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दूसरा पहलू: गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथियों की परंपरा, जानिए कौन थे पहले विदेशी मेहमान

विवेक शुक्ला Published by: पवन पांडेय Updated Thu, 22 Jan 2026 05:27 AM IST
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सार

दूसरा पहलू: गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथियों की परंपरा 1950 से जारी है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पहले मुख्य अतिथि थे। पहले परेड इर्विन स्टेडियम (दादा ध्यानचंद स्टेडियम) में आयोजित होती थी। 1955 से यह राजपथ (कर्तव्य पथ) पर आयोजित होने लगी। इस परंपरा का महत्व भारत की विदेश नीति के साथ गहराई से जुड़ा है। मुख्य अतिथि के चयन से भारत अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाता है। यह भारत की सैन्य शक्ति प्रदर्शन का जरिया भी है।

The tradition of chief guests on Republic Day, find out who was the first foreign guest.
गणतंत्र दिवस की परेड (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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विस्तार
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देश के 77वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि होंगे यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन। गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथियों की परंपरा 1950 से जारी है। बेशक, मुख्य अतिथि की उपस्थिति न केवल 26 जनवरी को निकलने वाली परेड की शोभा बढ़ाती है, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार, रक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को गति देती है।
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भारत जब अपना पहला गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। उस समय परेड इर्विन स्टेडियम (अब दादा ध्यानचंद स्टेडियम) में आयोजित की गई थी। हालांकि, 1952 और 1953 के गणतंत्र दिवस समारोह में विभिन्न कारणों से कोई मुख्य अतिथि नहीं था। 1955 से परेड राजपथ (अब कर्तव्य पथ) पर स्थायी रूप से आयोजित होने लगी। 1955 में पाकिस्तान के गवर्नर-जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद को आमंत्रित किया गया। वह महिंद्रा एंड महिंद्रा के संस्थापकों में से एक थे।
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1960 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति क्लिमेंट वोरोशिलोव और 1961 में ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ द्वितीय जैसे नेता गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हुए। 1966 में कोई अतिथि नहीं था। अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों का 1970 के दशक में प्रतिनिधित्व बढ़ा। 1980 के दशक में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई, और मुख्य अतिथियों के चयन में विकसित देशों पर जोर दिया गया। 1995 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला आए। इस दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और पूर्वी यूरोप के देशों पर ध्यान केंद्रित हुआ।

2007 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और 2010 में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली म्युंग-बाक जैसे नेता मुख्य अतिथि बने। इस दशक में भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति पर जोर दिया गया। 2015 में बराक ओबामा, पहले अमेरिकी राष्ट्रपति, मुख्य अतिथि थे। यह भारत-अमेरिका संबंधों में मील का पत्थर था। 2018 में आसियान के 10 नेता (पहली बार सामूहिक आमंत्रण) मुख्य अतिथि बने। 2021 व 2022 में कोविड के कारण कोई मुख्य अतिथि नहीं था। मिस्र के राष्ट्रपति 2023 में, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 2024 में, और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो 2025 में मुख्य अतिथि बने।

इस परंपरा का महत्व भारत की विदेश नीति के साथ गहराई से जुड़ा है। मुख्य अतिथि के चयन से भारत अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाता है। यह परंपरा न केवल सैन्य शक्ति प्रदर्शन है, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी है, जहां मुख्य अतिथि भारतीय संस्कृति, विविधता और प्रगति से परिचित होते हैं।
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