{"_id":"6a73f95fabb6c37c660d4b9a","slug":"firefly-walks-and-nature-walks-connecting-people-with-nature-where-have-natural-stars-of-earth-actually-gone-2026-08-06","type":"story","status":"publish","title_hn":"दूसरा पहलू: लोगों को प्रकृति से जोड़ रहे ‘फायरफ्लाई वॉक’ और नेचर वॉक, आखिर कहां गए जमीन के वे कुदरती सितारे?","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
दूसरा पहलू: लोगों को प्रकृति से जोड़ रहे ‘फायरफ्लाई वॉक’ और नेचर वॉक, आखिर कहां गए जमीन के वे कुदरती सितारे?
Thu, 06 Aug 2026 08:33 AM IST
ज्योति भास्कर
अभिषेक कुमार सिंह
अभिषेक कुमार सिंह
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 06 Aug 2026 08:33 AM IST
सार
जुगनू अपने साथी की खोज अंधेरे में करते हैं। उनकी चमक ही उनका संवाद है। कृत्रिम रोशनी उनकी इस प्राकृतिक भाषा को बाधित कर देती है। दुनिया के कई देशों में अब ‘डार्क स्काई’, यानी अंधेरी रातों के संरक्षण को पर्यावरण नीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। भारत में ‘फायरफ्लाई वॉक’ और नेचर वॉक जैसे कार्यक्रम लोगों को प्रकृति से जोड़ रहे हैं।
विज्ञापन
जुगनू - फाइल फोटो।
- फोटो : संवाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राजधानी दिल्ली में कुछ जुझारू लोगों का समूह इस मानसून में अंधेरे के प्राकृतिक दीपों, यानी जुगनुओं की खोज में जुटे हैं। एक दौर था, जब बरसात की रातें सिर्फ बारिशों की नहीं, टिमटिमाती रोशनियों की भी होती थीं। खेतों की मेड़, गांव की पगडंडी, नदी किनारे की झाड़ियां और पेड़ों की छाया में अनगिनत जुगनू ऐसे चमकते थे, मानो धरती ने आसमान के तारों को उधार ले लिया हो। आज ये नजारे कहानी बन चुके हैं। आखिर ऐसा क्यों हुआ?
विज्ञापन
इसकी एक बड़ी वजह है कृत्रिम रोशनी। सड़कों, पार्कों, वृक्षों के इर्द-गिर्द रात घिरते ही छाने वाला अंधेरा प्रगति के साथ सतह से गायब हो गया है। भारत सहित पूरी दुनिया में कृत्रिम रोशनी की व्यवस्था ने रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग समाप्त कर दिया। विज्ञान कहता है कि जुगनू अपने साथी की खोज अंधेरे में करते हैं। उनकी चमक ही उनका संवाद है। नर और मादा एक-दूसरे को विशिष्ट प्रकाश संकेतों से पहचानते हैं। कृत्रिम रोशनी इस प्राकृतिक भाषा को बाधित कर देती है। नतीजतन, उनका प्रजनन प्रभावित होता है और उनकी संख्या घटने लगती है।
विज्ञापन
दुनिया के कई देशों में अब ‘डार्क स्काई’, यानी अंधेरी रातों के संरक्षण को पर्यावरण नीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। अमेरिका, यूरोप और जापान में ऐसे क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं, जहां अनावश्यक कृत्रिम प्रकाश सीमित रखा जाता है। इसका उद्देश्य उन जीवों को बचाना है, जिनका जीवन अंधेरे पर निर्भर है। भारत में अभी यह सोच प्रारंभिक अवस्था में है। जुगनु स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के संकेतक होते हैं। वे वहीं पनपते हैं, जहां मिट्टी में नमी, स्वच्छ जल, कम प्रदूषण और समृद्ध जैव विविधता होती है। उनका गायब होना मिट्टी की बिगड़ती गुणवत्ता, बढ़ते कीटनाशकों, घटते प्राकृतिक आवास और जलवायु परिवर्तन का संकेत है।
विज्ञापन
दुनिया ने जुगनुओं के तेजी से गायब होने को प्रकृति के लिए गंभीर चेतावनी माना है। अब सवाल है कि क्या भारत भी इसे उतनी ही गंभीरता से लेगा? जापान, ताइवान, मलयेशिया और अमेरिका जैसे देशों में लोग जुगनुओं को खोजकर उनका रिकॉर्ड रखते हैं, जिससे वैज्ञानिकों को उनके संरक्षण में मदद मिलती है। भारत में भी ‘फायरफ्लाई वॉक’ (जुगनू-वॉक) और नेचर वॉक जैसे कार्यक्रम लोगों को प्रकृति से जोड़ रहे हैं। महाराष्ट्र और पश्चिमी घाट के बाद अब उत्तर भारत में भी इसकी शुरुआत हो रही है। अगर हमें जुगनुओं को बचाना है, तो इसे सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि जैव विविधता के संरक्षण का हिस्सा बनाना होगा।