फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Sarnath included in the World Heritage List

विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित सारनाथ

Sat, 25 Jul 2026 04:02 PM IST
Shubham Kewalia शुभम केवलिया
Updated Sat, 25 Jul 2026 04:02 PM IST
सार

तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में चक्रवर्ती शासक अशोक ने इस पवित्र स्थल पर कई निर्माण कार्य करवाए। अशोक ने यहां एक तीस मीटर ऊंचे स्तूप का निर्माण करवाया जिसे धर्मराजिका स्तूप कहा गया।

विज्ञापन
Sarnath included in the World Heritage List
विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित सारनाथ - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

सारनाथ, वह पवित्र स्थल जहां महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। आज सारनाथ विश्व पटल पर अंकित हो गया। इस स्थल का बौद्ध धर्म में महत्वपूर्ण स्थान है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार यह स्थान रिशिपत्न के नाम से जाना जाता था । यह वही स्थल है जहां ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात महात्मा बुद्ध ने अपने पांच साथियों को उपदेश दिया था । इसी घटना को बौद्ध ग्रंथों में धर्म चक्र प्रवर्तन कहा गया । द्वितीय शताब्दी का एक कुषाण कालीन शिलालेख इसकी चर्चा करता है । महात्मा बुद्ध ने इसी स्थान पर चार आर्य सत्यों की व्याख्या की थी । यहीं उन्होंने जीवन के दुःखों से मुक्ति प्राप्त करने हेतु अष्टांगिक मार्ग भी बताए थे । इतना ही नहीं तो जीवन में मध्यम मार्ग अपनाने की बात भी महात्मा बुद्ध ने यहीं बताई थी । सारनाथ ही वह पवित्र स्थल है जहां एक धनी पिता के बालक यास व उसके 54 मित्र महात्मा बुद्ध के अनुयायी बने व महात्मा बुद्ध ने पहले संघ की स्थापना यहीं की जिसमें 60 भिक्षुक थे तथा उन्हें धर्म का प्रसार करने के लिए देश के विभिन्न भागों में भेजा गया ।

विज्ञापन


तीसरी शताब्दी ईसापूर्व में चक्रवर्ती शासक अशोक ने इस पवित्र स्थल पर कई निर्माण कार्य करवाए। अशोक ने यहां एक तीस मीटर ऊंचे स्तूप का निर्माण करवाया जिसे धर्मराजिका स्तूप कहा गया। इसी स्थल पर उसने अशोक स्तंभ को प्रतिष्ठित किया, इस स्तंभ के शीर्ष पर सिंह प्रतिमाएं विद्यमान थी जो उसके शौर्य कि परिचायक थीं। इसी सिंह शीर्ष को स्वतंत्र भारत ने अपने राष्ट्रीय चिह्न के रूप में स्वीकार किया। यहां मौजूद एक और स्तूप जिसे धमेक स्तूप कहा जाता है वह भी पुरातत्वविदों के अनुसार अशोक के काल में ही बनवाया गया था। जिन शुंग शासकों को इतिहास में बौद्ध द्रोही बताया गया उन शुंग शासकों के काल में अर्थात द्वितीय व प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में यहां विद्यामान विशाल स्तूप के चारों ओर प्रस्तर निर्मित वेदिकाओं (रेलिंग) का निर्माण करवाया गया। 
विज्ञापन


यह पुरातात्विक साक्ष्य इतिहास में वर्णित बौद्ध-हिन्दू संघर्ष पर प्रश्न चिन्ह खड़े करता है। कुषाण शासकों के काल में भी पवित्र स्थल सारनाथ का महत्व विद्यमान रहा। इस वंश के प्रतापी शासक कनिष्क के शासन काल में बौद्ध भिक्षु जिसका नाम बल था उसने यहां लाल बलुआ पत्थर से निर्मित बोधिसत्व की एक प्रतिमा व एक विशाल छत्र की प्रतिष्ठा करवाई थी। कुषाणों के ही काल में सारनाथ में कुछ विहारों का भी निर्माण करवाया गया। सारनाथ में निर्माण कार्य का क्रम यहीं नहीं रुका। चक्रवर्ती गुप्त शासकों के काल में भी सारनाथ कला व स्थापत्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा। यहां विद्यमान धमेक स्तूप को गुप्त शासकों के काल में अलंकृत प्रस्तरों से सुसज्जित कर उसकी सुंदरता को निखारा गया । महान शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में भारत आए चीनी यात्री फाहयान ने यह विवरण दिया की सारनाथ में चार स्तूप व दो विशाल विहार विद्यमान हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

 

Sarnath included in the World Heritage List
विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित सारनाथ - फोटो : Adobe Stock

सातवीं शताब्दी ईस्वी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आए चीनी यात्री हुएनसांग ने भी सारनाथ के विषय में विस्तृत विवरण दिया। उसके अनुसार सारनाथ में महात्मा बुद्ध की धातु से निर्मित एक विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इस प्रतिमा में महात्मा बुद्ध को धर्म चक्र को घुमाते हुए दिखाया गया है। उसने यहां विशाल विहार होने का विवरण दिया साथ ही यह भी उल्लेख किया की सारनाथ में 1500 से अधिक बौद्ध भिक्षु निवास करते हैं। ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत पर हुए मुस्लिम आक्रमण से सारनाथ भी अछूता नहीं रहा। ऐसा प्रतीत होता है की यहां स्थित विहार व स्तूपों को नुकसान पहुंचाया गया। परन्तु 1026 ईस्वी में स्थिरपाल व वसंतपाल नामक दो भाईयों ने धर्मराजिका स्तूप को हुए नुकसान के बाद वहां पुनर्निर्माण कार्य करवाया।

बारहवीं शताब्दी सारनाथ के वैभव की अंतिम शताब्दी रही । इस काल में गढ़वाल शासक गोविन्द चंद्र की पत्नी कुमारदेवी ने यहां एक विशाल विहार की स्थापना करवाई जिसे धर्मचक्र जिन विहार कहा गया । बारहवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में हुए इस्लामिक आक्रमणों के बोझ तले सारनाथ का यह पवित्र स्थल इतिहास में खो गया । काल के चक्र में खो चुके इस एतिहासिक पुरास्थल को पुनर्स्थापित किया भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग व स्वतंत्र पुराविदों ने । कभी कर्नल मेंकेंजी तो कभी ऐलेकजेंडर कनिंघम, समय-समय पर विभाग द्वारा यहां पुरातात्विक उत्खनन संपादित किए गए । इन उत्खननों के फलस्वरूप कई मनौती स्तूप, विहार, बौद्ध- शैव प्रतिमाएँ आदि पुरावशेष प्रकाश में आए।

 इन सभी पुरावशेषों को सारनाथ स्थित संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। सारनाथ के स्मारकों को भारत सरकार ने राष्ट्रीय धरोहर के रूप में स्वीकार किया। विश्व धरोहरों की संभावित सूची में तो सारनाथ सन् 1998 से था। 28 वर्षों की दीर्घकालीन प्रतीक्षा के पश्चात अंततः संपूर्ण विश्व को शांति का संदेश देने वाले महात्मा बुद्ध से संबंधित इस पवित्र व एतिहासिक पुरास्थल को विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित करना स्वागत योग्य है ।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed