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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन: आंदोलनों की ‘नई भाषा’ भी रच रहा है जेन जी का आक्रोश!
सार
जेन जी जिस भाषा का प्रयोग अपना विरोध प्रकट करने के लिए कर रहे हैं, वह संस्कारी भाषा के पैरोकारों को गहरी चोट पहुंचाने वाला है। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या यही युवा पीढ़ी है, जिसे देश को आगे ले जाना है, क्या वह इसी भाषा, अभिव्यक्ति, तेवर, वेशभूषा और (कु) संस्कारों के साथ आगे जाएगी?
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Jantar Mantar Protest
- फोटो : Jantar Mantar Protest
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विस्तार
देश की राजधानी में जंतर-मंतर पर पेपरलीक को लेकर विरोध प्रदर्शन में जेन जी (जनरेशन जूमर्स) ने अपनी मांगों के साथ विरोध प्रदर्शन की नई भाषा, तेवर, तरीके ने भी सारे देश का ध्यान खींचा है। इसे लेकर पुरानी और परंपरावादी पीढ़ी में हैरानी और गहरी नाराजी भी है। क्योंकि आजतक देश में हुए अनेक आंदोलनों में भाषा और अभिव्यक्ति का वैसा स्वरूप कभी नहीं दिखा, जैसा कि इस आंदोलन में दिखाई पड़ रहा है।
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जेन जी जिस भाषा का प्रयोग अपना विरोध प्रकट करने के लिए कर रहे हैं, वह संस्कारी भाषा के पैरोकारों को गहरी चोट पहुंचाने वाला है। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या यही युवा पीढ़ी है, जिसे देश को आगे ले जाना है, क्या वह इसी भाषा, अभिव्यक्ति, तेवर, वेशभूषा और (कु) संस्कारों के साथ आगे जाएगी?
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कई लोग इसे जेन जी द्वारा अपने नैतिक व भाषाई पतन और अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दिलाने की कोशिशों के रूप में देख रहे हैं। संवाद की मर्यादा और भारतीय संस्कारों को दरकिनार करने की बात भी हो रही है। यह सोच रखने वाली पीढ़ी मुख्यत: बेबी बूमर्स और मिलेनियल्स की है। जिनके लिए पारिवारिक संस्कार और शिक्षा पहले थी, तकनीकी सुविधा और डिजीटल दुनिया बाद में।
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लेकिन इस पीढ़ी को अहसास ही नहीं है कि 21वीं सदी में इंटरनेट, बेलगाम सोशल मीडिया और डिजीटल विश्व के असीमित विस्तार में जन्मी और पली बढ़ी-पीढ़ी एक अलग माहौल में तैयार हुई है, जिसमें पारंपरिक बातों का महत्व शून्य भले न हो, लेकिन न्यून जरूर है। आपसी रिश्तों और सामाजिकता को देखने-परखने का पैमाना अलग है।
उदाहरण के लिए जंतर मंतर के इस प्रदर्शन में भी कई लड़कियां हाथों में ऐसे प्लेकार्ड्स लिए मस्ती के साथ घूमती दिखाई दीं, जिसे पारंपरिक अर्थ में अत्यंत अश्लील और अभद्र कहा जाता है। ऐसे शब्द जिनका सभ्य समाज में उच्चारण भी अस्वीकार्य है।
लेकिन उन लड़कियों के चेहरों पर इस बात की रत्तीभर चिंता नहीं दिखी कि ये प्लेकार्ड्स देखकर उनके अपने परिजन क्या सोच रहे होंगे, समाज में उनकी इज्जत क्या रह जाएगी, क्योंकि यह प्रदर्शन तो सार्वजनिक है और हर पल की रिकॉर्डिंग किसी न किसी रूप में हो रही है।
ज्यादातर अश्लील प्लेकार्ड्स प्रधानमंत्री मोदी को निशाना साधते हुए बनाए गए हैं। यह व्यवस्था और सत्ताधारियों के प्रति युवाओं का आक्रोश है, लेकिन मानसिकता अलग है। इन प्लेकार्ड्स को लेकर भी अलग-अलग तर्क सुनाई दिए। शालीनता और मर्यादा के हामी लोगों ने इसे वामपंथी सोच से जोड़ा तो जवाब में यह दलील भी आई कि बीते 12 वर्षों (मोदी राज में) में युवाओं ने यही सब कुछ सीखा है। यह तो उसकी बानगी भर है।
सुंदर, संस्कारित भाषा, अवभाषा, गालीगलौज वाली गंवई भाषा और तकनीकी भाषा जैसे विवादों से अलग केवल जेनन जी की भाषा की ही बात करें तो यह ट्रेंड वैश्विक है। जेन जी बोले तो वो पीढ़ी जो 1997 से लेकर 2012 के बीच जन्मी, पली बढ़ी है। ये जब पैदा हुई तब इंटरनेट ने भारत में दस्तक दे दी थी और बाद में स्मार्ट फोन भी आ गए थे। लिहाजा इस पीढ़ी ने जवां होती डिजीटल और तकनीकी दुनिया में ही आंखें खोली और उसीमें अपने सपने बुने, सहेजेन। यह उनके जीवन का हिस्सा बन चुके है।
इन युवाओं की जीवनशैली में तकनीकी और अल्गोरिदम के बढ़ते घालमेल ने एक नई भाषा को जन्म दिया, जो आज जेन जी की अभिव्यक्ति और संवाद की भाषा है। ऐसी भाषा, जो शब्दों के संक्षिप्तीकरण, उनके अंकीकरण, प्रचलित अर्थ से अलग भाव बोध कराने, सांकेतिक रूप से उपयोग की जाती है। यानी एक ने कही, दूजे ने बूझी।
इस भाषा पर अंग्रेजी का बहुत ज्यादा प्रभाव है, जो हिंदी जैसी समावेशी भाषा के भी शुद्धिकरण के पैरोकारों के लिए बड़ा झटका है। यह भाषा के सनातन आग्रह से भी बिल्कुल अलग है। इस भाषा में विभिन्न भाषाओं, अंकों, लिपियों और शब्दों के अर्थप्रवाह के भेद मिटते दिखाई देते हैं और शब्दों के पारंपरिक अर्थों की जगह नए अर्थ और संदर्भ रूढ़ होते हैं, जो हमारे लिए बिल्कुल अजूबा हैं।
जेन जी और उनकी भाषा
जेन जी की यह भाषा भी दो तरह की है। पहली है नेटस्पीक। नेट स्पीक इंटरनेट पर कुछ संशोधन के साथ प्रचलित मोटे तौर पर पारंपरिक भाषा ही है। लेकिन दूसरी और युवाओं में लगातार लोकप्रिय हो रही भाषा है- लेट अथवा लीटस्पीक। लेटस्पीक का एक अर्थ ‘चलो बोलें’ भी है।
इस भाषा का उद्भव 1980 के दशक में बुलेटिन बोर्ड सिस्टम (BBS) में हुआ, "एलीट" (श्रेष्ठ) का दर्जा प्राप्त करने से उपयोगकर्ता को फाइल, फोल्डरों, गेम और विशेष चैट रूम तक पहुंच मिलती थी। इस भाषा की शुरूआत दरअसल हैकरों और र्गमर्स ने की थी ताकि संवाद की गोपनीयता बनाई रखी जा सके। ऐसे शब्दों को गढ़ने का श्रेय ‘कल्ट आॅफ द डेड काउ’ हैकर समूह को जाता है। इस अर्थ में लेटस्पीक का लिखा जाना भी अलहिदा है। इसे अंकीय भाषा में 1337 लिखा जाता है। क्योंकि इसमें अंग्रेजी के T की शक्ल अंग्रेजी के ही अंक 7 से मिलती है।
इसी तरह अंग्रेजी के E का अर्थ 3 तथा L का संकेत 1 से है। इसीलिए "1337’’ को नई पीढ़ी ‘लेटस्पीक’ पढ़ती है। यहां संख्याओं का प्रयोग अक्षरों की समानता के आधार पर किया जाता है, और यह लेटस्पीक की दृश्य रचनात्मकता का एक हिस्सा है। ज्यादातर संदेश और जवाब इसी शैली में दिए जाते हैं। लिहाजा लेटस्पीक का ज्ञान रखने वाले ही इसे समझ सकते हैं। लेकिन जेनन जी इस भाषा में सहजता से संवाद करती है।
यहां भाषा के संयम और सौंदर्य की जगह सुविधा और सम्प्रेषणीयता ज्यादा महत्वपूर्ण है। भाषा की शीलता-अश्लीलता का भाव गौण है। जेनन जी की शब्दावली के कुछ नमूने इस प्रकार हैं- मसलन फैम (फैमिली) यानी परिवार और दोस्त यानी ‘ब्रो।’ ‘ग्लो अप’ यानी बुरे से अच्छे में बदलाव, ‘सीईअो’ यानी आपने सम्बन्धित विषय में महारत हासिल कर ली है। इसे भी संक्षेप में ‘प्रो’ कहा जाता है।
‘कैंसल कल्चर’ यानी किसी व्यक्ति या संगठन और विचारों को शर्मसार करना, ‘स्टैन’ अर्थात आप जुनूनी हैं लेकिन डरावने तरीके से नहीं, ‘लिविंग रेंट फ्री’ यानी ऐसी बात, जिसके बारे में आप सोचना बंद नहीं कर सकते, ‘ डब्ल्यू’ का जेनन जी के लिए अर्थ जीत है।
इसी प्रकार ‘डैंक’ यानी बहुत उच्च गुणवत्ता वाली चीज, ‘घोस्टिंग’ अर्थात किसी से रिलेशनशिप में रहने के बाद उसे अनदेखा करना, ‘कैप’ यानी झूठ बोलना और ‘सॉल्टी’ (नमकीन) का जेनन जी के लिए अर्थ है जलन महसूस करना, वगैरह। यह सूची लंबी हो सकती है। अब तो बाजार में लेटस्पीक कन्वर्टर भी आ गए हैं।
इस विरोध प्रदर्शन ने विरोध की भाषा और भावी दिशा की नई इबारत भी लिख दी है। पहले नारों में जोश, आक्रोश, निराशा, कटाक्ष ही झलकते थे। कभी-कभी वह अभद्रता को स्पर्श करते भी लगते थे। लेकिन इस विरोध प्रदर्शन में युवा अपना रोष सोशल मीडिया पर मीम्स, रील्स, प्लेकार्ड्स, स्टिकर्स और जीआईएफ के जरिए व्यक्त कर रहे हैं।
इनमें भी आक्रोश, कटाक्ष है लेकिन भाषा की मर्यादा का कोई तटबंध नहीं है। जो नारे सुनाई दिए उनमें कई तो प्रभावशाली थे, लेकिन कुछ नारे जो कानों को भद्दे और अश्लील लगे, वो इन युवाओं के लिए बिल्कुल ‘सहज’ हैं।
यह संस्कारों की परिभाषा का भी ’शिफ्ट’ है, जो हमारी परंपरागत सोच से मेल नहीं खाता। जो लोग सोशल मीडिया पर डाले जाने वाले रील्स, मीम्स, वीडियो और स्टैण्ड अप कॉमेडी वीडियो में जेनन जी द्वारा धड़ल्ले से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को जानते हैं, उन्हें पता है कि उसमें ‘वर्जित’ जैसा कुछ भी नहीं होता है। जो परोक्ष रहता था, वह प्रत्यक्ष बन गया है।
अश्लील जोक्स पर लड़कियां भी ठहाके लगाती हैं और गंदी गालियों के मामले में भी पुरूषों के एकाधिकार को सहजता से तोड़ती हैं। यह बदलते समाज में नारी स्वतंत्रता और स्वावलंबन का नया पहलू है। यानी जो लड़कों के लिए ‘मान्य’ है, वो सब हमारे लिए भी मान्य होना चाहिए। लैंगिक समता और समानता का यह अपेक्षाकृत नया मूल्य है।
यही कारण है कि अत्यंत अश्लील और खासकर भारतीय भाषा-बोलियों में स्त्री-पुरूष जननांगो और लैंगिक विभेद पर केन्द्रित गालियां भी जेनन जी धड़ल्ले से देने में संकोच नहीं कर रही हैं। धुम्रपान, सुरापान और ड्रग्स अब असामान्य बात नहीं है, वेशभूषा, केशभूषा और खानपान की मर्यादा भी टूट रही हैं तो भाषा और सामाजिक आचरण में उसका व्यक्त होना स्वाभाविक ही है, भले ही हम संस्कारों की कितनी ही माला जपते रहें।
गलत अर्थ में ही सही, स्त्री-पुरूष भेदभाव के परे जिंदगी की ‘यूनिफार्मिटी’ का यह आग्रह है, जो कहीं कोडिफाइड न हो, लेकिन युवाओं में सहज मान्य है। इस भाषा, इस तेवर की अभिव्यक्ति की कल को साहित्य और कलाओं में किस रूप में होगी, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन पारंपरिक मूल्यों और मानकों से काफी अलग होगी, यह तय है।
इसका अर्थ यही नहीं कि समूची जेनन जी ही ऐसी है, लेकिन जो दिख रहा है, वह बढ़ता ट्रेंड है, जो लीक अथवा परंपरा से हटकर जीने में, मान्य मूल्यों के प्रति बगावत करने और अपनी सोच समझ और दृष्टि को ही सही मानने के आग्रह से उपजा है। इसे संस्कार के डंडे से रोका जा सकता है, यह सिर्फ खाम खयाली अथवा पुरानी दुनिया में जीते रहने की जिद से ज्यादा कुछ नहीं है।
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