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पश्चिम एशिया संघर्षः बुद्ध मुस्कुराए लेकिन दिलों का मिलना बाकी है

Hari Verma हरि वर्मा
Updated Tue, 16 Jun 2026 05:44 PM IST
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सार

अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच बुद्ध की राह में फिलहाल त्रिकोणीय पेंच फंसता नजर आ रहा है। बिना शुल्क होर्मुज जलडमरुमध्य खोलने और अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने पर प्रारंभिक सहमति बन गई है। लेकिन परमाणु-यूरेनियम संवर्द्धन और ईरान की जब्त 25 अरब डॉलर की संपत्ति वापसी को लेकर सस्पेंस कायम है।

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डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

पश्चिम एशिया संघर्ष के 107 दिनों बाद बुद्ध मुस्कुराए लेकिन स्थायी वैश्विक शांति के लिए 60 दिनों के रोडमैप में कई चुनौतियां बाकी हैं। अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते की शर्तों पर से अभी पूरी तरह से पर्दा नहीं उठा है।



ऐसे में देश-दुनिया को भी 19 जून (शुक्रवार) का इंतजार है, जब दोनों के बीच समझौते पर औपचारिक मुहर लगेगी। दोनों देश डील के मसौदे पर प्रारंभिक प्रक्रिया के तहत  भले डिजिटल हस्ताक्षर कर चुके हों लेकिन दिलों का मिलना अभी बाकी है।
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अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच बुद्ध की राह में फिलहाल त्रिकोणीय पेंच फंसता नजर आ रहा है। बिना शुल्क होर्मुज जलडमरुमध्य खोलने और अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने पर प्रारंभिक सहमति बन गई है, जिस पर शुक्रवार को मुहर भी लग जाने के आसार हैं लेकिन परमाणु-यूरेनियम संवर्द्धन और ईरान की जब्त 25 अरब डॉलर की संपत्ति वापसी को लेकर सस्पेंस कायम है।
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इन मुद्दों पर शांति के लिए 60 दिन का रोडमैप तैयार किया गया है। इसी बीच इस्राइल ने लेबनान में डटे रहने की जिद कर गुत्थी और उलझा दी है। त्रिकोणीय पेंच फंसता गया है।

इस्त्राइल के तीखे तेवर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब अमेरिका और ईरान के वार्ताकार मो. वाघेर गालिबाफ शांति के प्रारंभिक मसौदे पर डिजिटल हस्ताक्षर कर रहे थे, तभी लेबनान पर इस्त्राइली हमले में एक शख्स की मौत हो गई।

बता दें कि ईरान की शांति शर्तों में एक शर्त यह भी है कि लेबनान में हमले बंद हों लेकिन इस्त्राइल लेबनान से न सेना हटाने को तैयार है, न पीछे हटने को और न ही हिजबुल्ला को बख्शने को। ऐसे में अमेरिका-ईरान के बीच दोस्ती की राह में इस्राइल की जिद अड़चन है। ईरान को युद्ध के नुकसान की भरपाई या पुनर्निर्माण मद में अमेरिका करीब 300 अरब डॉलर की मदद देगा भी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। 

परमाणु मुद्दे पर ईरान के इरादे पर सीआईए का शक जतानाचिंता का विषय है। ऐसे में स्थायी वैश्विक शांति के लिए शुक्रवार को होने वाले समझौते पर दुनिया की निगाहें टिकने की वजह यह भी है कि जब 27 फरवरी को युद्ध शुरू हुआ तो करीब 40 दिन बाद 8 अप्रैल को युद्ध विराम की घोषणा हो गई लेकिन बार-बार संघर्ष विराम टूटे। तीन तरफा हमले होते रहें। दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ ऊर्जा (तेल-ईंधन-गैस) आपूर्ति व्यवस्था छलनी होती रही।

यही वजह है कि इस बार प्रारंभिक मसौदे पर सहमति के 24 घंटे के भीतर ही अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को पीछे हटने पर देख लेने की चेतावनी दे डाली। युद्ध के दौरान अमेरिका-ईरान के बीच सुबह गलबहियां और शाम होते-होते हमले के हालात बार-बार पैदा होते रहें। सुबह बनी बात के रात तक बिगड़ने की स्थितियां बार-बार बनीं।

तेल-गैस-ईंधन संकट होगा दूर?

हालांकि, इस बार उम्मीद की किरण जगी है। दोनों देशों के साथ-साथ दुनिया भी युद्ध के नुकसान को महसूस कर चुकी है। इसलिए महज प्रारंभिक समझौता मसौदे से ही दुनिया में खुशी की लहर दौड़ पड़ी है। ऊर्जा-ईंधन संकट झेल रही दुनिया को कच्चे तेल के मोर्चे पर तत्काल बड़ी राहत मिली है।

युद्ध शुरू होने से पहले कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत 67 डॉलर प्रति बैरल थी जो बढ़ते-बढ़ते 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, अब शांति की उम्मीदों के बीच घटकर फिर 83 डॉलर प्रति बैरल आ गई है। यह मूल्य 107 दिनों के युद्ध में 90 दिन (तीन महीने) का सबसे न्यूनतम है। उम्मीद करें कि होर्मुज के खुलते ही जैसे आवाजाही सामान्य होगी, देश-दुनिया में तेल-गैस-ईंधन को लेकर बना कृत्रिम संकट धीरे-धीरे दूर होगा। 

सामुद्रिक गतिविधियों पर नजर रखने वाली कंपनियां एआईएस,केप्लर, एलएसईजी मानती हैं कि अभी भी दुनिया सतर्क है लेकिन समझौता मसौदे के पहले ही दिन भारतीय एलएनजी टैंकर दिशा होर्मुज से निकल आया। हालांकि होर्मुज में कई भारतीय जहाज अभी फंसे हैं, जिनकी राह आसान हो जाएगी। दिशा की तरह तीन महीने से फंसे ये जहाज भी भारत की दिशा में अग्रसर हो पाएंगे।

वैश्विक बाजार पर इसका असर

पश्चिम एशिया संघर्ष की वजह से जो राजनीतिक और आर्थिक संकट पैदा हुआ, उससे दुनिया को सालाना 2 खरब डॉलर के नुकसान का आकलन किया जा रहा है और अभी तो महज युद्ध के 107 दिन ही हुए हैं  और दुनिया का बाजार पूरी तरह से धड़ाम हो चुका है। महंगाई आसमान छूने लगी है।

देश में इस महीने थोक महंगाई का ग्राफ बढ़कर 9.68 फीसदी यानी डबल डिजिट के करीब पहुंच गया। महंगाई के इस आंकड़े में अकेले पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि की वजह से 50 फीसदी तक का छौंका लगा। पेट्रोलियम और ईंधन संकट की मार अन्य उत्पादों की महंगाई पर भी पड़ी।

हालांकि, शांति समझौते की एक उम्मीद से भारतीय बाजार में दो-तीन दिनों के कारोबारी दिवस में करीब दो हजार से अधिक अंकों की बढ़त हुई है। युद्ध के पहले सेंसेक्स 81 हजार के पार था, जो अब फिर से 76 हजार के स्तर पर पहुंच गया है। सोना की चमक लौटी है। अब 2500 रुपये प्रति दस ग्राम बढ़कर 1,59 लाख तक पहुंच गया है जो युद्ध के पूर्व की चमक के करीब है।

रुपया भी मजबूत हुआ है। इस बार की उम्मीदों ने भारत ही नहीं दुनिया भर में (दक्षिण कोरिया में कॉस्पी, जापान में निक्केई को 5 फीसदी तक, अमेरिका और यूरोपीय देशों में भी) बढ़त ला दी है। राहत की बात यह है कि भारत का निर्यात-आयात बढ़ा है और चालू खाता 4.7 अरब डॉलर सरप्लस है।

 पिछले 12 वर्षों में भारत का निर्यात 446 अरब डॉलर से करीब दोगुना 863 अरब डालर पर पहुंच गया है जिसकी बदौलत वैश्विक संकट की इस चुनौतीपूर्ण घड़ी में भी भारतीय अर्थव्यवस्था सबसे तेजी से बढ़ रही है।  युद्द के बीच बुद्ध की मुस्कान का भारत, रूस, चीन, जर्मनी, फ्रांस, कतर, तुर्किए, यूएन और ईयू ने तहे दिल से स्वागत किया है। ऐसे में शांति समझौते के जल्द प्रभावी हो जाने से स्थायी वैश्विक शांति की उम्मीद तो जगती ही है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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