{"_id":"69c3228d38cf10f1a40b1c83","slug":"cow-protection-can-be-a-sustainable-economic-model-in-india-2026-03-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"दूसरा पहलू: गौ-रक्षा सिर्फ धर्म नहीं, आर्थिक मॉडल भी हो सकती है; मथुरा मॉडल से मिली सफलता","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
दूसरा पहलू: गौ-रक्षा सिर्फ धर्म नहीं, आर्थिक मॉडल भी हो सकती है; मथुरा मॉडल से मिली सफलता
विनीत नारायण
Published by: Shivam Garg
Updated Wed, 25 Mar 2026 06:50 AM IST
विज्ञापन
सार
देश में पंजीकृत करीब 2,000 गौशालाओं का सालाना बजट अरबों रुपये का है, पर इसका लाभ जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिलता।
(गौवंश) सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विज्ञापन
विस्तार
सनातन हिंदू संस्कृति में गाय को मां माना जाता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी, पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को तेजी से नष्ट किया है। गत 100-150 वर्षों में शहरों में हजारों गौशालाएं स्थापित हुई हैं, पर अधिकतर गौशालाओं की स्थिति अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही है।
आज देश में करीब 8,000 गौशालाएं हैं, जिनमें से लगभग 2,000 गौशालाएं ही पंजीकृत हैं। इन गौशालाओं का सालाना बजट अरबों रुपये का है। पर इसका लाभ जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिलता। इस दिशा में हमने एक छोटा-सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था, जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए, क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल हैं।
देश में 10,210,000 हेक्टेयर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र की 3-4 फीसदी है। हर गांव में कई भूमिहीन परिवार होते हैं, जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोजगार देती है। जिले और गांवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे नौजवान हैं, जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गांव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। यह चारा फिर भूमिहीन परिवारों को दिया जाए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करें और मुफ्त के चारे से अपने गोवंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करें और स्वस्थ जीवन जी सकें।
हमने जब यह प्रयोग मथुरा में किया, तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गांव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। हमें ऐसे कई उदारमना दानदाता मिल गए और नौजवान भी, जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरियां छोड़कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हजारों गरीबों की जिंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी जमीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका विरोध करने वाले लोग अब उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। जरूरत है एक ईमानदार और उदार सोच की।
अन्य वीडियो:-
Trending Videos
आज देश में करीब 8,000 गौशालाएं हैं, जिनमें से लगभग 2,000 गौशालाएं ही पंजीकृत हैं। इन गौशालाओं का सालाना बजट अरबों रुपये का है। पर इसका लाभ जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिलता। इस दिशा में हमने एक छोटा-सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था, जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए, क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
देश में 10,210,000 हेक्टेयर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र की 3-4 फीसदी है। हर गांव में कई भूमिहीन परिवार होते हैं, जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोजगार देती है। जिले और गांवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे नौजवान हैं, जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गांव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। यह चारा फिर भूमिहीन परिवारों को दिया जाए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करें और मुफ्त के चारे से अपने गोवंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करें और स्वस्थ जीवन जी सकें।
हमने जब यह प्रयोग मथुरा में किया, तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गांव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। हमें ऐसे कई उदारमना दानदाता मिल गए और नौजवान भी, जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरियां छोड़कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हजारों गरीबों की जिंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी जमीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका विरोध करने वाले लोग अब उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। जरूरत है एक ईमानदार और उदार सोच की।
अन्य वीडियो:-
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन