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सफर की यादों में कश्मीर और कश्मीरियत: जहां आपसदारी गहराती रही और भरोसा बढ़ता रहा..!

Thu, 06 Aug 2026 01:41 PM IST
Shriram Jaysawal श्रीराम जायसवाल
Updated Thu, 06 Aug 2026 01:41 PM IST
सार

अयान ने हमें अपने घर ले जाकर भरपूर सम्मान दिया। विदा के समय जब मैंने शिकारे के किराये से अधिक पैसे देने चाहे, तो उसने मुस्कुराते हुए मेरे हाथ वापस कर दिए और कहा- नहीं सर... बिल्कुल नहीं। आप मेरे मेहमान हैं। आपने मेरे बुलावे पर मेरे घर आकर हमें सम्मान दिया, यही हमारे लिए सबसे बड़ी बात है। उस क्षण लगा कि इंसानियत, अपनापन और विश्वास—ये तीनों आज भी इस देश की सबसे बड़ी पूंजी हैं।

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jammu and kashmir travelogue experience with local kashmiri people love and harmony
कश्मीर - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

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भरोसा जताने के लिए शुक्रिया..."

डल झील के शिकारा चालक अयान ने कहा- "सर, मेरे घर चलेंगे?" कुछ क्षण के लिए मन में संकोच था। हाल की दुखद घटनाओं के कारण मेरी बेटी ने भी धीरे से पूछा- "पापा, कहीं कोई खतरा तो नहीं?" लेकिन हमने भरोसा किया और अयान के साथ उसके घर पहुंचे। वहां उसकी मां, मासी, बड़ी बहन और पूरे परिवार ने जिस आत्मीयता से हमारा स्वागत किया, वह जीवनभर याद रहेगा। कहवा, चाय, नाश्ता, ड्राई फ्रूट, स्थानीय फल—सब कुछ प्रेमपूर्वक हमारे सामने रखा गया। उन्होंने अपना घर, अपना जीवन और अपनी संस्कृति हमसे साझा की। विदा के समय अयान की माँ ने जो कहा, वह आज भी कानों में गूंजता है- हमें बहुत अच्छा लगा... आपने हम पर भरोसा जताया।

इन कुछ शब्दों में वर्षों की पीड़ा, अविश्वास और विश्वास की उम्मीद—सब कुछ समाया हुआ था। अयान ने भी अतिरिक्त पैसे लेने से साफ़ इनकार कर दिया और मुस्कुराकर कहा— आप मेरे मेहमान हैं। आपने मेरे बुलावे पर हमारे घर आकर हमें सम्मान दिया, यही हमारे लिए सबसे बड़ी बात है।" विश्वास, सम्मान और इंसानियत—यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

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श्रीनगर की डल झील में शिकारा यात्रा के दौरान हमारे शिकारा चालक अयान ने मुस्कुराते हुए पूछा- "सर, खरीदारी करनी है, भीड़-भाड़ वाले इलाके में घूमना है या शांत जगह देखनी है?" हमने कहा कि हमें न खरीदारी करनी है और न ही भीड़ में जाना है, बस डल झील का वास्तविक सौंदर्य देखना है। अयान धीरे-धीरे शिकारा को हाउसबोटों के बीच से निकालकर संकरी जल-गलियों की ओर ले गया। कुछ देर बाद भीड़-भाड़ पीछे छूट चुकी थी। थोड़ी देर बाद बड़ी सहजता व प्रेम से अयान ने पूछा "सर मेरे घर चलेंगे ?", हमने भी तपाक से कहा ले चलो। थोड़ी दूर संकरी जल गलियों में चलते हुए चारों ओर पानी, बीच-बीच में खेती की जमीन और उसी शांत वातावरण में लकड़ी का बना उसका तीन मंजिला सुंदर घर दिखाई दिया।
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मेरे साथ मेरी बेटी भी थी। उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़कर पूछा, "पापा... कहीं कोई खतरा तो नहीं?" उसका डर स्वाभाविक था। दो दिन पहले ही श्रीनगर क्षेत्र में ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे छत्तीसगढ़ के दो मजदूरों की उनके हिंदू नाम होने के कारण आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। ऐसे माहौल में किसी अनजान व्यक्ति के घर जाना सहज निर्णय नहीं था। हम अयान के घर पहुँचे। वहां उसकी मां, मासी, बड़ी बहन और परिवार के अन्य सदस्य अत्यंत आत्मीयता से मिले। उन्होंने पूरे घर का एक-एक कमरा दिखाया। लकड़ी के उस तीन मंजिला घर में लगभग आठ कमरे, लॉबी और डाइनिंग हॉल था। बड़ी बहन के नवजात शिशु से भी मिलवाया गया। बार-बार कहवा, चाय और नाश्ते का आग्रह किया गया। हमने विनम्रतापूर्वक मना किया, लेकिन अयान की माँ ने स्नेहपूर्वक ड्राई फ्रूट और स्थानीय फल भेंटस्वरूप हमारे हाथ में रख दिए। घर के आसपास सेब, नाशपाती, अनार, मक्का, टमाटर, मिर्च और कद्दू की खेती थी। ऊपर के कमरे में कद्दू और पालक को काटकर सुखाया जा रहा था। पूछने पर बताया गया कि यह कश्मीर की सर्दियों की तैयारी है। जब चारों ओर बर्फ पड़ती है और महीनों ताज़ी सब्जियाँ नहीं मिलतीं, तब यही सुखाई हुई सब्जियाँ भोजन का सहारा बनती हैं।

जब विदा होने का समय आया, तब अयान की मां और उनकी मासी ने जो शब्द कहे, वे आज भी मन में गूंजते हैं- "हमें बहुत अच्छा लगा... आपने हम पर भरोसा जताया।" यह केवल एक धन्यवाद नहीं था, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति भी थी जिसे वर्षों की हिंसा और अविश्वास ने जन्म दिया है। उन शब्दों में एक मौन आग्रह था कि विश्वास फिर से लौटे। इस यात्रा से लौटते समय मेरे मन में भी एक विचार आया- भरोसा दोनों ओर से बनता है। यदि कश्मीर का हर नागरिक राष्ट्रहित, सद्भाव और भारत के प्रति अपने अपनत्व की भावना को निरंतर मजबूत करेगा, तो वह दिन दूर नहीं जब किसी मेहमान के घर आने पर यह नहीं कहना पड़ेगा कि "हम पर भरोसा जताने के लिए धन्यवाद।" विश्वास तब सामान्य बात होगी, अपवाद नहीं।

इस पूरे अनुभव की सबसे सुंदर बात यह रही कि अयान ने हमें अपने घर ले जाकर भरपूर सम्मान दिया। विदा के समय जब मैंने शिकारे के किराये से अधिक पैसे देने चाहे, तो उसने मुस्कुराते हुए मेरे हाथ वापस कर दिए और कहा—

"नहीं सर... बिल्कुल नहीं। आप मेरे मेहमान हैं। आपने मेरे बुलावे पर मेरे घर आकर हमें सम्मान दिया, यही हमारे लिए सबसे बड़ी बात है।" उस क्षण लगा कि इंसानियत, अपनापन और विश्वास ये तीनों आज भी इस देश की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
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