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मुड़-मुड़ के देख: जीवन की प्रयोगशाला; वृद्धावस्था में ही जीवन का कच्चा ‘अनुभव’ परिपक्व ‘ज्ञान’ में बदलता है
जूलियन बार्न्स
Published by: Pavan
Updated Fri, 03 Apr 2026 08:05 AM IST
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सार
वृद्धावस्था ही वह प्रयोगशाला है, जहां जीवन का कच्चा ‘अनुभव’ परिपक्व ‘ज्ञान’ में बदलता है। युवावस्था के वे तमाम भ्रम, जिन्हें हमने सत्य मान रखा था, उम्र के इसी पड़ाव पर आकर अपनी वास्तविकता उजागर करते हैं।
मुड़-मुड़ के देख: जीवन की प्रयोगशाला
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मुझे अपनी किशोरावस्था के आखिरी दिनों का एक दौर याद है, जब मेरा मन रोमांच से भरी कल्पनाओं में डूबा रहता था। मैं सोचता था कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, तो मेरी जिंदगी ऐसी ही होगी। मैं वहां जाऊंगा, यह करूंगा, वह खोजूंगा, उससे प्यार करूंगा आदि। मैं ठीक वैसे ही जिऊंगा, जैसे उपन्यासों के पात्र जीते हैं। कौन-सा उपन्यास, यह तो स्पष्ट नहीं था, पर इतना निश्चित था कि उसमें जुनून होगा, जोखिम होगा, उल्लास और थोड़ा निराशा का आवागमन होगा, अंततः फिर से उल्लास ही लौटेगा।
धीरे-धीरे समय बदला और मैं भी बदल गया। अपनी उम्र के बीसवें साल में पहुंचने पर मुझे एहसास हुआ कि मेरे अंदर का वह ‘साहसी बच्चा’ कहीं खो गया है। मैंने वह सब करना छोड़ दिया, जिसके सपने देखे थे। उसकी जगह, मैं घर के छोटे-मोटे कामों में उलझ गया, छुट्टियां मनाने लगा और रोजमर्रा के कामों में व्यस्त होकर एक साधारण जिंदगी जीने लगा। फिर समझ आया कि समय हमें पहले स्थिर करता है और फिर हमें सोचने पर मजबूर करता है। हमें लगा कि हम समझदार हो रहे हैं, लेकिन असल में हम सिर्फ डरपोक बन रहे थे। जिसे हमने ‘जिम्मेदारी’ समझा, वह दरअसल खतरों से बचने का एक बहाना था। हम जिसे ‘हकीकत’ कह रहे थे, वह असल में मुश्किलों का सामना करने के बजाय उनसे भागने का एक रास्ता मात्र था। धीरे-धीरे हमारी सबसे मजबूत धारणाएं भी डगमगाने लगती हैं और कभी अटल लगने वाला सत्य भी कल्पना जैसा प्रतीत होने लगता है।
यहीं से वृद्धावस्था का महत्व स्पष्ट होने लगता है। वृद्धावस्था केवल उम्र का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह जीवन को एक तय दूरी से देखने की कला है। जब हम उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचते हैं, तब जीवन की आपाधापी शांत होने लगती है और असली तस्वीर साफ होने लगती है। वृद्धावस्था ही वह प्रयोगशाला है, जहां जीवन का कच्चा ‘अनुभव’ परिपक्व ‘ज्ञान’ में बदलता है। युवावस्था के वे तमाम भ्रम, जिन्हें हमने सत्य मान रखा था, उम्र के इसी पड़ाव पर आकर अपनी वास्तविकता उजागर करते हैं।
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धीरे-धीरे समय बदला और मैं भी बदल गया। अपनी उम्र के बीसवें साल में पहुंचने पर मुझे एहसास हुआ कि मेरे अंदर का वह ‘साहसी बच्चा’ कहीं खो गया है। मैंने वह सब करना छोड़ दिया, जिसके सपने देखे थे। उसकी जगह, मैं घर के छोटे-मोटे कामों में उलझ गया, छुट्टियां मनाने लगा और रोजमर्रा के कामों में व्यस्त होकर एक साधारण जिंदगी जीने लगा। फिर समझ आया कि समय हमें पहले स्थिर करता है और फिर हमें सोचने पर मजबूर करता है। हमें लगा कि हम समझदार हो रहे हैं, लेकिन असल में हम सिर्फ डरपोक बन रहे थे। जिसे हमने ‘जिम्मेदारी’ समझा, वह दरअसल खतरों से बचने का एक बहाना था। हम जिसे ‘हकीकत’ कह रहे थे, वह असल में मुश्किलों का सामना करने के बजाय उनसे भागने का एक रास्ता मात्र था। धीरे-धीरे हमारी सबसे मजबूत धारणाएं भी डगमगाने लगती हैं और कभी अटल लगने वाला सत्य भी कल्पना जैसा प्रतीत होने लगता है।
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यहीं से वृद्धावस्था का महत्व स्पष्ट होने लगता है। वृद्धावस्था केवल उम्र का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह जीवन को एक तय दूरी से देखने की कला है। जब हम उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचते हैं, तब जीवन की आपाधापी शांत होने लगती है और असली तस्वीर साफ होने लगती है। वृद्धावस्था ही वह प्रयोगशाला है, जहां जीवन का कच्चा ‘अनुभव’ परिपक्व ‘ज्ञान’ में बदलता है। युवावस्था के वे तमाम भ्रम, जिन्हें हमने सत्य मान रखा था, उम्र के इसी पड़ाव पर आकर अपनी वास्तविकता उजागर करते हैं।