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इंस्टा पर पीएम का वीडियो: क्या इसे लोकतांत्रिक संस्कृति के नए अध्याय का आरंभ कहें?
सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा युवाओं के लिए इंस्टाग्राम पर साझा किया गया एक सहज मोबाइल वीडियो कुछ ही समय में करोड़ों लोगों तक पहुंचा। इस घटना को केवल किसी लोकप्रिय सोशल मीडिया पोस्ट की सफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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पीएम नरेंद्र मोदी इंस्टाग्राम वीडियो
- फोटो : instagram
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विस्तार
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां राजनीति केवल विचारों, नारों और चुनावी सभाओं से नहीं, अपितु संचार के बदलते माध्यमों से भी आकार ले रही है। कभी समाचार पत्रों के संपादकीय, रेडियो संदेश, चुनावी रैलियां और टेलीविजन बहसें जनमत निर्माण के सबसे प्रभावी साधन मानी जाती थीं। आज वही भूमिका तेजी से मोबाइल स्क्रीन निभा रही है।
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इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, पॉडकास्ट, लाइव स्ट्रीमिंग और मैसेजिंग प्लेटफॉर्मों ने राजनीति की भाषा, उसकी गति और जनता तक पहुंचने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, यह लोकतांत्रिक संस्कृति के नए अध्याय का आरंभ है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा युवाओं के लिए इंस्टाग्राम पर साझा किया गया एक सहज मोबाइल वीडियो कुछ ही समय में करोड़ों लोगों तक पहुंचा। इस घटना को केवल किसी लोकप्रिय सोशल मीडिया पोस्ट की सफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस नए युग का संकेत है, जहां राजनीतिक नेतृत्व यह स्वीकार कर चुका है कि यदि नागरिक डिजिटल मंचों पर सक्रिय हैं तो लोकतांत्रिक संवाद को भी उसी भाषा और उसी माध्यम में विकसित होना होगा। यह परिवर्तन किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं है। दुनिया के लगभग सभी बड़े लोकतंत्र अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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डिजिटल संचार की यात्रा
भारतीय राजनीति में डिजिटल संचार की यात्रा लगभग एक दशक पहले निर्णायक रूप से शुरू हुई। वर्ष 2014 के आम चुनावों ने पहली बार यह दिखाया कि सोशल मीडिया केवल प्रचार का सहायक माध्यम नहीं, अपितु चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ भी बन सकता है। ट्विटर, फेसबुक, 3डी रैलियां और डिजिटल अभियानों ने उस समय राजनीतिक संचार की नई दिशा निर्धारित की। इसके बाद सस्ते इंटरनेट, स्मार्टफोन की बढ़ती उपलब्धता और वीडियो-आधारित प्लेटफॉर्मों के विस्फोट ने राजनीति को पूरी तरह डिजिटल युग में पहुंचा दिया।
आज स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में युवा मतदाताओं को राजनीति और सरकार से जुड़ी पहली जानकारी किसी समाचार-पत्र या टेलीविजन चैनल से नहीं, अपितु मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाली एक छोटी-सी रील या वीडियो से मिलती है।
यही कारण है कि राजनीतिक संचार की शैली बदल गई है। पहले संदेश संस्थागत माध्यमों से प्रसारित होते थे। उनमें औपचारिकता अधिक होती थी। संवाद एकतरफा होता था। अब नेता सीधे कैमरे के सामने खड़े होकर कुछ सेकंड में अपनी बात कहते हैं, प्रतिक्रिया लेते हैं और नागरिकों से तत्काल संवाद स्थापित करते हैं। इससे राजनीति पहले की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष और व्यक्तिगत दिखाई देने लगी है। नई पीढ़ी औपचारिक भाषणों की अपेक्षा ऐसे सहज संवाद से अधिक जुड़ाव महसूस करती है।
डिजिटल राजनीति का यह प्रभाव केवल चुनावी अभियानों तक सीमित नहीं है। जंतर-मंतर सहित देश के अनेक आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि आधुनिक लोकतंत्र में हर नागरिक केवल प्रदर्शनकारी नहीं, अपितु संभावित संवादकर्ता भी है। पहले किसी आंदोलन की सफलता उसकी भीड़ और मीडिया कवरेज से आंकी जाती थी।
आज किसी भी प्रदर्शन का प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसकी तस्वीरें, वीडियो और संदेश डिजिटल मंचों पर कितनी तेजी से फैलते हैं। एक साधारण मोबाइल फोन अब केवल संचार का उपकरण नहीं, अपितु जनमत निर्माण का माध्यम भी बन चुका है।
इस परिवर्तन ने लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाया है। अब किसी छोटे कस्बे की समस्या भी कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन सकती है। कई बार नागरिकों द्वारा साझा किए गए वीडियो प्रशासनिक कार्रवाई का आधार बनते हैं। सड़क दुर्घटनाओं से लेकर भ्रष्टाचार, पर्यावरण, महिला सुरक्षा, स्थानीय प्रशासन की लापरवाही जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने जवाबदेही सुनिश्चित करने में सकारात्मक भूमिका निभाई है। इस अर्थ में डिजिटल मंचों ने नागरिक और शासन के बीच की दूरी कम की है।
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम
लेकिन, हर परिवर्तन अपने साथ नई चुनौतियां भी लेकर आता है। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम सामान्यतः उसी सामग्री को अधिक प्रसारित करता है, जो भावनात्मक, विवादास्पद या सनसनीखेज हो। परिणामस्वरूप कई बार गंभीर नीतिगत चर्चाएं पीछे छूट जाती हैं और उत्तेजक सामग्री सार्वजनिक विमर्श पर हावी हो जाती है। राजनीति भी इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं है।
चुनावी बहसें कई बार विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था जैसे मूल मुद्दों से हटकर वायरल वीडियो, ट्रेंडिंग हैशटैग और तात्कालिक विवादों तक सिमट जाती हैं। लोकतंत्र के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि लोकतांत्रिक निर्णय जितने अधिक तथ्यों पर आधारित होंगे, उनकी गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होगी।
दूसरी चुनौती सूचना की विश्वसनीयता से जुड़ी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के इस दौर में डीपफेक वीडियो, मॉर्फ्ड तस्वीरें, फेक न्यूज और संगठित दुष्प्रचार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से फैल रहे हैं। कुछ सेकंड का एक भ्रामक वीडियो लाखों लोगों की धारणा को प्रभावित कर सकता है। ऐसे समय में केवल तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं है।
नागरिकों में डिजिटल साक्षरता और तथ्य-जांच की समझ विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण जिम्मेदार सूचना का प्रसार भी है।
दुनिया के अनेक लोकतंत्र इसी परिवर्तन से गुजर रहे हैं। अमेरिका में चुनावी अभियानों के दौरान टिकटॉक, इंस्टाग्राम, पॉडकास्ट और यूट्यूब युवा मतदाताओं तक पहुंचने के प्रभावी माध्यम बन चुके हैं। यूरोप में कई नेता डिजिटल टाउनहॉल और लाइव स्ट्रीमिंग के माध्यम से नागरिकों से सीधे संवाद स्थापित कर रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका में भी चुनावी रणनीतियां तेजी से डिजिटल हो रही हैं।
भारत में यह परिवर्तन और भी व्यापक है, क्योंकि यहां दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता समुदायों में से एक निवास करता है। करोड़ों युवा प्रतिदिन कई घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि राजनीति भी वहीं पहुंचे जहां नागरिक मौजूद हैं।
फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि भविष्य के चुनाव केवल सोशल मीडिया पर ही जीते या हारे जाएंगे। भारतीय लोकतंत्र की शक्ति उसकी जमीनी संरचना में निहित है। बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार की विश्वसनीयता, विकास कार्य, सामाजिक समीकरण और मतदाताओं से प्रत्यक्ष संपर्क आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने पहले थे।
सोशल मीडिया वातावरण बना सकता है, मुद्दों को गति दे सकता है और जनमत को प्रभावित कर सकता है, लेकिन मतदान केंद्र तक मतदाता को पहुंचाने का कार्य आज भी संगठनात्मक क्षमता और स्थानीय विश्वास पर निर्भर करता है।
राजनीतिक दलों के सामने भी एक नई चुनौती है। उन्हें केवल लोकप्रिय सामग्री तैयार नहीं करनी, बल्कि विश्वसनीय और सार्थक संवाद भी स्थापित करना है। यदि डिजिटल मंच केवल प्रचार का माध्यम बनकर रह जाएंगे तो नागरिकों का विश्वास धीरे-धीरे कम होगा। दूसरी ओर, यदि इन्हीं मंचों का उपयोग नीति, जवाबदेही और संवाद के लिए किया जाएगा, तो लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा।
मीडिया संस्थानों के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है। पारंपरिक पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया को प्रतिस्पर्धी मानने के बजाय परस्पर पूरक समझने की आवश्यकता है। समाचार पत्रों की गहराई, तथ्य-जांच और विश्लेषण यदि डिजिटल मंचों की गति और पहुंच के साथ जुड़ जाए तो लोकतांत्रिक विमर्श अधिक समृद्ध हो सकता है।
पत्रकारिता का उद्देश्य केवल वायरल होना नहीं, बल्कि विश्वसनीय होना भी है। डिजिटल मंचों की बढ़ती शक्ति के साथ सरकारों और प्रौद्योगिकी कंपनियों की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। पारदर्शी एल्गोरिदम, प्रभावी तथ्य-जांच, फर्जी खातों पर नियंत्रण और उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता की रक्षा जैसे विषय अब केवल तकनीकी प्रश्न नहीं रहे। वे लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़े प्रश्न बन चुके हैं। नियमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की सबसे बड़ी नीति-चुनौतियों में से एक होगा।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य केवल डिजिटल होने में नहीं, अपितु जिम्मेदार डिजिटल होने में है। तकनीक ने नागरिकों और नेतृत्व के बीच की दूरी अवश्य कम कर दी है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत आज भी जागरूक नागरिक, स्वतंत्र मीडिया, मजबूत संस्थाएँ और स्वस्थ सार्वजनिक संवाद ही हैं। रील्स, शॉर्ट वीडियो और लाइव स्ट्रीमिंग आने वाले वर्षों में राजनीतिक संचार के प्रमुख माध्यम बने रहेंगे, किंतु लोकतंत्र का आधार आज भी विश्वास, तर्क, तथ्य और उत्तरदायित्व ही रहेगा।
इतिहास गवाह है कि हर युग अपनी भाषा और अपने संचार माध्यम स्वयं चुनता है। आज का लोकतंत्र डिजिटल भाषा बोल रहा है। चुनौती यह नहीं कि राजनीति सोशल मीडिया पर क्यों पहुंची? वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या डिजिटल राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक मजबूत बनाएगी या केवल शोर और तात्कालिक लोकप्रियता का माध्यम बनकर रह जाएगी। इस प्रश्न का उत्तर तकनीक नहीं, अपितु समाज, राजनीति, मीडिया और नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी तय करेगी।
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