिदान का रास्ता चुना। उन्हें भरोसा है कि एक दिन सरकार सुध लेगी और उनके ऊपर से बागी का कलंक जरूर हटेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed