पश्चिम बंगाल: सत्ता बदली, लेकिन जो सबसे पहले बदलना था वह नहीं बदला
सत्ता परिवर्तन के बाद बहुत कुछ बदलने की उम्मीद थी, लेकिन जिस चीज में सबसे पहले बदलाव अपेक्षित था, वही अब सवालों के घेरे में है-राजनीतिक संरक्षण में चलने वाली वसूली, कटमनी और जमीन-मकान पर दबंगई की शिकायतें। यदि आम आदमी को इन मामलों में वही भय और असहायता महसूस होती रहे, तो बदलाव की सबसे बड़ी राजनीतिक कसौटी अधूरी ही मानी जाएगी।
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन को अभी कुछ ही सप्ताह हुए हैं, लेकिन राजनीति की उस संस्कृति को लेकर सवाल उठने लगे हैं, जिसके खिलाफ जनता ने बदलाव का जनादेश दिया था। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमीक भट्टाचार्य को बार-बार अपनी ही पार्टी के लोगों को चेतावनी देनी पड़ रही है कि तोलाबाजी, कटमनी और जबरन घर-दुकान पर कब्जे की प्रवृत्ति तत्काल बंद हो। वह समयसीमा भी दे रहे हैं और कह रहे हैं कि ऐसा नहीं हुआ तो कार्रवाई की जाएगी। साथ ही उनका स्पष्ट कहना है कि भाजपा की राजनीतिक संस्कृति ऐसी नहीं है।
झंडा बदला, क्या संस्कृति भी बदली?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन चेतावनियों का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है। चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए लोगों के एक हिस्से पर फिलहाल इसका रत्ती भर असर पड़ता दिखाई नहीं देता। यह स्थिति भाजपा के लिए इसलिए अधिक गंभीर है, क्योंकि इनमें ऐसे लोग भी हैं जिनकी राजनीतिक पहचान कल तक उसी व्यवस्था से जुड़ी थी, जिसके खिलाफ भाजपा ने लंबे समय तक आंदोलन किया।
राजनीतिक दल बदलना आसान है, राजनीतिक संस्कार बदलना कठिन। किसी व्यक्ति के हाथ में पार्टी का झंडा बदल जाने से उसकी कार्यशैली और राजनीतिक संस्कृति अपने आप नहीं बदल जाती। यही वह चुनौती है जिसका सामना आज पश्चिम बंगाल में भाजपा को करना पड़ रहा है।
तृणमूल की सबसे बड़ी कमजोरी से सबक
तृणमूल कांग्रेस की लगभग डेढ़ दशक की सत्ता के दौरान तोलाबाजी, कटमनी, राजनीतिक संरक्षण में जमीन और संपत्ति पर कब्जे तथा स्थानीय स्तर पर दबंगई जैसे आरोप उसकी छवि से जुड़ते चले गए। यही मुद्दे धीरे-धीरे उसके खिलाफ राजनीतिक असंतोष का कारण बने। जनता ने सत्ता परिवर्तन किया तो उसके पीछे केवल सरकार बदलने की इच्छा नहीं थी, बल्कि शासन और राजनीतिक व्यवहार में बदलाव की अपेक्षा भी थी।
ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाने तक सीमित नहीं है। असली परीक्षा यह साबित करने की है कि भाजपा उसी राजनीतिक संस्कृति का नया चेहरा नहीं बनेगी।
15 साल बनाम 15 सप्ताह
तृणमूल कांग्रेस को इन आरोपों और शिकायतों के बीच सत्ता में करीब 15 साल मिले। भाजपा को सत्ता संभाले अभी 15 सप्ताह भी पूरे नहीं हुए हैं और उसके प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ रहा है कि तोलाबाजी और कटमनी बंद करो, लोगों के घर-दुकान पर कब्जा मत करो।
समय का यह अंतर अपने आप में महत्वपूर्ण है। किसी नई सरकार के शुरुआती दौर में ऐसी शिकायतें सामने आना और पार्टी नेतृत्व को तत्काल चेतावनी जारी करनी पड़ना इस बात का संकेत है कि सत्ता परिवर्तन के साथ पुराने राजनीतिक नेटवर्क और हित पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती
- भाजपा की पहली चुनौती संगठनात्मक है। उसे यह तय करना होगा कि तृणमूल से आए नेताओं और कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल केवल चुनावी गणित के लिए किया जाए या उन्हें पार्टी की घोषित राजनीतिक संस्कृति में ढाला भी जाए।
- दूसरी चुनौती नैतिक और राजनीतिक है। भाजपा ने जिस व्यवस्था के खिलाफ जनता से वोट मांगे, यदि उसी व्यवस्था की शिकायतें उसके शासन में भी सुनाई देने लगें तो जनता के लिए दोनों में अंतर करना मुश्किल होगा।
यही कारण है कि शमीक भट्टाचार्य की चेतावनियां केवल अनुशासन का मामला नहीं हैं। वे भाजपा की विश्वसनीयता की परीक्षा भी हैं। अगर पार्टी वास्तव में मानती है कि तोलाबाजी, कटमनी और कब्जे की राजनीति उसकी संस्कृति नहीं है तो उसे यह बात केवल भाषणों में नहीं, कार्रवाई के जरिए साबित करनी होगी।
सत्ता बदलना आसान, संस्कृति बदलना कठिन
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ता परिवर्तन निश्चित रूप से बड़ा बदलाव है, लेकिन लोकतांत्रिक बदलाव की असली सफलता तभी मानी जाएगी जब शासन की कार्यशैली भी बदले। जनता ने यदि एक राजनीतिक संस्कृति को खारिज किया है तो उसके सबसे विवादित तौर-तरीकों को नए राजनीतिक झंडे के नीचे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
भाजपा के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि वह जनता को यह भरोसा दिला सकती है कि सत्ता परिवर्तन का अर्थ केवल शासक का बदलना नहीं, बल्कि शासन के तौर-तरीकों का बदलना भी है। चुनौती इसलिए कि चुनाव के समय दूसरे दलों से आए लोगों को साथ लेते हुए वह अपनी राजनीतिक पहचान और अनुशासन को कमजोर न होने दे।
तृणमूल कांग्रेस ने करीब 15 साल सत्ता में रहकर जिन गलतियों की राजनीतिक कीमत चुकाई, भाजपा को उनसे सीखने के लिए 15 साल इंतजार करने की जरूरत नहीं है। अगर वही शिकायतें सत्ता परिवर्तन के महज 15 सप्ताह के भीतर उसके खिलाफ उठने लगें तो यह नई सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है।
पश्चिम बंगाल में सवाल अब यह नहीं है कि सत्ता किसकी है। सवाल यह है कि सत्ता की संस्कृति किसकी होगी। अगर झंडा बदल गया लेकिन तोलाबाजी, कटमनी और दबंगई का तरीका नहीं बदला, तो फिर सत्ता परिवर्तन अधूरा ही माना जाएगा।
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