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विधानसभा चुनाव 2026: तेज हो रही है महिला वोटरों को लुभाने की होड़
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सार
पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों के साथ ही महिलाओं को भी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक माना जाता है। राज्य में कम से कम दो दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां महिला वोटरों की तादाद पुरुषों से ज्यादा है।
वोटिंग (प्रतीकात्मक)
- फोटो : iStock
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विस्तार
पश्चिम बंगाल और असम में विधानसभा चुनावों से पहले सत्ता के दावेदारों में महिला वोटरों को लुभाने की होड़ मची है। इन राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी के साथ उनको चुनौती देने वाले दल भी इस मामले में पीछे नहीं हैं।
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भाजपा इन राज्यों में अलग-अलग भूमिकाओं में है। बंगाल में वह जहां इस बात सत्ता में आने का सपना देख रही है वहीं असम में उसका जोर जीत की हैट्रिक लगाने पर है। इन दोनों राज्यों में समानता यह है कि यहां महिला वोटरों की तादाद कुल वोटरों का करीब 50 फीसदी है और चुनावी नतीजे तय करने में इनकी भूमिका निर्णायक होती है।
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बिहार में बीते साल के आखिर में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के खाते में 10-10 की रकम भेजने के फैसले ने एनडीए की सत्ता में वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी तरह असम सरकार ने भी चुनाव से ठीक पहले राज्य की करीब 40 लाख महिलाओं के खाते में तीन हजार छह सौ करोड़ रुपए भेजे हैं।
पश्चिम बंगाल में तो अल्पसंख्यकों के साथ ही महिलाओं को भी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक माना जाता है। राज्य में कम से कम दो दर्जन विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां महिला वोटरों की तादाद पुरुषों से ज्यादा है। इन महिला वोटरों ने ही वर्ष 2021 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की कड़ी चुनौती से निपटने में ममता बनर्जी की मदद की थी।
वर्ष 2021 के नतीजों से साफ है कि उस समय तृणमूल कांग्रेस को महिलाओं के 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे जबकि भाजपा के मामले में यह आंकड़ा 37 फीसदी था।
पश्चिम बंगाल में लक्ष्मी भंडार योजना
यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी महिलाओं के लिए लगातार तमाम योजनाएं शुरू करती रही हैं। इनमें लक्ष्मी भंडार सबसे महत्वपूर्ण है। इस बार चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री ने इसके तहत महिलाओं को हर महीने मिलने वाली रकम में पांच-पांच सौ रुपए की वृद्धि कर दी है। शुरुआत में इसके तहत हर महीने पांच सौ रुपए दिए जाते थे।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ममता ने यह रकम पांच सौ रुपए बढ़ा दी थी और अब चुनाव से ठीक पहले इसमें और पांच सौ रुपए जोड़ दिए गए हैं। अब सामान्य वर्ग की महिलाओं को हर महीने 15 सौ और अनुसूचित जाति व जनजाति तबके की महिलाओं को 17 सौ मिल रहे हैं।
वर्ष 2016 के चुनाव में ममता बनर्जी के समर्थन के बाद सरकार ने महिलाओं के हित में कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाएं शुरू की थी। इनके तहत लड़कियों को शिक्षा और शादी के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है।
तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि पार्टी को इन कल्याण योजनाओं का फायदा मिला है। लेकिन उनकी दलील है कि पार्टी का मकसद राज्य की महिलाओं को आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनाना है।
दूसरी ओर, भाजपा भले तृणमूल पर महिलाओं को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोप लगाती हो, इन वोटरों की अहमियत को ध्यान में रखते हुए ही उसने सत्ता में आने की स्थिति में लक्ष्मी भंडार की जगह अन्नपूर्णा योजना के तहत हर महीने तीन हजार रुपए देने का वादा किया है। बंगाल में भी महिला वोटरों की संख्या लगभग पुरुष वोटरों को बराबर है। खासकर इस राज्य में महिलाएं पुरुषों, के मुकाबले ज्यादा मतदान करती रही हैं।
महिलाएं दिलाएंगी तीसरी बार सत्ता?
असम में भी सत्तारूढ़ भाजपा महिलाओं की कल्याण योजनाओं के बूते तीसरी बार सरकार बनाने का सपना देख रही है। चुनाव के एलान से ठीक पहले अरुणोदय योजना के तहत 40 लाख महिलाओं के खाते में 3600 करोड़ की रकम भेजी गई।
इसके अलावा स्वनिर्भर नारी योजना और मुख्यमंत्री महिला उद्यमिता अभियान के तहत भी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनको एकमुश्त 10 हजार रुपए की सरकारी सहायता दी जाती है। असम में महिला वोटरों की तादाद 1।20 करोड़ है।
भाजपा को चुनौती देने वाली प्रदेश कांग्रेस ने भी सत्ता में आने की स्थिति में राज्य की महिलाओं के बैंक खाते में हर महीने बिना शर्त रकम भेजने के साथ ही अपना कारोबार शुरू करने या उसे बढ़ाने की इच्छुक महिलाओं को 50 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता देने की घोषणा की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल और असम में महिलाएं राजनीतिक रूप से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं। भले ही कई तमाम राजनीतिक दल उनको टिकट देने में कंजूसी बरते, लेकिन उनके वोट सबके लिए अहम हैं। यही वजह है कि उनको लुभाने की होड़ लगातार तेज हो रही है।
खासकर नजदीकी मुकाबले वाली सीटों में महिलाओं के एक या दो फीसदी वोट नतीजे बदल सकते हैं।
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