टीएमसी: बागी गुट का यह 'दल शोधन' कहीं उल्टा न पड़ जाए
TMC crisis: अगर इस बागी गुट के विलय को संसद में अलग बैठने की मान्यता मिल गई तो जो पार्टी कल तक मच्छर की हैसियत भी नहीं रखती थी, वो आज 20 सांसदों के साथ मगरमच्छ की तरह अन्य क्षेत्रीय पार्टियों को डराने की स्थिति में होगी।
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अगर इस बागी गुट के विलय को संसद में अलग बैठने की मान्यता मिल गई तो जो पार्टी कल तक मच्छर की हैसियत भी नहीं रखती थी, वो आज 20 सांसदों के साथ मगरमच्छ की तरह अन्य क्षेत्रीय पार्टियों को डराने की स्थिति में होगी। हम अभी तक अर्थशास्त्र में शेल कंपनियों ( मुखौटा अथवा खोखा कंपनियां की बात सुनते थे, जो कंपनी एक्ट में रजिस्टर्ड तो होती हैं, लेकिन उन्हें केवल धन शोधन ( मनीलांड्रिंग), काले धन को सफेद करने, पैसों की हेराफेरी तथा कर अपवंचन की नीयत से बनाया जाता है। लेकिन अब भाजपा के पश्चिम बंगाल माॅडल के तहत राजनीतिक ‘दल शोधन’ ( पाॅलिटिकल पार्टी लांड्रिंग) का नया जुमला वजूद में आ गया है। हालांकि इस ‘दल शोधन फार्मूले’ की कामयाबी में कई कानूनी और संवैधानिक पेंच हैं, लेकिन यह सफल हो गया तो हमे भविष्य में इसके नए एप्लीकेशन भी देखने को मिल सकते हैं।
नैतिक दृष्टि से इस ‘दल शोधन’ फार्मूले की आलोचना हो रही है। क्योंकि यह निष्ठाहीन, सिद्धांतविहीन सत्ताकेन्द्रित राजनीति को वैधता प्रदान करने जैसा है। खुद भाजपा में भी इसके औचित्य पर लोग प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जब आर्थिकी में इस तरह का धन शोधन अनुचित है तो राजनीति में इस दल शोधन को कैसे उचित माना जा सकता है? इस ‘दल शोधन’ ने देश में दलबदल कानून की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। अगर यानी कानूनी की पतली गलियां ही ज्यादा असरदार हैं तो ऐसे कानून का क्या मलतब? हालांकि भाजपा जैसी साधन से ज्यादा साध्य को परम मानने वाली पार्टी की सोच है कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ किसमें यह देखना अहम है, न कि इसके दीर्घकालीन औचित्य-अनौचित्य के बारे में सोचना। पार्टी का मानना है कि संसद में मोदी सरकार द्वारा दो माह पूर्व लाए गए महिला आरक्षण और परिसीमन बिल दो तिहाई बहुमत के अभाव में गिर गए थे, उन्हें पास कराने के लिए किसी भी तरीके से संख्या बल जुटाना है। और इस ‘ पुनीत’ कार्य को पूरा करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सब जायज है। हालांकि ‘दल शोधन’ इन पारंपरिक चार कारकों से भी अलग है।
इस स्तम्भ में पहले भी लिखा जा चुका है कि बीजेपी का राजनीतिक पश्चिम बंगाल माॅडल उसके पूर्ववर्ती माॅडलों की तुलना में अलग होगा, फिर भी इतना ज्यादा अलग होगा, यह राजनीतिक प्रेक्षकों के सोच के परे की बात रही है। माना यही जा रहा था कि भाजपा महाराष्ट्र माॅडल की तरह बंगाल में अब विपक्ष में बैठी टीमएमसी को तोड़कर नया गुट बनवाएगी या फिर उसे अपने में मर्ज कर लेगी। लेकिन ऐसा करने में कई कानूनी जटिलताएं और किंतु परंतु हैं और वक्त कम है, क्योंकि भाजपा को अर्जुन की तरह 2029 का लोकसभा चुनाव दिखाई दे रहा है। लिहाजा पुराने नुस्खों की जगह दूर की कौड़ी लाई गई।
त्रिपुरा में रजिस्टर्ड एक गुमनाम सी पार्टी नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी आॅफ इंडिया’ पर दांव खेला गया। यह पार्टी त्रिपुरा के कुंडू दंपति और शांतनु डे ने 20 जनवरी 2023 को मजे-मजे में रजिस्टर्ड कराई थी। इसका मुख्यालय हावड़ा में है। लेकिन उसे चुनाव आयोग से मान्यता नहीं मिली है। एनसीपीआई ने उसी साल त्रिपुरा विस चुनाव में दो सीटों पर चुनाव लड़ा। सात किरणों वाली पेन की निब इस पार्टी का चुनाव चिन्ह है। चुनाव में उसे कुल जमा 822 वोट और 1.13 लाख रू. का चुनावी चंदा मिला। पति उत्तीय कुंडू और पत्नी शिवली कुंडू खुद को समाज सेवी बताते हैं। शिवली पहले कोषाध्यक्ष थीं, अब वो उससे अलग हो गई हैं। अब सवाल यह कि टीएमसी से अलग हुए 20 सांसदों के गुट को संसद में अलग मान्यता दिलाने की जगह एक अज्ञातकुलशील पार्टी में विलय का विचार कैसे और कहां से आया? ये सौदेबाजी किसने की? उत्तीय कुंडू का भाजपा से क्या सम्बन्ध है? यह चमत्कारिक विलय इतने गोपनीय ढंग से कैसे हो गया? और क्या ऐसा विलय जायज है? इस पार्टी का अध्यक्ष पद भी बागी सांसदों में से एक ज्योतिप्रकाश चटर्जी के पास कैसे चला गया और पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष उत्तीय कुंड़ू ने खुशी खुशी अपनी पार्टी को हाई जैक कैसे हो जाने दिया? इसके पीछे कौन सा लेन-देन अथवा अंडरस्टैंडिंग बनी? सवाल कई हैं।
फिलहाल तो भाजपाई अपने इस नवाचारी दांव पर मुग्ध हैं। लेकिन जानकार इसकी वैधानिकता और स्थायित्व पर सवाल उठा रहे हैं। पहला और अहम सवाल तो यही है कि यही है कि क्या टीएमसी के चुनाव चिह्न और टिकट पर लोकसभा पहुंचे ये सांसद ख़ुद को किसी और पार्टी के साथ जोड़ सकते हैं या नहीं? क्या संसद सदस्यों (या विधायकों) का कोई समूह ख़ुद को अलग करके दूसरे राजनीतिक दल के साथ विलय कर सकता है या नहीं? या इसके लिए जिस राजनीतिक दल से वो निर्वाचित हुए हैं उसका सहमत होना आवश्यक है?
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य के मुताबिक इस मामले में क़ानून स्पष्ट है कि किसी राजनीतिक दल का तो विलय हो सकता है लेकिन निर्वाचित सदस्यों के समूह का नहीं, भले ही उनकी संख्या दो-तिहाई से अधिक हो। बागी सांसद चूंकि सांसद तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुने गए हैं, इसलिए उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू होगा। वे अपनी मर्जी से किसी भी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो सकते, अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन यदि चुनाव आयोग इन बाग़ी सांसदों के दल को ही मूल तृणमूल कांग्रेस घोषित कर देता है तब यह क़ानून लागू नहीं होगा। आचार्य के मुताबिक मौजूदा क़ानून के तहत बाग़ी निर्वाचित सदस्यों की संख्या का कोई अर्थ नहीं है। कानून कहता है कि पहले मूल पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय होगा, फिर उसके सदस्य नए दल में शामिल सकते हैं। यानी बागी सांसद भले ही ख़ुद के एनसीपीआई में विलीन होने की घोषणा कर रहे हों लेकिन क़ानूनन वे टीएमसी के सदस्य ही हैं।
इसका सीधा अर्थ यह है कि ‘दल शोधन’ का यह रास्ता भारी जोखिमों से भरा है। राजनीतिक विश्लेषकों का तो कहना है कि यदि इस कथित विलय को मंज़ूरी मिल जाती है तो इसके गंभीर राजनीतिक मायने होंगे। यानी बड़ा झटका क्षेत्रीय पार्टियों को लगेगा। यह दल शोधन उनके राजनीतिक विनाश की घंटी है। जहां तक उत्तीय कुंडू और भाजपा के रिश्तों की बात है तो बंगाल में भाजपा की बंपर जीत के बाद उत्तीय कुंडू ने 13 मई को अपने फेसबुक पेज पर पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के साथ एक तस्वीर साझा की थी। इसका बंगाली में कैप्शन था ‘सिर्फ सपने देखने के दिन खत्म हो गए हैं, अब उन्हें सच करने का समय है।
इसी तरह टीएमसी के बागी सांसदों के विलय से पहले उत्तीय ने फेसबुक पर एक पोस्ट साझा की। इसमें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की तस्वीरें थीं। पोस्ट में लिखा था, अहंकार पतन का कारण बनता है। सत्ता के नशे में लोग अक्सर भूल जाते हैं कि सत्ता स्थायी नहीं होती और जनता का समर्थन ही असली ताकत है…जो आज शिखर पर हैं, उन्हें कल समय को जवाब देना होगा।”जाहिर है टीएमसी बागी गुट के विलय की पटकथा लिखने में उत्तीय और शुभेंदु की बड़ी भूमिका लगती है। दूसरी तरफ टीएमसी बागी गुटों में भी सांसद और विधायक अलग अलग राह चल रहे हैं। जबकि पार्टी पर ममता बैनर्जी की पकड़ अभी बहुत कमजोर नहीं हुई है। बहरहाल इस ‘दल शोधन’ का अंजाम क्या होगा, ये देखना दिलचस्प है। कहीं ‘धन शोधन’ की तरह यह भी भारी न पड़ जाए।
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