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Protest: क्या नीट पेपर लीक आंदोलन अब खत्म हो जाएगा या प्रधान का इस्तीफा होगा, किसे होगा फायदा-किसे नुकसान?

Sat, 25 Jul 2026 11:31 AM IST
Hari Verma हरि वर्मा
Updated Sat, 25 Jul 2026 11:31 AM IST
सार

नीट पेपर लीक आंदोलन की जमीन पर विपक्ष की सियासी फसल लहलहाने की कोशिशों के बीच प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी ताबड़तोड़ एक्शन में हैं।  पेपर लीक मामले की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई का एलान किया। 24 घंटे के भीतर चार फास्ट ट्रैक अदालतें बन गईं।

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CJP Protest: Will the NEET paper leak agitation now come to an end, or will Pradhan resign
Dharmendra Pradhan - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

नीट पेपर लीक को लेकर सोशल मीडिया से उपजा आंदोलन जमीन पर पसर चुका है। संसद में गतिरोध जारी है। मानसून सत्र के पांचवे दिन भी काम नहीं हो पाया। सोनम वांगचुक अनशन तोड़ चुके हैं।

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मोदी कैबिनेट ने पेपर लीक के खिलाफ सख्त प्रावधान के मसौदे को मंजूरी दे दी है। सोमवार को यह सख्त विधेयक संसद में पेश किया जा सकता है। शिक्षा मंत्रालय सचिव के बाद एनटीए में 47 अधिकारियों को हटा दिया गया है। ऐसे में अब कई सवाल हैं। क्या यह आंदोलन जल्द खत्म हो जाएगा ?
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क्या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे देंगे ? क्या सोमवार से संसद का सत्र पटरी पर लौट आएगा ? क्या इस पूरे घटनाक्रम में मोदी ने फिर अपने मास्टर स्ट्रोक के जरिये विपक्ष को हाशिये पर ला दिया या कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी ने अपनी बुनियाद मजबूत कर ली है।
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पेपर लीक मामले पर अब तक का एक्शन

नीट पेपर लीक आंदोलन की जमीन पर विपक्ष की सियासी फसल लहलहाने की कोशिशों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ताबड़तोड़ एक्शन में हैं। पेपर लीक मामले की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई का एलान किया। 24 घंटे के भीतर चार फास्ट ट्रैक अदालतें बन गईं।

फिर कैबिनेट में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित रोकथाम 2024) कानून में संशोधन मसौदे को मंजूरी दी, जिसमें अब 10 साल तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसे संसद के इसी सत्र में सोमवार को पेश किया जाना है। शिक्षा मंत्रालय में सचिव के बाद एनटीए के 47 अधिकारी बर्खास्त कर दिए गए हैं। वांगचुक  के अनशन तोड़ने के बाद मोदी ने ताबड़तोड़ छात्र हितैषी कदमों से विपक्ष को चक्रव्यूह में घेरने की भरसक कोशिश की है।

सरकार चाहती है गतिरोध टूटे और पेपर लीक समेत सभी 8 विधेयकों पर संसद में चर्चा हो। अब जब पेपर लीक से जुड़ा नया विधेयक सरकार संसद में सोमवार को लाएगी तो चाहेगी कि इस पर पहले प्राथमिकता के आधार पर चर्चा हो। यह पास हो। सख्त कानून बने। आंदोलनकारियों के बीच संदेश पहुंचे और आंदोलन खत्म हो। दूसरी तरफ, विपक्ष  धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बगैर चर्चा को तैयार नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी भी इस्तीफे से कम पर न मानने की जिद पर अडिग है।

ऐसे में यदि सरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं लेती है और विपक्ष की जिद पर यदि संसद में आगे भी गतिरोध बना रह जाता है, तो सरकार युवाओं-छात्रों तक यह संदेश लेकर जाएगी कि पेपर लीक के खिलाफ कठोर कानून पर भी विपक्ष ने सरकार का साथ नहीं दिया और यदि प्रधान के इस्तीफे के बगैर विपक्ष चर्चा में शामिल हो जाता है, तो सरकार एक बड़े धर्मसंकट से उबर जाएगी।

किरकिरी बने हुए हैं धर्मेंद्र प्रधान

सत्ता के गलियारे में भले यह चर्चा हो कि धर्मेंद्र प्रधान कई कारणों से किरकिरी बन गए हैं लेकिन सियासी तूल पकड़ने के बाद प्रधान को अभयदान मिलता दिख रहा है।

उनसे इस्तीफा लेकर सरकार बैकफुट का संदेश कतई नहीं देना चाहेगी और न ही कांग्रेस को इसका श्रेय लेने देना चाहेगी।  यही कारण है कि एनटीए अधिकारियों पर कार्रवाई की जानकारी देने के लिए खुद धर्मेंद्र प्रधान नजर आएं। आंदोलनकारियों (कॉकरोच जनता पार्टी) से वार्ता का दौर भी किसान आंदोलन की तरह महज एक कॉल की दूरी के बावजूद बार-बार अटक रहा है। अभिजीत दीपके भी अन्ना आंदोलन की तरह केजरीवाल की राह पर हैं।

वह भी प्रधान के इस्तीफे के बगैर मानने को तैयार नहीं हैं। हालांकि, नीट पेपर लीक के बाद विपक्ष ने जब पहली बार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा था, तो राजनाथ सिंह ने दो टूक कहा था कि यह सरकार इस्तीफे वाली नहीं है। मणिपुर हिंसा हो या किसान आंदोलन, सरकार ने विपक्षी शोर के बीच हमेशा अपनी जोर का संदेश दिया है। इसलिए यह माना जा रहा है कि फिलहाल धर्मेंद्र प्रधान को अभयदान मिल सकता है। अलबत्ता, मोदी मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान भले प्रधान को ड्रॉप कर दिया जाता। ताजा हालात में इस्तीफा दिलाकर सरकार कांग्रेस के साथ-साथ विपक्ष को कोई श्रेय नहीं देना चाहेगी।

ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि यह आंदोलन फिलहाल तुरंत खत्म नहीं होने जा रहा है और यह किसान आंदोलन की तर्ज पर लंबा खींच सकता है। सरकार ने शिक्षा मंत्रालय के साथ-साथ एनटीए में बदलाव के जरिये यह भी संदेश देने की भरपूर कोशिश की है, वह शिक्षा मंत्रालय के जिम्मेदारों और पेपर लीक के आरोपियों पर लगातार कार्रवाई कर रही है।

यूं भी पेपर लीक के खिलाफ इससे पहले जिन राज्यों (उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान, बिहार) में कानूनी प्रावधान हैं, वे भाजपा शासित राज्य ही हैं। सरकार इस मुद्दे युवाओं के बीच उतरेगी। यह भी बताएगी कि महिला आरक्षण और वंदे मातरम सम्मान को लेकर भी विपक्ष ने संसद में चर्चा से परहेज कर युवा, महिला, राष्ट्रहित की अनदेखी की।

अब एक सवाल इस आंदोलन के सियासी नफा-नुकसान से जुड़ा है। क्या कांग्रेस फायदे में है। आंदोलन के बाद राहुल-प्रियंका की सक्रियता से कांग्रेस फिर से मजबूत बन कर उभरने की कोशिश में जुट गई है। हालांकि, कांग्रेस खुद विपक्ष के त्रिकोणीय संघर्ष में उलझ गई है। 20 जुलाई को जब कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर बर्बरता हुई तो जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह, मनीष सिसोदिया, आतिशी आदि नजर आए जिन्होंने कांग्रेस को ही कोसा।

कांग्रेस पर आंदोलन को कमजोर करने का आरोप मढ़ा। दरअसल, अगले साल पंजाब में चुनाव हैं। वहां कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आमने-सामने है। ऐसे में इस आंदोलन की जमीन के जरिये पंजाब में राजनीतिक फसल लहलहाने के लिए दोनों में होड़ मची है। वे इस आंदोलन के समर्थन के मुद्दे पर भी आमने-सामने नजर आए। इसी तरह, पीएम आवास के बाहर राहुल गांधी के प्रदर्शन में सपा सुप्रीमो अखिलेश भी साथ दिखें लेकिन लोकसभा में उन्होंने कांग्रेस-भाजपा में न केवल डील का आरोप लगाया बल्कि संसद के बाहर कांग्रेस नेता वेणुगोपाल से खूब उलझे।

तू-तू, मैं-मैं हुई। यह यूपी में साथ चुनाव लड़ने से पहले आपस में लड़ने-भिड़ने की झलक थी। ममता अपील करती रहीं कि विपक्ष इस मुद्दे पर एकजुट रहे लेकिन कांग्रेस विपक्ष के ही तीर से घायल दिखी। इसी बीच शरद पवार और सुप्रिया पीएम से मिलीं। ऐसे में कांग्रेस को भले लगे कि उसने आंदोलन में कूद कर सियासी बुनियाद मजबूत कर ली है लेकिन इसे उसकी उपस्थिति भर माना जा रहा है। ये घटनाएं विपक्षी एकजुटता में दरार की झलक भर थीं।

कांग्रेस अधिकांश राज्यों में दूसरों की वैसाखी पर चुनाव मैदान में उतर रही है। छात्रों के मुद्दे पर कांग्रेस का छात्र संगठन (एनएसयूआई) अब पहले जैसा प्रभावी नहीं रह गया है। ऐसे में कांग्रेस को जनाधार के लिए दूसरों के आंदोलन को भुनाने के साथ-साथ अपने जनाधार पर भी फोकस करना होगा। यूं भी चुनाव के दौरान कांग्रेस में मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, चिदंबरम की चिल्ल-पौं से पार्टी की चूलें ही हिलती रही हैं।

आंदोलन जारी है। सियासी तमाशा भी। आंदोलनकारियों के सुर बदल गए हैं। सोनम वांगचुक अनशन तोड़कर अलग हो गए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके जंतर-मंतर पर डटे हैं। अभिजीत कॉकरोच जनता पार्टी के नायक हैं, इसलिए उनकी अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाएं होंगी। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इससे किसे कितना सियासी फायदा होता है लेकिन सच तो यही है कि छात्रों को तो फिलहाल नुकसान ही हुआ है। पेपर लीक से।

आंदोलन में पुलिस की लाठियों से। सरकार की सख्ती के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि पेपर लीक के मुद्दे पर छात्र हित में सभी दल और आंदोलनकारी सरकार की कोशिशों में साथ दें और सरकार को भी परीक्षा प्रणाली में सेंधमारी की पुनरावृत्ति रोकने के लिए और जिम्मेदारी के साथ तमाम कठोर व कारगर प्रयास जारी रखना चाहिए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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