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मुद्दा: स्वच्छ भारत का सपना अधूरा क्यों है? सीवर में मौतें नहीं थम रहीं, सफाईकर्मियों की सुरक्षा पर बड़े सवाल

Thu, 06 Aug 2026 06:52 AM IST
K C Tyagi के. सी. त्यागी
Updated Thu, 06 Aug 2026 06:52 AM IST
सार

स्वच्छ भारत का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक सीवर की जहरीली गैसों से मरते सफाईकर्मियों को सम्मानजनक सुरक्षा का अधिकार नहीं मिलेगा।

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Dream of Swachh Bharat Be Achieved Without Ensuring Sanitation Workers Safety
स्वच्छ भारत की अनसुनी हकीकत - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

संसद के बजट सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने स्वीकारा कि वर्ष 2017 से 17 मार्च, 2026 तक देशभर में 622 और दिल्ली में 62 मजदूर सीवर और सेप्टिक टैंकों की मैनुअल सफाई करते हुए जहरीली गैस से दम घुटने के कारण मौत के शिकार हो चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 और 2023 में स्पष्ट निर्देश दिए कि सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई पूरी तरह सुरक्षित और अधिकतम मशीनीकृत तरीके से होनी चाहिए। लेकिन, ये सरकारी आंकड़े इन निर्देशों के पालन न होने की गवाही देते हैं।

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नियमों के अनुसार, किसी भी कर्मचारी को बिना सुरक्षा इंतजामों के सीवर या सेप्टिक टैंक में उतारना प्रतिबंधित है। विशेष परिस्थितियों में अंदर जाना जरूरी हो, तो टैंक की जहरीली गैसों तथा ऑक्सीजन स्तर की जांच करना, हेलमेट, पीपीई किट, दस्ताने, गमबूट, सेफ्टी हार्नेस, गैस डिटेक्टर और जरूरत पड़ने पर श्वसन उपकरण उपलब्ध कराना अनिवार्य है। मौके पर प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। शीर्ष न्यायालय के निर्देशानुसार राज्यों और स्थानीय निकायों को इन सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराने और उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए गए हैं।
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यद्यपि, निजी स्तर पर सेप्टिक टैंकों की सफाई में सक्षम मशीनों और अन्य उपकरणों का इस्तेमाल पहले की तुलना में बढ़ा है, पर समस्या इनके अधूरे या गलत उपयोग की है। कई मामलों में मशीनों से केवल तरल अपशिष्ट निकाला जाता है, जबकि टैंक के तल में जमी गाद को हटाने के लिए मजदूरों को भीतर उतार दिया जाता है।
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देश की आजादी के लंबे समय बाद भी कुछ कार्य एक विशेष वर्ग के जिम्मे है, जो सदियों से जाति-व्यवस्था की चक्की में पिस रहा है। महात्मा गांधी अपने अंतिम दिनों में रात्रि विश्राम सफाईकर्मियों की बस्तियों में करते थे, ताकि इन वर्गों की दुर्दशा और दुर्गति देश की चिंता का हिस्सा बन सके। गांधी जी अपना मल स्वयं साफ करते थे और साबरमती आश्रम में रहने वालों के लिए भी जरूर नियम था कि वे अपना शौच स्वयं साफ करें। डॉ. भीमराव अांबेडकर का भी मानना था कि भारत में कोई व्यक्ति अपने काम की वजह से नहीं, बल्कि जन्म के चलते सफाईकर्मी है। जातिगत व्यवस्था की जकड़ से बंधे हुए ये बेबस लोग आज भी समाज में सर्वाधिक तिरस्कृत हैं।

केंद्र सरकार ने हाथ से मैला सफाई व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में 1.25 लाख करोड़ रुपये की लागत से नेशनल एक्शन प्लान तैयार किया है। इसके तहत 500 शहरों समेत बड़ी ग्राम पंचायतों में सफाई के लिए हाईटेक मशीनों का इस्तेमाल किया जाना है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक, सेप्टिक टैंकों की सफाई करने वाले मजदूरों को टीबी व हैजा जैसी गंभीर बीमारियां घेरे रहती हैं। कई मौकों पर दिहाड़ी मजदूरों से भी इन टैंकों की सफाई कराई जाती है। यद्यपि, स्वच्छ भारत अभियान केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है, पर चिंताजनक है कि इसके बजट में कोई वृद्धि नहीं हुई। एक अनुमान के मुताबिक, लगभग आठ लाख भारतीय सिर पर मैला ढोने का काम करते हैं। इनमें अधिकांश संविदा पर होते हैं। शुष्क शौचालयों की सफाई की प्रक्रिया भी जटिल और अपमानजनक है।

26 जून, 2026 को पश्चिमी दिल्ली के मुंडका औद्योगिक क्षेत्र की दर्दनाक घटना ने जरूर अखबारों की सुर्खियां बटोरीं, जिसमें अरुण, चांद और संदीप की सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से मौत हो गई थी। पुलिस और दमकल विभाग के अनुसार, एक मजदूर टैंक के अंदर उतरा, तो कोई प्रतिक्रिया न होने पर दूसरा मजदूर नीचे गया और वह भी बाहर नहीं आया। तीसरा व्यक्ति उन दोनों की तरह जहरीली गैस की चपेट में आकर मृत्यु का शिकार बन गया। मौत का वास्तविक कारण सेप्टिक टैंक और सीवर में मौजूद घातक गैसें हैं, जिनमें हाइड्रोजन सल्फाइड, मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड और अमोनिया की उपस्थिति उल्लेखनीय है। इन गैसों की अधिक मात्रा होने पर ऑक्सीजन का स्तर तेजी से घट जाता है। हाइड्रोजन सल्फाइड विशेष रूप से घातक मानी जाती है। इसकी अधिक मात्रा में केवल एक-दो सांस लेने से व्यक्ति बेहोश हो सकता है और कुछ ही मिनटों में मौत हो जाती है। मुंडका मामले में प्रारंभिक जांच के बाद यही प्रमाणित हुआ है।


इस मामले की जांच शुरू हो चुकी है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की कठोर धाराओं के प्रावधान भी शामिल हैं। लेकिन, अब वक्त आ गया है कि इस घोर अमानवीयता का अंत हो, ताकि समाज की मुख्यधारा से बाहर धकेले गए नागरिकों को उनके सांविधानिक व मानव अधिकार प्राप्त हो सकें।

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