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जीवन धारा: खुद को समझना आसान नहीं, अपने स्वभाव के बोझ में भी छुपी है उम्मीद की रोशनी

हारुकी मुराकामी Published by: Shivam Garg Updated Thu, 02 Apr 2026 08:32 AM IST
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सार

हमारे भीतर कहीं एक छोटी-सी रोशनी है, जो धीरे-धीरे जलती रहती है और हमें एहसास कराती है कि बदलाव मुमकिन है। खुद को समझने के लिए हमें अपने भीतर के उसी कोने में झांकना होगा, जहां देखने से हम अक्सर कतराते हैं।

Life Stream: Understanding Yourself is Not Easy; Finding Hope Within
जीवन धारा। - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार

मैं यह सोचकर आसमान की ओर देखता हूं कि शायद वहां मुझे दया की कोई झलक मिल जाए। लेकिन कुछ नहीं मिलता। बस सुस्त और बेपरवाह बादल दिखाई देते हैं, जो अपनी ही लय में बहते रहते हैं, जैसे उन्हें किसी इन्सानी बेचैनी से कोई सरोकार ही न हो। उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता, और यही उनकी असली प्रकृति है। बादल बोलते नहीं हैं, वे बस चुपचाप आसमान में तैरते रहते हैं। उनकी यह खामोशी इतनी गहरी होती है कि उसे महसूस करते-करते मन के भीतर भी एक सन्नाटा-सा पसरने लगता है। तब लगता है, शायद मुझे ऊपर नहीं, बल्कि अपने भीतर देखना चाहिए। 

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फिर, मैं अपने अंदर झांकने की कोशिश करता हूं, जैसे कोई गहरे कुएं में नीचे तक देखने की कोशिश करता है। वहां अंधेरा है, ठंडक है, और एक अजीब-सी सच्चाई है। वहां मुझे सिर्फ मेरा अपना स्वभाव दिखाई देता है-मेरा निजी, जिद्दी, कभी-कभी असहयोगी और अक्सर स्वार्थ से भरा हुआ स्वभाव। एक ऐसा स्वभाव, जो खुद पर संदेह करता है और जो मुश्किल समय में हल्की-सी हंसी की तलाश करता है। मैं इस स्वभाव को अपने साथ एक पुराने सूटकेस की तरह ढोता आया हूं। यह सूटकेस न तो सुंदर है और न ही हल्का। इसके किनारे घिस चुके हैं, जगह-जगह से यह कमजोर पड़ चुका है, और इसके भीतर भरा सामान इतना भारी है कि कई बार कदम रुकने लगते हैं। फिर भी, मैं इसे इसलिए नहीं उठाए हूं कि यह मुझे पसंद है, बल्कि इसलिए कि मेरे पास और कुछ था ही नहीं, जिसे मैं अपने साथ ले जा सकूं। धीरे-धीरे, इस बोझ के साथ एक रिश्ता बन गया है। मैं जानता हूं कि यह मुझे थकाता है, लेकिन यही मुझे गढ़ता भी है। शायद इन्सान अपने स्वभाव से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। 
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कभी-कभी मन में यह ख्याल आता है कि क्या मैं इस सूटकेस को नीचे रख सकता हूं? क्या मैं इसके बिना हल्का महसूस कर पाऊंगा? पर उसी क्षण एक डर उभरता है कि अगर यह मेरे साथ नहीं रहेगा, तो क्या मैं वही रहूंगा, जो हूं? शायद यह बोझ ही मेरी पहचान का एक हिस्सा बन चुका है। फिर भी, उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं होती। मेरे भीतर कहीं एक छोटी-सी रोशनी है, जो धीरे-धीरे जलती रहती है और मुझे यह एहसास कराती है कि बदलाव नामुमकिन नहीं है। शायद करुणा कहीं बाहर नहीं, बल्कि भीतर के उसी कोने में छिपी है, जहां देखने से हम अक्सर कतराते हैं। 

मैं अब समझने लगा हूं कि खुद को समझना आसान नहीं है। इसके लिए धैर्य चाहिए, ईमानदारी चाहिए, और अपने ही सच को स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए। यही एक रास्ता है, जो धीरे-धीरे भीतर की धुंध को साफ करता है और हमारे भीतर उठ रहे हरेक सवाल का जवाब भी देता है। अगली बार शायद किसी दिन, जब मैं फिर से आसमान की ओर देखूंगा, तो वही बादल मुझे अलग लगेंगे। - व्हाट आई टॉक अबाउट व्हेन आई टॉक अबाउट रनिंग के अनूदित अंश 

सूत्र- उम्मीद की लौ जलाए रखें
जब इन्सान अपने भीतर झांकने का साहस करता है और अपने स्वभाव की कठोर सच्चाइयों को स्वीकारते हुए भी उम्मीद की लौ को जलाए रखता है, तब वही बोझ, जो कभी उसे थकाता था, धीरे-धीरे उसकी ताकत बन जाता है। अंततः वह यह समझने लगता है कि असली बदलाव और शांति भीतर से ही जन्म लेती है।

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