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विश्व साहित्य का आकाश: आवारा मसीहा के पर्याय हैं विष्णु प्रभाकर, जीवन के 14 वर्षों की मेहनत
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सार
‘आवारा मसीहा’ आज इंग्लिश, बांग्ला, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी, उर्दू आदि कई भाषाओं में प्रकाशित है। इस कृति पर विष्णु प्रभाकर को कई सम्मान यथा, पाब्लो नेरुदा, बंग साहित्य सम्मेलन, हरियाणा साहित्य अकादमी, कलकत्ता शरत समिति द्वारा ‘शरत मेडल’ प्राप्त हुए
आवारा मसीहा, विष्णु प्रभाकर की रचना
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
किसी ने विष्णु प्रभाकर से जब यह पूछा, ‘एक लेखक होकर आप अपनी स्वतंत्र कृति सृजित करने के बजाय अपने जीवन के कीमती 14 साल किसी ऐसी रचना में क्यों खर्च करते रहे, जो ठीक तरह से आपकी नहीं होने वाली थी। इस पर विष्णु प्रभाकर ने सरलता से हंसते हुए उत्तर दिया, ‘तीन लेखक हुए, जिन्हें जनता हृदय से प्यार करती है। तुलसीदास, प्रेमचंद और शरतचंद्र।
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अमृत लाल नागर ने ‘मानस का हंस’ लिख कर तुलसी की छवि को चमका दिया। अमृत राय ने ‘कलम का सिपाही’ लिखा, जिस कारण हम प्रेमचंद को करीब से जान सके। शरत के साथ तो कोई न्याय न हुआ। उनके ऊपर लिखने वाला कोई न हुआ, न परिवार में और न ही कोई साहित्यप्रेमी। यह बात मुझे 24 घंटे बेचैन किए रहती थी, अत: मुझे लगा, मुझे यह काम करना होगा।’ इसीलिए उन्होंने ‘आवारा मसीहा’ लिखा। इतना आंतरिक दबाव था कि उन्हें यह लिखना-ही-लिखना था।
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शरतचंद्र के स्त्री किरदार इतने मजबूत और विशाल लगते हैं, आम पाठकों से साथ खासकर महिला पाठकों के मन में शरतचंद्र के लिए अगाध लगाव को समझा जा सकता है। वहीं विष्णु प्रभाकर खुद साहित्यकार और साहित्यानुरागी थे, तो इस दृष्टि से उनका झुकाव शरदचंद्र की तरफ हो सकता है। लेकिन दोनों अपने जीवन में इतने भिन्न है, इस बांग्ला लेखक के लिए उनका लगाव प्रथम दृष्टि में बेहद चकित करता है।
रचना के लिए लगा दिए जीवन के कीमती 14 साल
इस जीवनी के शोध हेतु मूर्तिदेवी सम्मान प्राप्त विष्णु प्रभाकर ने एक, दो नहीं बल्कि अपने जीवन के 14 बेसकीमती वर्ष खर्च किए, जबकि उनकी आमदनी का जरिया मात्र लेखन था। यह लेखन के प्रति उनके समर्पण और जुनून का नतीजा है। वरना कौन एक किताब केलिए इतना लम्बा जीवन लगाता है।
पद्मभूषण विष्णु प्रभाकर (विष्णु दयाल, 21 जून 1912-11 अप्रैल 2009) पक्के गांधीवादी थे, सदैव खद्दर पहनते, आर्यसमाजी जीवन जीते रहे। बड़ा संतुलित और सयंमित, सहज जीवन रहा उनका। मेरे दूर के इस रिश्तेदार की जीवनशैली के ठीक विपरीत जीवन शैली थी, शरतचंद्र चटर्जी की। यह अड्डेबाज, मनमौजी बंगाली ताजिंदगी, मनमर्जी से चला, कभी किसी सामाजिक नियम से नहीं बंधा, एक ऐसा मनुष्य इस धरती पर हुआ है, आज यह विश्वास करना कठिन है।
विष्णु प्रभाकर ने शरत की इस जीवनी को सटीक शीर्षक दिया है, ‘आवारा मसीहा’। शरत गरीबों एवं स्त्रियों के मसीहा ही तो थे। इस बेतरतीब जीवन को तरतीब से संजो कर विश्वसनीय बना दिया इस जीवनीकार ने।
गैर बंगाली विष्णु प्रभाकर बांग्ला भाषा नहीं जानते थे और शरत का सारा लेखन बांग्ला में है, हालांकि उसका हिन्दी अनुवाद उपलब्ध है, पर जीवनीकार ने लिखने के पूर्व बांग्ला भाषा सीखी।और न मालूम जटिल चरित्र वाले शरत के कितने परिचित लोगों से मिले। शरत के पात्रों को पढ़ा, समझा, उन्हें पचाया, उन पर मनन किया। शरत से जुड़े स्थानों जैसे, बिहार, बंगाल, बर्मा गए।
शरत के विषय में भ्रांतियों की कमी नहीं हैं। इनको फैलाने में स्वयं शरत का भी हाथ है, शरत को कहानियां बनाने में खूब मजा आता था, अपने जीवन के बारे में भी खुद उन्होंने खूब कहानियां गढ़ी, अपने विषय में कुछ भी बोल दिया करते और दूसरों की अपने बारे में फैलाई कहानियों को दूर तक फैलाने में मदद करते। वैसे शरत से जलने वालों की संख्या कम न थी।
विष्णु प्रभाकर से लोग कहते, ‘अरे उसके जीवन में क्या रखा है, दो-चार गुंडों-बदमाशों का जीवन करीब से देख लो, शरतचंद्र की जीवनी तैयार हो जाएगी। सच-झूठ का निर्णय सरल न था। जीवनीकार को सब प्राप्त सामग्री सूप में रख कर फटकना था और थोथा उड़ा कर केवल सार-सार ग्रहण करना था। काम आसान न था, मगर 14 साल में यह सब बखूबी किया गया। और करीब साढ़े तीन सौ पन्नों में विष्णु प्रभाकर ने शरत के जीवन को प्रस्तुत किया।
हिन्दी के एक लेखक की ‘आवारा महीसा’ आज शरत की प्रामाणिक जीवनी के रूप में स्वीकृत है।
साहित्य अकादमी, सोवियत लैंड नेहरू जैसे सम्मान से विभूषित यूं तो उपन्यास ((‘अर्धनारीश्वर’, ‘दो मित्र’, ‘क्षमादान’, ‘ढ़लती रात’, ‘स्वप्नमयी’, ‘पाप का घड़ा’, ‘होरी’), नाटक (हत्या के बाद’, ‘नव प्रभात’, ‘डॉक्टर’, ‘प्रकाश और परछाइयां’, ‘बारह एकांकी’, ‘अशोक’, ‘अब और नहीं’, ‘टूटते परिवेश), कहानी संग्रह (‘संघर्ष के बाद’, ‘धरती अब भी घूम रही है’, ‘मेरा वतन’, ‘खिलौने’, ‘आदि और अंत’), यात्रा वितांत (‘ज्योतिपोंज हिमालय’, ‘जमुना गंगा के नैहर में’), आत्मकथा ‘पंखहीन नाम’ (तीन भाग) प्रकाशित हैं।
‘आवारा मसीहा’ आज इंग्लिश, बांग्ला, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी, उर्दू आदि कई भाषाओं में प्रकाशित है। इस कृति पर विष्णु प्रभाकर को कई सम्मान यथा, पाब्लो नेरुदा, बंग साहित्य सम्मेलन, हरियाणा साहित्य अकादमी, कलकत्ता शरत समिति द्वारा ‘शरत मेडल’ प्राप्त हुए।
बंगाल अपने साहित्य एवं साहित्यकारों को लेकर बहुत पोजेसिव है, किसी दूसरी भाषा के रचनाकार को वे अपने साहित्य पर हाथ नहीं धरने देते हैं, लेकिन यहां उन्होंने एक हिन्दी रचनाकार को सिर पर बैठाया है, उसे, उसकी रचना को मान-सम्मान दिया है।
विष्णु प्रभाकर आज आवारा मसीहा के पर्याय बन चुके हैं। बंगाल का कोई जीवनीकार यह गौरव न पा सका। चित्रों से सजी इस किताब को पाठकों का बेहद प्यार मिला है।
शरतचंद्र चटर्जी जिन्होंने आम जन, विशेषकर आम स्त्री को मान प्रदान किया, मगर समाज ने उन्हें सदैव दूर रखा। ऐसे समाज बहिष्कृत व्यक्ति को विष्णु प्रभाकार ने नाम भले ‘आवारा मसीहा’ दिया, पर उसे समाज समाहित कर दिया। और किसे कहते हैं, सत्साहित्य?
उपेक्षितों की आवाज बन कर उसे समाज में स्थापित करना ही असल साहित्य का एक दायित्व है। इस महति, निष्काम कार्य हेतु समाज सदैव विष्णु प्रभाकर का आभारी रहेगा।
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