लॉक डाउन: सिर्फ सियासी शोशेबाजी या भावी संकट की ‘पब्लिक टेस्टिंग’?
क्या भारत में फिर से लॉकडाउन लग सकता है या यह सिर्फ अफवाह है? वैश्विक ऊर्जा संकट और राजनीति के बीच उठते सवाल लोगों में डर और जिज्ञासा दोनों पैदा कर रहे हैं।
विस्तार
उधर पश्चिम एशिया में ईरान अमेरिका इजराइल युद्ध अपने दौर में प्रवेश कर रहा है तो इधर भारत में राजनीतिक शोशों और लोगों में डर पैदा करने की नई मिसाइलें चल रही हैं। इसका ताजा उदाहरण वैश्विक ऊर्जा संकट के चलते भारत भर में लॉक डाउन लगने की आशंका का है। सरकार का कहना है कि यह सिर्फ अफवाह है, ऐसे किसी विचार पर बात नहीं हो रही है। दूसरी तरफ विपक्षी दलों का तर्क यह है कि इस बार कोई घातक वायरस भले न हो, लेकिन ईंधन का गंभीर संकट समूची आर्थिकी को लकवाग्रस्त कर देगा। यानी पर्याप्त ईंधन ही नहीं होगा तो सारी गतिविधियां खुद-ब-खुद ठप हो जाएंगी। अघोषित लॉक डाउन लग जाएगा। इस संदर्भ में सरकार की सफाई है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला।
ईंधन की आपूर्ति बनाए रखने की हर संभव कोशिश की जा रही है। कुछ विपक्षी नेता एक काल्पनिक आशंका को हकीकत से जोड़ने पर आमादा हैं। हालांकि जो आम लोग वास्तव में परेशान हैं, उनकी चिंता सिर्फ इतनी है कि ईंधन की सुलभता वाले दिन कब लौटेंगे। याद करें वही ‘लॉक डाउन,’ जो देश में कोरोना प्रकोप के दौरान लगा था और जिसकी याद कर आज भी लोग सिहर उठते हैं। ‘लॉक डाउन’ वह भौतिक और मानसिक स्थिति है, जिसमें लगभग सब कुछ थम जाता है, सिवाय इंसान की सांसों के। यानी संचार बंद, सामाजिक संवाद बंद, कार्यस्थलों पर कामकाज बंद, सामूहिक गतिविधियां बंद।
एक जबरन थोपा गया एकांतिक जीवन, जिसे जिंदा रहने के लिए जरूरी माना गया हो। तब लॉक डाउन चरणों में लगा था और पहले दौर ने लोगों की रोजी-रोटी तक छीन ली थी। हालांकि दूसरे, दौर में सरकार ने कुछ आर्थिक गतिविधियों को छूट दी थी।
बहरहाल, ईरान इजराइल अमेरिका युद्ध में यूं तो भारत की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है, लेकिन हम उसकी आंच में तेजी से झुलस रहे हैं। इसमें हमारा रोल कुल इतना है कि हम सबसे संपर्क में हैं और किसी तरह अपने जहाज निकलवाने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु जंग से हमारे आयात के साथ निर्यात पर भी बुरा असर पड़ रहा है। युद्ध लंबा चला तो हालात और भी बदतर हो सकते हैं। तो क्या इसी आशंका के चलते ‘लॉक डाउन’ का शिगूफा छो़ड़ा गया है?
सवाल यह भी है कि लोगों से सचेत रहने की सरकारी चेतावनियों के बीच ‘लॉक डाउन’ की बात आई कहां से, ऐसी बात को हवा देने के पीछे मकसद क्या है, क्या ऐसी परिस्थितियां बन गई हैं कि कोरोना काल की तरह फिर लॉक डाउन लगाया जाए? और सच में लगे तो इससे देश का कितना नुकसान होगा? यदि लॉक डाउन की बात केवल सियासी शोशेबाजी है तो फिर इसका सियासी लाभ किसके खाते में जा सकता है, साथ में यह भी कि क्या ऐसा करना देश विरोधी नहीं है?
केवल युद्ध के कारण किसी देश में लॉक डाउन लगा हो, ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं है, उन देशों में भी नहीं, जो सीधे युद्धों में उलझे हैं। लॉक डाउन असाधारण आपात सामाजिक स्थिति है, जब संचार पर पूरी तरह ताले पड़ जाते हैं और दूरियां रखने को ही जिंदा रहने की गारंटी मान लिया जाता है। आज से 6 साल पहले समूची दनिया में एक नए और खतरनाक वायरस कोरोना महामारी के कारण ऐसी स्थिति बनी थी। कोविड 19 वायरस मानव स्पर्श से फैलता था और फेंफड़ों पर हमला कर व्यक्ति की जान ले लेता था।
लिहाजा आइसोलेशन ही बचने का सॉल्यूशन माना गया। एक विचित्र स्थिति पैदा हुई, जब ‘सामाजिक प्राणी’ कहलाने वाले मनुष्य को ज्यादा से असामाजिक होने पर विवश किया गया। लेकिन आज तो वैसी स्थिति नहीं है।
याद रहे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते 24 मार्च 2020 की रात आठ बजे कोरोना प्रकोप के कारण पूरे देश में 21 दिन के लॉक डाउन का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि लोग यह भूल जाएं कि घर से बाहर निकलना क्या होता है। तब तक देश में कोरोना वायरस के 519 मामलों की पुष्टि हो चुकी थी और नौ लोगों की मौत भी हो चुकी थी। संयोग से इस घटनाक्रम के एक माह पहले ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आए थे। और अब ईरान-अमेरिका युद्ध के केन्द्र में भी वो और नेतन्याहू हैं।
दरअसल लॉक डाउन का यह ताजा ‘वायरस’ हाल में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस बयान के बाद फैला, जिसमें उन्होंने मास्को में उद्योगपतियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि ईरान-इजरायल युद्ध के कारण दुनिया भर में आर्थिक मंदी और कोरोना जैसी स्थिति जैसे-ईंधन की कमी पैदा होने का अंदेशा है। जिसके परिणाम कोरोना महामारी की तरह हो सकते हैं। उन्होंने साफ तौर पर लॉकडाउन लगने जैसी बात नहीं कही। लेकिन पुतिन का इतना चेताना भी भारत में चुनावी चूल्हे में आग फूंकने के लिए काफी था।
चुनावग्रस्त पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तत्काल इसे तत्काल उछालते हुए कहा कि देश में केन्द्र सरकार देश में लॉकडाउन लगा सकती है और लोग घरों में बंद हो सकते हैं।
इसी संदर्भ में 2021 के विधानसभा चुनाव की याद दिलाते हुए ममता ने कहा कि कोविड महामारी के बावजूद उनकी पार्टी ने सभी पाबंदियों के बावजूद चुनाव लड़ा था और भारी बहुमत से जीती। पार्टी अब किसी भी परिस्थिति में फिर से तैयार रहेगी। इसमे यह संदेश छुपा था कि अगर लॉक डाउन लगा तो यह टीएमसी के फायदे में ही होगा। यानी यहां लॉक डाउन की आशंका से ज्यादा उसकी चाहत है।
ममता के बयान को कुछ दूसरे विपक्षी नेताओं ने और सुलगाने की कोशिश की और बतौर सबूत पेट्रोल पंपों पर और गैस एजेंसियों पर लगी लोगों की लंबी लाइनों की तस्वीरे सोशल मीडिया पर साझा की जाने लगीं। ममता तो अब यह भी कह रही हैं कि उनकी जान लेने की साजिश की जा रही है।
यहां कॉमन बात यह है कि प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में कोविड संकट का जिक्र किया और ममता बैनर्जी ने भी कोविड लॉक डाउन का हॉरर सीन रिक्रिएट करने की कोशिश की। यह संयोग है या फिर एक भावी गंभीर संकट की ‘पब्लिक टेस्टिंग?’ यही सवाल आज लोगों के मन को मथ रहा है। हालांकि संकेतों में कही गई बात को लोगों ने देश की भाग्य रेखाओं से जोड़ दिया तो सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसका मजाक भी बनाया।
अलबत्ता कोविड और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक संकट में एक समानता है, वो ये कि दोनो के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह हिट होगी। इसकी शुरूआत हो भी चुकी है, क्योंकि युद्ध की समाप्ति के कोई लक्षण अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं।
भारत की राजनीतिक शतरंज में एक मुद्दा और उछल रहा है, वो है इस वैश्विक संकट में भारत द्वारा म्ध्यस्थता का। कहा जा रहा है कि चूंकि भारत के सभी से अच्छे रिश्ते हैं, इसलिए हमे सभी पक्षों के बीच सुलह के लिए मध्यस्थता करनी चाहिए। बात सही है। लेकिन कोई भी मध्यस्थता तभी सफल होती है, जब सम्बन्धित पक्षों का उस पर विश्वास हो। साथ ही सभी पक्ष अपने रूख को लेकर स्पष्ट और ईमानदार हों।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्ंप के नितांत अगंभीर, अस्थिर और अविश्वनीय रवैये के चलते कौन-सा देश ( पाकिस्तान को छोड़ दीजिए, उसकी अपनी मजबूरियां हैं) मध्यस्थ बनने का जोखिम लेगा? दूसरे, इस देश में अफवाहों पर ‘लॉक डाउन’ कौन लगाना चाहता है, क्योंकि इसके मंडन और खंडन के भी अपने सियासी फायदे हैं, जो राजनीतिक दलों की नजर में देशहित से ज्यादा जरूरी हैं।
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