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कोलकाता की हिंसा: विरोध की आड़ में साजिश या लोकतांत्रिक असहमति का भटकाव?
सार
कोलकाता में शिक्षा के मुद्दे पर आयोजित प्रदर्शन का हिंसक रूप लोकतांत्रिक आंदोलनों की मर्यादा पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। पुलिस, पत्रकारों और सार्वजनिक व्यवस्था को निशाना बनाने के आरोपों के बीच अब निष्पक्ष जांच ही यह तय करेगी कि यह स्वतःस्फूर्त आक्रोश था या विरोध की आड़ में रची गई सुनियोजित साजिश।
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बंगाल में भड़की हिंसा
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
शिक्षा में कथित भ्रष्टाचार और नीट परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन शुक्रवार को कोलकाता के धर्मतला में ऐसे मोड़ पर पहुंच गया, जहां शिक्षा का सवाल पीछे छूट गया और कानून-व्यवस्था, हिंसा तथा राजनीतिक टकराव केंद्र में आ गए।
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लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन जब आंदोलन हिंसक हो जाए, पुलिस और पत्रकार निशाने पर आ जाएं और सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती मिलने लगे, तब यह केवल विरोध नहीं रह जाता, बल्कि उसकी प्रकृति और उद्देश्य दोनों पर सवाल उठने लगते हैं।
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जुमे के दिन प्रदर्शन और उठते सवाल
शुक्रवार, यानी जुमे की नमाज के दिन आयोजित इस प्रदर्शन के समय और स्वरूप को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। घटनास्थल के वीडियो और तस्वीरों में बड़ी संख्या में ऐसे चेहरे दिखाई दे रहे हैं, जिनकी पहचान अब जांच एजेंसियों के लिए कठिन नहीं होगी।
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यदि जांच में यह साबित होता है कि आंदोलन में ऐसे लोग शामिल थे जिनका छात्र आंदोलन से कोई संबंध नहीं था, तो यह केवल भीड़ की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीति का संकेत भी हो सकता है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष केवल निष्पक्ष जांच के आधार पर ही निकलना चाहिए।
धर्मतला से टकराव तक
धर्मतला में सीजेपी के आह्वान पर आयोजित इस प्रदर्शन में वामपंथी छात्र संगठनों सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। राज्य सरकार का आरोप है कि डोरिना क्रॉसिंग पहुंचते ही भीड़ के एक हिस्से ने पुलिस पर जूते और पानी की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं। उद्देश्य पुलिस को उकसाना था ताकि लाठीचार्ज हो और आंदोलन को राजनीतिक रंग दिया जा सके।
मुख्यमंत्री का कहना है कि पुलिस को स्पष्ट निर्देश थे कि किसी भी उकसावे में नहीं आना है और संयम बनाए रखना है। उपलब्ध वीडियो भी संकेत देते हैं कि तनावपूर्ण माहौल के बावजूद पुलिस ने तत्काल बल प्रयोग से परहेज किया।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर चोट
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष पत्रकारों पर हमला रहा। पुलिस के अनुसार मीडिया संस्थानों की ओर से कई शिकायतें दर्ज कराई गईं और कम-से-कम छह पत्रकार घायल हुए, जिन्हें अस्पताल में उपचार कराना पड़ा।
लोकतंत्र में पत्रकार केवल घटनाओं के दर्शक नहीं होते, बल्कि जनता तक तथ्य पहुंचाने वाले माध्यम होते हैं। यदि किसी आंदोलन में मीडिया को जानबूझकर निशाना बनाया जाता है, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था—दोनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।
सात एफआईआर और गुंडा दमन कानून
राज्य सरकार ने घटना को गंभीर मानते हुए हेयर स्ट्रीट थाने में छह और एंटाली थाने में एक—कुल सात मामले दर्ज कराए हैं। पुलिस ने अवैध जमावड़ा, हिंसा, सरकारी कर्मचारियों के कार्य में बाधा, सार्वजनिक शांति भंग करने और उकसावे जैसी धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज किए हैं।
एक मामला पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज किया है, जबकि कई शिकायतें मीडिया संस्थानों की ओर से आई हैं। सरकार ने इन मामलों में गुंडा दमन कानून लागू करने का भी निर्णय लिया है, ताकि यदि संगठित आपराधिक तत्वों की भूमिका सिद्ध हो, तो उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा सके।
क्या आंदोलन में अपराधियों की घुसपैठ हुई?
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का दावा है कि अब तक जिन लगभग 70 लोगों की पहचान की गई है, उनमें से अधिकांश का न तो छात्र संगठनों से कोई संबंध है और न ही नीट आंदोलन से। उन्होंने राजाबागान, खिदिरपुर, एकबालपुर और वाटगंज क्षेत्रों के कुछ कथित कुख्यात अपराधियों के नाम सार्वजनिक करते हुए कहा कि कानून के तहत ऐसी कार्रवाई होगी जिसे अपराधियों की आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।
यह गंभीर आरोप है। यदि जांच में इसकी पुष्टि होती है, तो यह स्पष्ट होगा कि किसी वास्तविक जनआंदोलन को असामाजिक तत्वों ने अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने का प्रयास किया। लेकिन यदि आरोप सिद्ध नहीं होते, तो सरकार को भी अपने दावों का उत्तर देना होगा। इसलिए निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही सबसे महत्वपूर्ण है।
राजनीति की जिम्मेदारी भी कम नहीं
मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ वामपंथी छात्र संगठनों की आड़ में ऐसे लोग शामिल हुए जिनकी पहचान छात्र के रूप में नहीं की जा सकती। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि सरकार जनआंदोलन को दबाने के लिए कठोर कानूनों का सहारा ले रही है।
इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक दल अपने आंदोलनों की जवाबदेही स्वीकार करेंगे? किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह हिंसक तत्वों से स्वयं को अलग रख सके।
पुलिस का संयम एक सकारात्मक संकेत
घटना का एक सकारात्मक पक्ष पुलिस का संयम भी रहा। यदि वास्तव में पुलिस को उकसाया गया और उसने धैर्य बनाए रखा, तो यह लोकतांत्रिक प्रशासन की परिपक्वता का उदाहरण है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों का उद्देश्य केवल बल प्रयोग नहीं, बल्कि न्यूनतम बल के साथ शांति बनाए रखना होना चाहिए। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि यदि किसी पुलिसकर्मी की ओर से कहीं अति हुई हो, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच हो।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार, हिंसा का नहीं
शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और परीक्षा प्रणाली जैसे मुद्दों पर जनता का आक्रोश स्वाभाविक है। सरकारों को ऐसे आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था के चश्मे से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनके मूल कारणों का समाधान भी करना चाहिए। लेकिन आंदोलनों के आयोजकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि उनके मंच का इस्तेमाल हिंसा, अराजकता या आपराधिक तत्व करने लगें, तो सबसे पहले उसी आंदोलन की नैतिक शक्ति समाप्त हो जाती है।
आखिरकार, सवाल लोकतंत्र की मर्यादा का
कोलकाता की घटना केवल पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। यह पूरे देश के लोकतांत्रिक विमर्श के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या जनआंदोलन अपनी वैधता बनाए रखते हुए हिंसा से स्वयं को अलग रख पाएंगे?
यदि किसी आंदोलन में पत्रकारों पर हमले हों, पुलिस को उकसाया जाए और असामाजिक तत्व सक्रिय हो जाएं, तो उसका नुकसान केवल सरकार को नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति को भी होता है।
इसलिए आवश्यकता किसी पूर्वाग्रहपूर्ण निष्कर्ष की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की पुनर्स्थापना की है। विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु हिंसा उसकी सबसे बड़ी कमजोरी। यह अंतर जितनी जल्दी राजनीतिक दल, आंदोलनकारी संगठन और समाज समझेंगे, भारतीय लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।