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दूसरा पहलू: आखिर ग्रह एक ही पथ पर क्यों चलते हैं, अलग-अलग दिशाओं में क्यों नहीं?
जेफ मोएर्श
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 21 Jan 2026 07:11 AM IST
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सार
क्या आपने कभी सोचा है कि सभी ग्रह एक अनुशासित पथ पर ही क्यों चलते हैं, न कि अलग-अलग दिशाओं में? हम ‘ऊपर’ या ‘नीचे’ किसे मानते हैं, इसमें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की बड़ी भूमिका है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप खड़े कहां हैं। अगर आप अपनी गली के सौ लोगों को नीचे की ओर इशारा करेंगे, तो सभी उसी ओर देखेंगे। पर यही संकेत पूरी पृथ्वी के लोगों, या दूसरे ग्रहों पर मौजूद जीवों के लिए अलग-अलग दिशा में हो सकता है।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अगर आपने कभी सौरमंडल का चित्र या मॉडल देखा है, तो आपने यह जरूर गौर किया होगा कि सभी ग्रह लगभग एक ही तल में सूर्य की परिक्रमा करते हैं और उनकी दिशा भी लगभग एक जैसी ही होती है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि उस समतल ‘पैनकेक’ जैसी सतह के ऊपर और नीचे क्या है? आखिर ये सभी ग्रह एक अनुशासित पथ पर ही क्यों चलते हैं, न कि अलग-अलग दिशाओं में?
आमतौर पर, हम ‘ऊपर’ या ‘नीचे’ किसे मानते हैं, इसमें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की बड़ी भूमिका है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप खड़े कहां हैं। मान लीजिए आप उत्तरी अमेरिका में खड़े हैं और नीचे की ओर इशारा करते हैं। यदि आपकी उंगली से खींची गई एक सीधी रेखा पृथ्वी को आर-पार कर जाए, तो वही रेखा दक्षिणी हिंद महासागर में किसी नाव पर मौजूद व्यक्ति के लिए ‘ऊपर’ की दिशा होगी। विज्ञान में ‘नीचे’ शब्द को सौरमंडल के उस समतल से परिभाषित किया जा सकता है, जिसे ‘एक्लिप्टिक’ (क्रांतिवृत्त) कहा जाता है। इस तल के ऊपर से देखने पर ग्रह सूर्य की परिक्रमा घड़ी की उल्टी दिशा में, जबकि नीचे से देखने पर घड़ी की दिशा में घूमते नजर आते हैं।
दरअसल, खगोलीय पिंड एक ही तल में क्यों चलते हैं, इसका जवाब उनकी उत्पत्ति में छिपा है। सौरमंडल का निर्माण गैस व धूल के कणों के एक विशाल बादल (सोलर नेबुला) से हुआ है। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये कण धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर खिंचने लगे और बादल सिकुड़ने लगा। जैसे-जैसे यह सिमटा, इसकी घूमने की गति तेज होती गई-ठीक वैसे ही, जैसे एक स्केटिंग करने वाला अपने हाथ शरीर के पास लाकर तेजी से घूमने लगता है। यदि कोई कण ऊपर से नीचे व दूसरा नीचे से ऊपर आ रहा था, तो उनके टकराव ने ऊर्ध्वाधर गति को खत्म कर दिया और उन्हें एक सपाट डिस्क के आकार में व्यवस्थित कर दिया। इसी से सूर्य तथा उसके चारों ओर घूमने वाले ग्रह बने। हकीकत में, पृथ्वी के सापेक्ष ‘नीचे’ की दिशा में कुछ भी विशेष नहीं है। यदि आप उस दिशा में बहुत दूर निकल जाएं, तो आपको अन्य तारे मिलेंगे, जिनके अपने ग्रह तंत्र होंगे और उनकी दिशाएं पूरी तरह अलग हो सकती हैं। आगे बढ़ने पर दूसरी आकाशगंगाएं मिलेंगी, जिनके अपने घूर्णन तल होंगे।
यही खगोल विज्ञान की खूबसूरती है कि यह हर चीज को सही नजरिये से दिखाता है। अगर आप अपनी गली के सौ लोगों को नीचे की ओर इशारा करेंगे, तो सभी उसी ओर देखेंगे। पर यही संकेत पूरी पृथ्वी के लोगों, या दूसरे ग्रहों पर मौजूद जीवों के लिए अलग-अलग दिशा में हो सकता है।
- द कन्वर्सेशन से
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आमतौर पर, हम ‘ऊपर’ या ‘नीचे’ किसे मानते हैं, इसमें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की बड़ी भूमिका है। यह इस पर निर्भर करता है कि आप खड़े कहां हैं। मान लीजिए आप उत्तरी अमेरिका में खड़े हैं और नीचे की ओर इशारा करते हैं। यदि आपकी उंगली से खींची गई एक सीधी रेखा पृथ्वी को आर-पार कर जाए, तो वही रेखा दक्षिणी हिंद महासागर में किसी नाव पर मौजूद व्यक्ति के लिए ‘ऊपर’ की दिशा होगी। विज्ञान में ‘नीचे’ शब्द को सौरमंडल के उस समतल से परिभाषित किया जा सकता है, जिसे ‘एक्लिप्टिक’ (क्रांतिवृत्त) कहा जाता है। इस तल के ऊपर से देखने पर ग्रह सूर्य की परिक्रमा घड़ी की उल्टी दिशा में, जबकि नीचे से देखने पर घड़ी की दिशा में घूमते नजर आते हैं।
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दरअसल, खगोलीय पिंड एक ही तल में क्यों चलते हैं, इसका जवाब उनकी उत्पत्ति में छिपा है। सौरमंडल का निर्माण गैस व धूल के कणों के एक विशाल बादल (सोलर नेबुला) से हुआ है। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये कण धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर खिंचने लगे और बादल सिकुड़ने लगा। जैसे-जैसे यह सिमटा, इसकी घूमने की गति तेज होती गई-ठीक वैसे ही, जैसे एक स्केटिंग करने वाला अपने हाथ शरीर के पास लाकर तेजी से घूमने लगता है। यदि कोई कण ऊपर से नीचे व दूसरा नीचे से ऊपर आ रहा था, तो उनके टकराव ने ऊर्ध्वाधर गति को खत्म कर दिया और उन्हें एक सपाट डिस्क के आकार में व्यवस्थित कर दिया। इसी से सूर्य तथा उसके चारों ओर घूमने वाले ग्रह बने। हकीकत में, पृथ्वी के सापेक्ष ‘नीचे’ की दिशा में कुछ भी विशेष नहीं है। यदि आप उस दिशा में बहुत दूर निकल जाएं, तो आपको अन्य तारे मिलेंगे, जिनके अपने ग्रह तंत्र होंगे और उनकी दिशाएं पूरी तरह अलग हो सकती हैं। आगे बढ़ने पर दूसरी आकाशगंगाएं मिलेंगी, जिनके अपने घूर्णन तल होंगे।
यही खगोल विज्ञान की खूबसूरती है कि यह हर चीज को सही नजरिये से दिखाता है। अगर आप अपनी गली के सौ लोगों को नीचे की ओर इशारा करेंगे, तो सभी उसी ओर देखेंगे। पर यही संकेत पूरी पृथ्वी के लोगों, या दूसरे ग्रहों पर मौजूद जीवों के लिए अलग-अलग दिशा में हो सकता है।
- द कन्वर्सेशन से