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इंदौर के मन की बात : पोहे-सेव, भोजन भंडारे की झूठी हंसी कब तक हंसेंगे हम इंदौरी?
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सार
गणतंत्र दिवस पर इंदौर की पहचान रस्मों और जुमलों तक सीमित दिखती है। प्रशासन, जनप्रतिनिधि और सिस्टम की उदासीनता से शहर विकास में पिछड़ रहा है। फैसले गुपचुप हो रहे हैं, बड़े प्रोजेक्ट ठहर गए हैं और इंदौर बदनामी व अवसरों के नुकसान से जूझ रहा है।
इंदौर का ''गण'' आज भी पोहे-सेंव की प्लेट और भंडारों की कतारों में अपनी पहचान ढूंढ रहा है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सोमवार को गणतंत्र दिवस है। तिरंगा फहराया जाएगा, राष्ट्रगान होगा, लेकिन इंदौर का ''गण'' आज भी पोहे-सेंव की प्लेट और भंडारों की कतारों में अपनी पहचान ढूंढ रहा है और ''तंत्र'' को किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा। न हादसों से, न बीमारियों से होने वाली मौतों से और न ही कोर्ट की नाराजगी से। इंदौर के जनप्रतिनिधि कहते हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। अरे... अफसर तो कोर्ट की भी नहीं सुन रहे हैं। जज बीआरटीएस की सुनवाइयों में डांट-डपट तक कर चुके हैं। इंदौर में पोस्टिंग से पहले समझ नहीं आता कि ये अफसर इंदौर की मिट्टी की तासीर समझने आए हैं या उसे और कुचलने की पट्टी पढ़कर आए हैं? लगता है वे यहां सिर्फ मौज मस्ती के लिए आए हैं। उनका शहर से कोई सरोकार नहीं, कोई नई पहल नहीं...कोई ठोस काम और प्रेरणा नहीं....और कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं....।
हालत यह है कि इंदौर क्या करेगा और क्या नहीं, इसके फैसले भी चोरी-छिपे लिए जा रहे हैं। कौन ले रहा है? इस पर कोई बात करना या बोलना नहीं चाहता। इंदौर के बीआरटीएस को तोड़ने की मांग कब उठी थी, जो अचानक उसे तोड़ने का एलान कर दिया गया? इंदौर ने मांगा था भोपाल की तरह नया ''कमलापति रेलवे स्टेशन'', लेकिन मिला क्या? पुराने स्टेशन के जीर्णोद्धार के लिए 300 करोड़ रुपये, जहां के प्लेटफॉर्म तक सीधे नहीं बन पाए; लोग रेल और प्लेटफॉर्म के गैप में गिरकर मर जाते हैं। अब गुजरात की कंपनियां टूटे बीआरटीएस पर एलिवेटेड कॉरिडोर और पुराने रेलवे स्टेशन की नई बिल्डिंग बना रही हैं। कंपनियां इंदौर से कमा रही हैं और ठेकों के खेल में इंदौर को पीछे ठेला जा रहा है।
हम इंदौरी जुमलेबाजी में खुश हो जाते हैं। ''इंदौर एक नया दौर है..’, ‘इंदौर जो भी करता है अद्भुत करता है’, ‘मुस्कुराइए आप इंदौर में हैं’ जैसे मुहावरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक मंचों से बोलते रहते हैं, लेकिन दो साल में इंदौर को बदनामी के सिवा और क्या मिला? इंदौर की ‘बेटी’ शिलांग में मर्डर करके आ गई, पूरे देश में इंदौर की चर्चा हुई। इंदौरी फिल्म निर्देशक पलाश मुछाल की बरात सांगली से लौट आई। फिर भागीरथपुरा का दूषित पेयजल कांड सुर्खियां बना। विदेशी महिला क्रिकेटरों के साथ छेड़खानी ने भी शहर पर दाग लगा दिया।
इंदौर अच्छे कामों के लिए आठ साल पहले स्वच्छता में देशभर में पहचाना गया। इंदौर ने सफाई के लिए देपालपुर को गोद लिया, लेकिन इंदौर को गोद लेने वाला कोई नहीं है। नितिन गडकरी ने नागपुर को चमन कर दिया। चंद्रबाबू नायडू ने हैदराबाद को आईटी सिटी बना दिया। हमारे इंदौर के पैरों में 10 किलो के बांट बांधकर उसे विकास की रेस में दौड़ाया जा रहा है। सुपर कॉरिडोर में ''फ्यूचर सिटी'' बनने की ताकत है, लेकिन 10 साल बाद भी वहां प्लॉटों पर फसलें बोई जा रही हैं; गेहूं और मक्का उग रहे हैं। शहर की जनता की ही तरह इंदौर के जनप्रतिनिधि भी ‘मेरे अकेले के बोलने से क्या होगा’ और ‘मैं क्यों बुराई मोल लूं’ की मानसिकता के साथ पांच साल काट रहे हैं। इंदौर के पूर्वजों ने नर्मदा लाने की लड़ाई लड़ी, राजवाड़ा बिकने से बचाया, लेकिन नई पीढ़ी को लड़ने-भिड़ने की ताकत और जुझारूपन नहीं दिया। यही कमी इंदौर को दूसरे शहरों से पीछे कर रही है।
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हालत यह है कि इंदौर क्या करेगा और क्या नहीं, इसके फैसले भी चोरी-छिपे लिए जा रहे हैं। कौन ले रहा है? इस पर कोई बात करना या बोलना नहीं चाहता। इंदौर के बीआरटीएस को तोड़ने की मांग कब उठी थी, जो अचानक उसे तोड़ने का एलान कर दिया गया? इंदौर ने मांगा था भोपाल की तरह नया ''कमलापति रेलवे स्टेशन'', लेकिन मिला क्या? पुराने स्टेशन के जीर्णोद्धार के लिए 300 करोड़ रुपये, जहां के प्लेटफॉर्म तक सीधे नहीं बन पाए; लोग रेल और प्लेटफॉर्म के गैप में गिरकर मर जाते हैं। अब गुजरात की कंपनियां टूटे बीआरटीएस पर एलिवेटेड कॉरिडोर और पुराने रेलवे स्टेशन की नई बिल्डिंग बना रही हैं। कंपनियां इंदौर से कमा रही हैं और ठेकों के खेल में इंदौर को पीछे ठेला जा रहा है।
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हम इंदौरी जुमलेबाजी में खुश हो जाते हैं। ''इंदौर एक नया दौर है..’, ‘इंदौर जो भी करता है अद्भुत करता है’, ‘मुस्कुराइए आप इंदौर में हैं’ जैसे मुहावरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तक मंचों से बोलते रहते हैं, लेकिन दो साल में इंदौर को बदनामी के सिवा और क्या मिला? इंदौर की ‘बेटी’ शिलांग में मर्डर करके आ गई, पूरे देश में इंदौर की चर्चा हुई। इंदौरी फिल्म निर्देशक पलाश मुछाल की बरात सांगली से लौट आई। फिर भागीरथपुरा का दूषित पेयजल कांड सुर्खियां बना। विदेशी महिला क्रिकेटरों के साथ छेड़खानी ने भी शहर पर दाग लगा दिया।
इंदौर अच्छे कामों के लिए आठ साल पहले स्वच्छता में देशभर में पहचाना गया। इंदौर ने सफाई के लिए देपालपुर को गोद लिया, लेकिन इंदौर को गोद लेने वाला कोई नहीं है। नितिन गडकरी ने नागपुर को चमन कर दिया। चंद्रबाबू नायडू ने हैदराबाद को आईटी सिटी बना दिया। हमारे इंदौर के पैरों में 10 किलो के बांट बांधकर उसे विकास की रेस में दौड़ाया जा रहा है। सुपर कॉरिडोर में ''फ्यूचर सिटी'' बनने की ताकत है, लेकिन 10 साल बाद भी वहां प्लॉटों पर फसलें बोई जा रही हैं; गेहूं और मक्का उग रहे हैं। शहर की जनता की ही तरह इंदौर के जनप्रतिनिधि भी ‘मेरे अकेले के बोलने से क्या होगा’ और ‘मैं क्यों बुराई मोल लूं’ की मानसिकता के साथ पांच साल काट रहे हैं। इंदौर के पूर्वजों ने नर्मदा लाने की लड़ाई लड़ी, राजवाड़ा बिकने से बचाया, लेकिन नई पीढ़ी को लड़ने-भिड़ने की ताकत और जुझारूपन नहीं दिया। यही कमी इंदौर को दूसरे शहरों से पीछे कर रही है।