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मोहन जोदड़ो की प्रसिद्ध 'डांसिंग गर्ल' विवाद: क्या अब इतिहास को भी फोटोशॉप किया जाएगा?
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सार
मोहनजोदड़ो की 4500 वर्ष पुरानी 'डांसिंग गर्ल' को लेकर उठा विवाद केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं है। यह इतिहास, शिक्षा, कला और आधुनिक नैतिकता के बीच चल रही एक गहरी बहस का संकेत है। जिस प्रतिमा को दशकों तक विद्यार्थी उसके मूल स्वरूप में पढ़ते रहे, आज उसे बदलकर प्रस्तुत करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
क्या हम इतिहास को उसके अपने संदर्भों में समझना चाहते हैं, या वर्तमान की संवेदनशीलताओं के अनुरूप उसे संपादित कर रहे हैं? डांसिंग गर्ल का विवाद अंततः एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि उस दृष्टि का विवाद है जिससे हम अपने अतीत, अपनी संस्कृति और अपनी अगली पीढ़ी को देखते हैं।
मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध 'डांसिंग गर्ल' को लेकर उठा विवाद।
- फोटो : गिरीश उपाध्याय
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विस्तार
कभी-कभी एक छोटी-सी तस्वीर बड़े प्रश्न खड़े कर देती है। मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध 'डांसिंग गर्ल' को लेकर हाल में उठा विवाद भी कुछ ऐसा ही है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की एक पुस्तक में लगभग 4500 वर्ष पुरानी इस कांस्य प्रतिमा की छवि को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि उसका मूल स्वरूप बदल गया।
इसके बाद इतिहासकारों, शिक्षाविदों और कला विशेषज्ञों के बीच बहस शुरू हो गई। कुछ लोगों ने इसे एक मामूली संपादकीय निर्णय माना, जबकि कुछ ने इसे इतिहास और कला की प्रस्तुति में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया। आलोचकों का तर्क था कि किसी पुरातात्विक कलाकृति के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप को केवल संपादकीय निर्णय कहकर नहीं टाला जा सकता।
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पहली नजर में यह विवाद केवल एक तस्वीर का विवाद लगता है। लेकिन थोड़ा गहराई से देखने पर यह प्रश्न कहीं अधिक व्यापक दिखाई देता है। यह केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि इतिहास, शिक्षा, संस्कृति, कला और समाज की उस दृष्टि का प्रश्न है जिसके माध्यम से हम अपने अतीत को देखते हैं। मूल सवाल यह है कि क्या हम इतिहास को समझना चाहते हैं या उसे अपनी वर्तमान सुविधाओं और असहजताओं के अनुसार संपादित करना चाहते हैं?
विवाद की पृष्ठभूमि यह है कि एनसीईआरटी की कला शिक्षा से संबंधित एक पुस्तक में डांसिंग गर्ल की छवि को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि उसके शरीर का ऊपरी हिस्सा मूल प्रतिमा की तुलना में ढंका हुआ दिखाई देने लगा।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस निर्णय के पीछे यह तर्क सामने आया था कि स्कूली विद्यार्थियों के लिए चित्रण को अधिक उपयुक्त बनाया जाए। हालांकि इस कदम की आलोचना करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि किसी ऐतिहासिक कलाकृति के मूल स्वरूप में इस प्रकार का परिवर्तन इतिहास और कला की प्रामाणिक प्रस्तुति से जुड़ा प्रश्न खड़ा करता है।
प्रतिमा नहीं, संदर्भ का प्रश्न
डांसिंग गर्ल भारतीय पुरातत्व की सबसे चर्चित खोजों में से एक है। 1926 में मोहनजोदड़ो से प्राप्त यह छोटी-सी कांस्य प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की कलात्मक और तकनीकी उपलब्धियों का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। लगभग चार इंच ऊंची यह प्रतिमा अपने आकार से कहीं अधिक बड़ी सांस्कृतिक उपस्थिति रखती है।
इसमें एक युवती का आत्मविश्वास से भरी मुद्रा में खड़ा होना, हाथों में पहनी चूड़ियां और सहज मुद्रा उसे भारतीय पुरातत्व की सबसे पहचान योग्य कला-आकृतियों में शामिल करते हैं। इतिहास की पुस्तकों में यह केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि एक सभ्यता का प्रतिनिधि चेहरा है।
दशकों से देश के लाखों विद्यार्थियों ने इस प्रतिमा को उसके मूल स्वरूप में देखा और पढ़ा है। उसने किसी सामाजिक संकट को जन्म नहीं दिया। उसने नैतिक पतन की कोई लहर पैदा नहीं की। उसने विद्यार्थियों को इतिहास से विमुख नहीं किया। फिर अचानक ऐसा क्या बदल गया कि अब उसके मूल स्वरूप को लेकर असहजता महसूस होने लगी?
प्रतिमा नहीं बदली है... इतिहास नहीं बदला है … सभ्यता नहीं बदली है... बदली है तो उसे देखने वाली हमारी दृष्टि। और यहीं से यह बहस महत्वपूर्ण हो जाती है।
हम इतिहास को किस दृष्टि से देखें?
इतिहास का उद्देश्य केवल गौरवगान करना नहीं होता। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि अलग-अलग समय में समाज कैसे सोचते थे, कैसे रहते थे और स्वयं को कैसे अभिव्यक्त करते थे। इतिहास को समझने का अर्थ है अतीत को उसके अपने एवं तत्कालीन संदर्भों में समझना।
यदि हम हर ऐतिहासिक वस्तु का मूल्यांकन वर्तमान सामाजिक मान्यताओं और नैतिक धारणाओं के आधार पर करने लगें, तो इतिहास की बड़ी धारा को समझना कठिन हो जाएगा।
दरअसल प्रत्येक युग की अपनी संवेदनशीलताएं होती हैं। जो बात एक समय में सामान्य मानी जाती है, वह दूसरे समय में असहज लग सकती है। लेकिन इतिहास का अध्ययन इसी कारण महत्वपूर्ण है कि वह हमें अपने समय की सीमाओं से बाहर निकलकर दूसरे समय की वास्तविकताओं को देखने का अवसर देता है।
यदि हम अतीत को लगातार वर्तमान की कसौटी पर कसते रहेंगे, तो अंततः इतिहास की वास्तविकता धुंधली पड़ जाएगी और उसकी जगह हमारी कल्पनाएं ले लेंगी।
एक पीढ़ी का विरोधाभास
इस पूरे विवाद का सबसे रोचक पक्ष शायद यह है कि जिस पीढ़ी ने दशकों तक डांसिंग गर्ल को उसके मूल स्वरूप में देखा और पढ़ा, वही पीढ़ी आज नैतिक मूल्यों, सामाजिक मर्यादाओं और सार्वजनिक जीवन की शुचिता की सबसे बड़ी समर्थक मानी जाती है। उस समय किसी को यह भय नहीं था कि एक पुरातात्विक प्रतिमा विद्यार्थियों के संस्कारों को प्रभावित कर देगी। उस पीढ़ी ने वही प्रतिमा देखी, वही इतिहास पढ़ा और उसी समाज का निर्माण किया जिसे आज हम मूल्य आधारित समाज कहने का प्रयास करते हैं।
इसके विपरीत आज की पीढ़ी ऐसे डिजिटल संसार में रह रही है जहां स्मार्टफोन उसकी जेब में है, इंटरनेट उसकी उंगलियों पर है और दुनिया भर का दृश्य संसार उसके सामने खुला हुआ है। सोशल मीडिया, ओटीटी मंच, वीडियो प्लेटफॉर्म और अनगिनत वेबसाइटें ऐसी सामग्री उपलब्ध कराती हैं जिसकी कल्पना भी शायद पिछली पीढ़ियां नहीं कर सकती थीं। ऐसे समय में यदि 4500 वर्ष पुरानी एक कांस्य प्रतिमा को लेकर असहजता पैदा होती है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हम वास्तव में किससे डर रहे हैं?
क्या हम इतिहास से डर रहे हैं? क्या हम बच्चों से डर रहे हैं? या हम अपनी ही झिझक को इतिहास पर आरोपित कर रहे हैं? और यही वे प्रश्न हैं जिनसे बचना कठिन है।
फिर खजुराहो का क्या होगा?
इस बहस का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय कला परंपरा से जुड़ा है। यदि यह मान लिया जाए कि विद्यार्थियों को ऐतिहासिक कलाकृतियों के मूल स्वरूप से बचाया जाना चाहिए, तो फिर हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत के अनेक हिस्सों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। खजुराहो के मंदिरों की मूर्तियां, कोणार्क का स्थापत्य, अजंता और एलोरा की कलात्मक अभिव्यक्तियां तथा भारतीय मूर्तिकला की अनेक
परंपराएं तब किस श्रेणी में आएंगी?
क्या उनके चित्रों को भी पाठ्यपुस्तकों से हटाया जाएगा? क्या उनके कलात्मक विवरणों को ढंक दिया जाएगा? क्या संग्रहालयों में उनके सामने चेतावनी पट्टिकाएं लगाई जाएंगी? क्या खजुराहो जैसे स्थलों पर 18 वर्ष से कम आयु के लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाएगा?
जाहिर है ऐसा न तो व्यावहारिक है और न ही सांस्कृतिक दृष्टि से स्वीकार्य। इसलिए समस्या कलाकृतियों में नहीं है। समस्या उन्हें देखने की हमारी दृष्टि में है।
भारतीय कला की अपनी दृष्टि
भारतीय कला परंपरा को समझने के लिए यह याद रखना आवश्यक है कि हमारे यहां शरीर को हमेशा उसी दृष्टि से नहीं देखा गया जिस दृष्टि से आधुनिक समाज अक्सर देखता है। भारतीय मूर्तिकला में शरीर केवल जैविक उपस्थिति नहीं, बल्कि सौंदर्य, ऊर्जा, जीवन और सृजन का प्रतीक भी रहा है। खजुराहो और कोणार्क की मूर्तियां केवल काम या देह की अभिव्यक्ति नहीं हैं; वे मनुष्य, प्रकृति, आध्यात्मिकता और जीवन की समग्रता की कलात्मक व्याख्याएं भी हैं।
यहां एक और प्रश्न उभरता है। क्या हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भारतीय दृष्टि से देख रहे हैं, या अब भी कहीं न कहीं औपनिवेशिक नैतिकता के चश्मे से उसका मूल्यांकन कर रहे हैं? इतिहासकारों ने लंबे समय से यह संकेत किया है कि विक्टोरियन नैतिकता ने भारतीय कला और मूर्तिकला को देखने की एक विशेष दृष्टि विकसित की थी। संभव है कि उसके कुछ प्रभाव आज भी हमारी सामूहिक चेतना में मौजूद हों।
शिक्षा का उद्देश्य क्या है?
शिक्षा के संदर्भ में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को वास्तविकता से परिचित कराना है या उन्हें उससे बचाकर रखना? यदि किसी ऐतिहासिक कलाकृति को देखकर प्रश्न पैदा होते हैं, तो क्या यह शिक्षा के लिए अवसर नहीं है? क्या हमें विद्यार्थियों को यह नहीं समझाना चाहिए कि किसी सभ्यता की कला को उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में कैसे पढ़ा जाता है?
ज्ञान का उद्देश्य जिज्ञासा को दबाना नहीं, बल्कि उसे दिशा देना है। यदि हम हर कठिन या असुविधाजनक प्रश्न को हटाने लगेंगे, तो शिक्षा धीरे-धीरे सूचना तक सीमित होकर रह जाएगी। विवेक, विश्लेषण और आलोचनात्मक सोच का विकास तभी संभव है जब विद्यार्थी प्रश्न पूछ सकें और जटिल विषयों को समझ सकें।
इतिहास और संपादन के बीच की रेखा
हमें यह भी समझना होगा कि इतिहास की व्याख्या बदलना और इतिहास को बदल देना दो अलग-अलग बातें हैं। नए शोध इतिहास की नई व्याख्याएं प्रस्तुत कर सकते हैं। नई खोजें पुराने निष्कर्षों को चुनौती दे सकती हैं। यह एक स्वस्थ बौद्धिक प्रक्रिया है। लेकिन किसी ऐतिहासिक स्रोत या कलाकृति के मूल स्वरूप को बदलकर प्रस्तुत करना एक अलग प्रश्न है। वहां बहस केवल व्याख्या की नहीं, बल्कि प्रामाणिकता की हो जाती है।
असली प्रश्न क्या है?
डांसिंग गर्ल का विवाद अंततः एक प्रतिमा का विवाद नहीं है। यह उस नजर का विवाद है जिससे हम अपने अतीत को देखते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि इतिहास कैसा था। प्रश्न यह है कि हम इतिहास को कितना स्वीकार कर पाते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि विद्यार्थी क्या देखेंगे। प्रश्न यह है कि हम उन्हें क्या समझाएंगे।
संभव है इस प्रश्न का कोई एक अंतिम उत्तर न हो। लेकिन इतना निश्चित है कि इतिहास को समझने की पहली शर्त उसकी वास्तविकता का सम्मान करना है। अतीत को समझने के लिए उससे संवाद करना आवश्यक है, उसे ढंकना नहीं। क्योंकि जिस दिन हम इतिहास को पढ़ने के बजाय उसे फोटोशॉप करने लगेंगे, उस दिन हम केवल अतीत को नहीं बदल रहे होंगे, बल्कि भविष्य की समझ को भी सीमित कर रहे होंगे।
और शायद यही कारण है कि 4500 वर्ष पुरानी वह छोटी-सी कांस्य नृत्यांगना आज भी हमें आईना दिखा रही है। संभव है उस आईने में हम इतिहास से ज्यादा खुद को देख रहे हों।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।