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बरसात और सर्पदंश की घटनाएं: सांपों का खतरा और डराने वाले आंकड़े
सार
भारत में सर्पदंश की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए "मिलियन डेथ स्टडी" सबसे विश्वसनीय अध्ययनों में से एक है। वर्ष 2000 से 2019 तक चले इस अध्ययन के अनुसार इन 20 वर्षों में देश में लगभग 12 लाख लोगों की सर्पदंश से मृत्यु हुई, अर्थात औसतन हर वर्ष करीब 58 हजार मौतें।
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बारिश के सीजन में सांपों से कैसे बचें?
- फोटो : Amar Ujala AI
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विस्तार
बरसात का मौसम अपने चरम पर है। इसके साथ ही सर्पदंश का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। यही वह समय होता है जब सांपों के काटने की घटनाएं और उनसे होने वाली मौतें सबसे अधिक होती हैं। खेतों में काम करने वाले किसान, मजदूर, ग्रामीण महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं। ऐसे में मानसून के दौरान सावधानी, जागरूकता और समय पर उपचार हजारों लोगों की जान बचा सकते हैं।
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भारत विश्व का वह देश है जहां सर्पदंश एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 50 हजार लोगों की मृत्यु सर्पदंश के कारण होती है, जो विश्वभर में होने वाली ऐसी कुल मौतों का लगभग आधा हिस्सा है। सर्पदंश केवल मृत्यु का कारण नहीं बनता, बल्कि स्थायी दिव्यांगता, आर्थिक संकट और परिवारों पर गहरा मानसिक बोझ भी छोड़ जाता है।
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भारत में सर्पदंश की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए "मिलियन डेथ स्टडी" सबसे विश्वसनीय अध्ययनों में से एक है। वर्ष 2000 से 2019 तक चले इस अध्ययन के अनुसार इन 20 वर्षों में देश में लगभग 12 लाख लोगों की सर्पदंश से मृत्यु हुई, अर्थात औसतन हर वर्ष करीब 58 हजार मौतें।
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इनमें लगभग आधी मौतें 30 से 69 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की थीं, जबकि एक-चौथाई से अधिक पीड़ित 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे थे। अधिकांश घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों, घरों के आसपास या खेती-बाड़ी के दौरान हुईं।
लगभग 70 प्रतिशत मौतें बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे कृषि प्रधान राज्यों में दर्ज की गईं, जहां मनुष्यों और सांपों का संपर्क अपेक्षाकृत अधिक होता है।
वर्ष 2025 में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'नेचर कम्युनिकेशंस' में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित किया। पांच जिलों में एक वर्ष के दौरान 7,094 सर्पदंश के मामले दर्ज किए गए, जिनमें लगभग आधी मौतें अस्पताल पहुंचने से पहले ही हो गईं।
अध्ययन के अनुसार 64 प्रतिशत पीड़ित पुरुष थे और 30 से 39 वर्ष आयु वर्ग सबसे अधिक प्रभावित पाया गया। उपचार पर औसतन 6,500 रुपये का खर्च आया, जबकि निजी अस्पतालों में यह 27 हजार रुपये से भी अधिक पहुंच गया। सबसे चिंताजनक तथ्य यह था कि लगभग 48 प्रतिशत पीड़ित गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों से थे।
अनुमान है कि भारत में हर वर्ष दो से तीन लाख सर्पदंश के मामले सामने आते हैं। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत मामलों में विष शरीर में फैल जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 81 हजार से 1.38 लाख ऐसे मामले होते हैं। वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में घटनाएं दर्ज ही नहीं हो पातीं।
आज भी कई लोग अस्पताल जाने के बजाय झाड़-फूंक, ओझा या घरेलू उपचार का सहारा लेते हैं, जिससे उपचार में देरी होती है और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
सर्पदंश का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका मौसमी स्वरूप है। मिलियन डेथ स्टडी के अनुसार लगभग आधी मौतें दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती हैं और जुलाई इसका सबसे संवेदनशील महीना है। 'नेचर कम्युनिकेशंस' के अध्ययन में भी 62 प्रतिशत से अधिक मामले केवल मानसून के दौरान दर्ज किए गए। अक्टूबर से जनवरी के बीच लगभग 20 प्रतिशत घटनाएं होती हैं, जबकि वर्ष के शेष महीनों में इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है।
बारिश के मौसम में सर्पदंश बढ़ने के पीछे स्पष्ट वैज्ञानिक कारण हैं। लगातार वर्षा से सांपों के बिलों में पानी भर जाता है, जिससे वे सुरक्षित और सूखे स्थानों की तलाश में खेतों, घरों, झाड़ियों और मानव बस्तियों की ओर आ जाते हैं।
दूसरी ओर यही समय जुताई, बुवाई और अन्य कृषि कार्यों का भी होता है, जिससे मनुष्यों और सांपों का आमना-सामना बढ़ जाता है। विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि मानसून के दौरान सर्पदंश की घटनाएं सामान्य दिनों की तुलना में चार से पांच गुना तक बढ़ सकती हैं।
भारत में सर्पदंश से होने वाली अधिकांश गंभीर घटनाओं के लिए चार प्रमुख विषैले सांप जिम्मेदार माने जाते हैं—भारतीय नाग, करैत, रसेल्स वाइपर और आरीदार फुरसा। इनमें करैत विशेष रूप से खतरनाक है क्योंकि यह रात में अधिक सक्रिय रहता है और कई बार सोते समय काटता है। ऐसे मामलों में पीड़ित को देर से इसका पता चलता है, जिससे उपचार में विलंब हो जाता है।
समस्या की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में सर्पदंश नियंत्रण एवं रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना शुरू की है। इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों को आधा करना है।
इस योजना के अंतर्गत विषरोधी औषधि की उपलब्धता बढ़ाने, स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण, बेहतर निगरानी, जन-जागरूकता और अनुसंधान पर विशेष बल दिया गया है। असम जैसे कुछ राज्यों में इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं।
सर्पदंश से बचाव के लिए कुछ सरल सावधानियां अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकती हैं। बारिश के मौसम में खेतों, जंगलों या घास वाले क्षेत्रों में जाते समय लंबे जूते, मोटे मोजे और टॉर्च का प्रयोग करें। घर के आसपास झाड़-झंखाड़ साफ रखें तथा चूहों की संख्या नियंत्रित करें, क्योंकि वे सांपों का प्रमुख भोजन हैं।
रात में मच्छरदानी का उपयोग करें। यदि सांप दिखाई दे तो उसे मारने का प्रयास न करें, बल्कि सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए वन विभाग या प्रशिक्षित बचाव दल को सूचना दें।
यदि किसी व्यक्ति को सांप काट ले तो घबराने के बजाय उसे शांत रखें और प्रभावित अंग को यथासंभव स्थिर रखें। घाव पर चीरा न लगाएं, विष चूसने का प्रयास न करें और न ही कसकर पट्टी बांधें। झाड़-फूंक में समय न गंवाकर पीड़ित को तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल पहुंचाएं, जहां विषरोधी औषधि उपलब्ध हो।
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में विषरोधी औषधि की कमी, समय पर अस्पताल न पहुंच पाना और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों का अभाव बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि अनेक मौतें उपचार में देरी के कारण हो जाती हैं। सर्पदंश का सबसे अधिक बोझ गरीब, आदिवासी और कृषि आधारित समुदायों पर पड़ता है, जहां उपचार का खर्च और कामकाज का नुकसान पूरे परिवार को संकट में डाल देता है।
सर्पदंश कोई ऐसी प्राकृतिक आपदा नहीं है जिस पर नियंत्रण न पाया जा सके। यह एक ऐसी स्वास्थ्य चुनौती है, जिसे समय पर उपचार, पर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं और जन-जागरूकता के माध्यम से काफी हद तक रोका जा सकता है।
बरसात के मौसम में थोड़ी-सी सावधानी, सही जानकारी और त्वरित चिकित्सा सहायता हर वर्ष हजारों लोगों का जीवन बचा सकती है। याद रखें, सर्पदंश की स्थिति में सही निर्णय ही जीवन और मृत्यु के बीच सबसे बड़ा अंतर साबित हो सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।