धार भोजशाला और इतिहास: यथार्थ का अन्वेषण कर रहे हैं पुरातत्व के साक्ष्य
सरस्वती की आराधना का दिन बसंत पंचमी है जो 23 जनवरी को मनाई जानी है। इस बार 23 जनवरी को शुक्रवार है, जुम्मे की नमाज भी इसी दिन अदा होनी है। यही कारण है की यह बसंत पंचमी भोजशाला के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, इसलिए आवश्यकता है भोजशाला के वास्तविक पुरातात्विक इतिहास को जानने की।
विस्तार
भारतीय इतिहास में मंदिर व मस्जिदों को लेकर विवाद कोई नवीन घटना नहीं है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने न्यायालयीय आदेशों पर कई बार सर्वेक्षण व उत्खनन कर ऐसे विवादों पर कार्य किया है जिससे इनका समाधान किया जा सके। ऐसा ही एक विवाद धार स्थित भोजशाला का है। वर्तमान समय में भोजशाला की चर्चा इसलिए है क्योंकि परमार वंश के प्रतापी राजा भोज (ग्यारहवीं शताब्दी) द्वारा बनवाए गए इस मंदिर में सरस्वती की प्रतिमा विद्यमान थी।
सरस्वती की आराधना का दिन बसंत पंचमी है जो 23 जनवरी को मनाई जानी है। इस बार 23 जनवरी को शुक्रवार है, जुम्मे की नमाज भी इसी दिन अदा होनी है। यही कारण है की यह बसंत पंचमी भोजशाला के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, इसलिए आवश्यकता है भोजशाला के वास्तविक पुरातात्विक इतिहास को जानने की।
भारतीय इतिहास में परमार वंशीय राजाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। वे अपनी राजनैतिक उपलब्धियों के लिए ही नहीं, अपितु कला व स्थापत्य के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए भी प्रसिद्द हैं। वर्तमान संवत की दसवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक मध्य भारत के बड़े भूभाग पर शासन करने वाले इन शासकों की राजधानी वर्तमान मध्यप्रदेश में स्थित धार नामक नगरी थी। इस वंश के सर्वाधिक प्रतापी राजा जिन्हें हम राजा भोज के नाम से जानते हैं अत्यंत कला प्रेमी थे।
ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ से मध्य तक शासन करने वाले राजा भोज ने अपनी राजधानी में ज्ञान की देवी मां सरस्वती या वाग्देवी के लिए एक मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर उस काल में शिक्षा ग्रहण करने का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी था। उस काल में दूरस्थ स्थानों से हिन्दू जन मां वाग्देवी के दर्शन करने आया करते थे, परन्तु मध्यकाल में हुए मुस्लिम आक्रमण में अन्य हिन्दू मंदिरों की तरह ही भोजशाला का वैभव भी नष्ट कर दिया गया।
पुनर्जागरण के इस काल में हिन्दू जनमानस अपने उस धूमिल कर दिए गए गौरवशाली अतीत को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है। "प्रत्नकीर्तिमपावृणु", इस ध्येय वाक्य का अनुसरण करने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के द्वारा किए गए पुरातात्विक उत्खनन ने हाल ही में यह सिद्ध किया है की काशी विश्वनाथ के पास खड़ा ढांचा, एक हिन्दू मंदिर का विध्वंस कर बनाया गया है।
इसी कड़ी में धार स्थित भोजशाला के सत्य को जानने के लिए ही माननीय उच्च न्यायलय ने भोजशाला के पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को दिया था। यहां यह बात उल्लेखनीय है की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की वार्षिक पत्रिका इंडियन आर्कियोलॉजिकल रिव्यू ।984-।985 (IAR ।984-।985) के पृष्ठ क्रमांक ।83 पर स्पष्ट रूप से लिखा है कि- धार स्थित भोजशाला मूल रूप से मां सरस्वती के लिए बनाया गया एक मंदिर है जिसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा किया गया था। भोजशाला के पश्चिम व उत्तर में मंदिर के अधिष्ठान के चिन्ह विद्यमान है, इसका उल्लेख भी उसमें किया गया है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा मुद्रित कॉर्पस इंस्क्रिप्शन इंडिकेरम, खण्ड 7 में भी इस बात का उल्लेख है की एक ब्रिटिश अधिकारी को भोजशाला के अवशेषों के पास ही से एक सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति प्राप्त हुई थी जिसे वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। पुस्तक में दिए विवरण के अनुसार यह प्रतिमा मां वाग्देवी की है तथा इसका निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा करवाया गया था। उपरोक्त जानकारी का आधार मां वाग्देवी की प्रतिमा पर अंकित अभिलेख है।
भोज द्वारा निर्मित भोजशाला में यह प्रतिमा स्थापित की गई होगी इसका उल्लेख भी उस पुस्तक में किया गया है। ।987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिन्दू धर्म से संबंधित 32 मूर्तियां प्राप्त हुई थी। अतः यह तो स्पष्ट है की वर्तमान समय तक हुए विभिन्न विभिन्न शोध कार्यों से यह आसानी से कहा जा सकता है की भोजशाला हिन्दू मंदिर ही है।
पूर्व में हुए शोध कार्यों के आधार पर भोजशाला को मस्जिद कहना पूर्ण रूप से तथ्यहीन ही है। वर्तमान भोजशाला परिसर में दिखाई देने वाले स्तम्भ व उनपर संजोए गए अलंकरण इस बात को सिद्ध करते हैं की स्तम्भ परमार कालीन (।।वीं शताब्दी) हैं। इतना ही नहीं, भोजशाला के आस-पास बनी कुछ कब्रों के निर्माण के लिए परमार कालीन मंदिरों के अवशेषों को उपयोग किया गया है। इन अवशेषों पर हरा रंग पोत कर मानों इनकी पहचान बदलने का असफल प्रयास किया गया हो।
भोजशाला में स्थित परमार कालीन स्तम्भ
पुरातत्व विभाग के दल ने उस दौरान भोजशाला व उसके निकट स्थित कालांतर में बनाई गई दरगाह में प्रस्तर पर अंकित शिलालेखों के छापे (स्टांपेज) लिए थे। वैसे तो पूर्व में भी भोजशाला से कई अभिलेख मिले हैं। पुरातत्वविद के. के. लेले के अनुसार भोजशाला के दो स्तम्भों पर अंकित कुछ अभिलेख इस ओर संकेत करते हैं की इन्हें व्याकरण के किसी आचार्य द्वारा लिखवाया गया था। उनके अनुसार छात्रों के ज्ञानार्जन के लिए इनका उपयोग होता होगा।
पुरातात्विक उत्खनन, अभिलेखों के छापे (स्टॉम्पेज) लेने का कार्य, फोटोग्राफी तथा प्रलेखन का कार्य सम्पादित कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का दल भोजशाला में हुए कार्य की एक विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष 2024 में प्रस्तुत कर चुका है। निश्चित तौर पर वह रिपोर्ट भोजशाला व राजा भोज द्वारा उसके निर्माण और कालांतर में उसके विध्वंस पर और प्रकाश डालेगी। वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायलय में लंबित इस विवाद क फैसले की सभी को प्रतीक्षा है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।