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Trade Bazooka: ग्रीनलैंड से डिएगो गार्सिया और फ्रांसीसी वाइन तक कैसे फूटा ट्रांस-अटलांटिक टकराव
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सार
ग्रीनलैंड इस पूरे टकराव का केंद्र है। खनिज संसाधनों से भरपूर, आर्कटिक क्षेत्र में स्थित और सामरिक रूप से बेहद अहम यह द्वीप डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है।
अमेरिका और यूरोप के बीच तनातनी।
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
अमेरिका और यूरोप के रिश्ते एक बार फिर उस मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहां कूटनीति की भाषा तेजी से व्यापारिक धमकियों और रणनीतिक दबाव में बदलती दिख रही है। हाल के दिनों में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिन तीन मोर्चों पर यूरोप को घेरा है ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद, डिएगो गार्सिया को लेकर ब्रिटेन पर हमला और फ्रांस को 200% टैरिफ की धमकी,वे अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं।
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ये एक ही राजनीतिक और रणनीतिक सोच की कड़ियां हैं, जिसका असर अब सीधे यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी आर्थिक तोप एंटी-कोएरशन इंस्ट्रूमेंट (एसीआई) यानी ‘ट्रेड बाजूका’ तक पहुंच गया है।
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यह वही क्षण है, जब यूरोप पहली बार गंभीरता से यह सोचने को मजबूर हुआ है कि क्या उसे अमेरिका के खिलाफ अपने सबसे कठोर व्यापारिक हथियार का इस्तेमाल करना पड़ेगा।
ग्रीनलैंड: विवाद की असली चिंगारी
ग्रीनलैंड इस पूरे टकराव का केंद्र है। खनिज संसाधनों से भरपूर, आर्कटिक क्षेत्र में स्थित और सामरिक रूप से बेहद अहम यह द्वीप डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। लेकिन ट्रंप इसे खुलकर अमेरिकी सुरक्षा हितों से जोड़ते हैं। एनबीसी न्यूज को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने साफ कहा कि जब तक डेनमार्क ग्रीनलैंड को लेकर किसी समझौते पर नहीं आता, तब तक यूरोपीय सहयोगी देशों पर चरणबद्ध टैरिफ़ लगाए जाएंगे।
1 फरवरी से 10% और 1 जून से 25% तक। यह सिर्फ व्यापारिक दबाव नहीं है। जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या ग्रीनलैंड के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल हो सकता है, तो उनका “नो कमेंट” यूरोप के लिए अपने-आप में एक चेतावनी बन गया। इसी बीच नोराड द्वारा ग्रीनलैंड के पिटुफिक स्पेस बेस की ओर विमानों की तैनाती ने यह संकेत दे दिया कि मामला केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है।
ट्रेड बाजूका क्या है और क्यों इतना अहम है?
यूरोपीय संघ जिस एंटी-कोएरशन इंस्ट्रूमेंट की बात कर रहा है, वह साधारण जवाबी टैरिफ नहीं है। इसे ‘ट्रेड बाजूका’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका इस्तेमाल पूरे व्यापार और निवेश ढांचे को झकझोर सकता है। इस तंत्र के तहत ईयू किसी देश की कंपनियों को यूरोपीय बाजार से बाहर कर सकता है, उन्हें सार्वजनिक ठेकों से रोक सकता है, आयात-निर्यात पर सख्त पाबंदियां लगा सकता है और विदेशी निवेश पर भी रोक लगा सकता है।
अब तक इसका कभी इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन फ्रांस जैसे देश इसे “आर्थिक न्यूक्लियर विकल्प” मानते हैं। हालांकि ईयू के भीतर एकमत नहीं है। फ्रांस एसीआई को सक्रिय करने के पक्ष में दिखता है, जबकि जर्मनी जैसे देश अब भी सतर्क हैं। वजह साफ है जर्मनी की अर्थव्यवस्था निर्यात पर ज्यादा निर्भर है और उसे लंबे व्यापार युद्ध का जोखिम ज्यादा दिखता है।
डिएगो गार्सिया: ब्रिटेन पर हमला, ग्रीनलैंड से सीधा रिश्ता
ग्रीनलैंड के बाद ट्रंप ने ब्रिटेन को निशाने पर लिया। चागोस द्वीपसमूह के रणनीतिक द्वीप डिएगो गार्सिया की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने के फैसले को उन्होंने “घोर मूर्खता का कृत्य” कहा।
डिएगो गार्सिया में स्थित संयुक्त ब्रिटिश-अमेरिकी सैन्य अड्डा हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक रीढ़ माना जाता है। ट्रंप का तर्क साफ है, अगर सहयोगी देश इतनी अहम जमीन छोड़ सकते हैं, तो चीन और रूस इसे कमजोरी के रूप में देखेंगे। यही सोच ग्रीनलैंड पर उनके आक्रामक रुख से सीधे जुड़ती है।
फ्रांस और बोर्ड ऑफ पीस, व्यापार को कूटनीति का हथियार
टकराव की तीसरी परत फ्रांस से जुड़ी है। सीएनबीसी के अनुसार ट्रंप ने फ्रांसीसी वाइन और शैंपेन पर 200% टैरिफ़ लगाने की धमकी दी। वजह यह कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों गाजा से जुड़े ट्रंप के प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने से हिचक रहे हैं।
यहां संदेश साफ है जो राजनीतिक लाइन से हटेगा, उस पर व्यापारिक दबाव बढ़ेगा। यही वह बिंदु है, जहां यूरोप को लगने लगा कि अमेरिका व्यापार को खुले तौर पर भू-राजनीतिक हथियार बना रहा है।
अगर सच में चल गया ट्रेड बाजूका तो क्या होगा
अगर ईयू एसीआई को सक्रिय करता है तो असर सिर्फ टैरिफ़ तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच सालाना 1.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का व्यापार होता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा द्विपक्षीय व्यापारिक रिश्ता है। पहला झटका अमेरिकी कंपनियों को लगेगा।
बोइंग, लॉकहीड मार्टिन, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेज़न और टेस्ला जैसी कंपनियां अरबों यूरो के यूरोपीय ठेकों से बाहर हो सकती हैं। दूसरा असर निवेश पर पड़ेगा। यूरोप अमेरिकी निवेश का सबसे बड़ा गंतव्य है और अमेरिका यूरोप का सबसे बड़ा निवेशक।
एसीआई लागू होते ही नई फैक्ट्रियों, टेक हब और रिसर्च सेंटर्स की योजनाएं अटक सकती हैं। तीसरा और सबसे संवेदनशील क्षेत्र टेक्नोलॉजी और डेटा का होगा। यूरोप पहले ही डिजिटल संप्रभुता पर सख्त है। ट्रेड बाजूका चलने की स्थिति में अमेरिकी टेक कंपनियों पर डेटा ट्रांसफर और प्रतिस्पर्धा नियमों का शिकंजा और कस सकता है।
नाटो और भरोसे की असली परीक्षा
डेनमार्क पहले ही चेतावनी दे चुका है कि ग्रीनलैंड में किसी भी अमेरिकी सैन्य कदम से नाटो के भविष्य पर सवाल खड़े हो सकते हैं। कुछ यूरोपीय देशों द्वारा ग्रीनलैंड में प्रतीकात्मक सैन्य मौजूदगी इसी चिंता का संकेत है।
विश्लेषकों के अनुसार ग्रीनलैंड, डिएगो गार्सिया और फ्रांस के साथ टकराव अब अलग-अलग घटनाएं नहीं रहीं। ये मिलकर यह दिखा रही हैं कि अमेरिका-यूरोप संबंध साझेदारी से प्रतिस्पर्धा और अब टकराव की ओर बढ़ चुके हैं।
आखिरी चेतावनी या नई शुरुआत?
फिलहाल यूरोपीय संघ कह रहा है कि ट्रेड बाजूका आख़िरी विकल्प होगा। लेकिन जिस तेजी से हालात बदले हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि यह विकल्प अब सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है।
दावोस से ठीक पहले बना यह माहौल बताता है कि ट्रांस-अटलांटिक रिश्ते अपने सबसे कठिन दौर में हैं। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि यह टकराव बातचीत से सुलझेगा या फिर यूरोप सचमुच वह हथियार निकालने को मजबूर होगा, जिसे अब तक सिर्फ डराने के लिए रखा गया था।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।