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स्मृति शेष: मार्क टुली जिन्हें भारत ने अजनबी नहीं, अपना सच्चा दोस्त माना

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sun, 25 Jan 2026 07:26 PM IST
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सार

मार्क टुली मूलतः ब्रिटेन के नागरिक थे, लेकिन बीते कई दशकों से भारत ही उनका घर रहा। मार्क टुली की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक 'द हार्ट ऑफ इंडिया'  भारतीय गांवों की उस सच्चाई को सामने लाती है, जो अक्सर शहरी बहसों में गुम हो जाती है।

Veteran journalist and acclaimed author Mark Tully passed away at the age of 90
मार्क टुली - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वैसे भारत को समझने की कोशिश करने वाले विदेशियों की सूची लंबी है। किसी ने इसे रहस्यमय कहा, किसी ने अराजक, किसी ने अध्यात्म का केंद्र तो किसी ने विकासशील दुनिया की प्रयोगशाला कहा, लेकिन इन तमाम दृष्टियों के बीच पत्रकार मार्क टुली का भारत अलग दिखाई देता है। उनका भारत न तो पर्यटक की नजर से देखा गया भारत है और न ही किसी उपनिवेशवादी मानसिकता से परखा गया देश। उनका भारत वह है, जिसे उन्होंने दशकों तक रहकर, सुनकर, चलते-फिरते और लोगों के बीच बैठकर जाना। मार्क टली के निधन से भारत ने अपना एक सच्चा दोस्त को दिया है।

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मार्क टुली मूलतः ब्रिटेन के नागरिक थे, लेकिन बीते कई दशकों से भारत ही उनका घर रहा। वे 1970 के दशक में बीबीसी के पत्रकार के रूप में भारत आए थे। वर्ष 1972 में दिल्ली ब्यूरो चीफ बने। वह समय भारतीय लोकतंत्र के लिए परीक्षा का समय था। इंदिरा गांधी का शक्तिशाली नेतृत्व, 1975 का आपातकाल, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश, फिर सत्ता का पुनर्गठन, इन सब घटनाओं को टली ने बहुत नजदीक से देखा, लेकिन उन्होंने इन घटनाओं को केवल सत्ता संघर्ष की तरह नहीं देखा, बल्कि यह समझने की कोशिश की कि इनका असर सामान्य भारतीय नागरिक पर कैसे पड़ता है?
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संयम और संतुलन, मार्क टुली की पत्रकारिता की सबसे बड़ी पहचान रहीं। वे न तो भारत के अंध प्रशंसक बने और न ही उसके आलोचक बनकर ऊपर से फैसला सुनाने लगे। आपातकाल जैसे संवेदनशील दौर में भी उन्होंने भारत को तानाशाही घोषित करने की जल्दबाजी नहीं की। उनका मानना था कि भारत का लोकतंत्र शोर-शराबे वाला जरूर है, अव्यवस्थित भी लगता है, लेकिन उसमें खुद को सुधारने की क्षमता है। यह बात समय ने काफी हद तक सही साबित की।

पत्रकारिता से आगे बढ़कर मार्क टुली ने भारत को अपनी पुस्तकों में दर्ज किया। उनकी पुस्तक 'इंडिया इन स्लो मोशन'  शायद भारत को समझने की सबसे ईमानदार कोशिशों में से एक है। इस पुस्तक में टुली कहते हैं कि भारत को पश्चिमी पैमानों से मापना एक बुनियादी भूल है। भारत में बदलाव तेज नहीं होते, यहां चीजें धीरे-धीरे बदलती हैं, लेकिन यही धीमापन भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति है। यहां लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और सुधार समय लेते हैं, पर जब आते हैं तो टिकते हैं।

आज जब 'तेज विकास' और 'फटाफट नतीजों' की भाषा राजनीतिक विमर्श पर हावी है, टुली की यह बात और अधिक प्रासंगिक लगती है। वे चेतावनी देते थे कि अगर भारत अपनी सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विविधता को नजरअंदाज कर केवल आंकड़ों और योजनाओं के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करेगा तो विकास तो होगा, लेकिन अर्थ खो जाएगा।

मार्क टुली की दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक 'द हार्ट ऑफ इंडिया'  भारतीय गांवों की उस सच्चाई को सामने लाती है, जो अक्सर शहरी बहसों में गुम हो जाती है। टुली मानते थे कि स्वतंत्रता के बाद भी नीति-निर्माण शहरों के नजरिए से होता रहा। गांव या तो पिछड़ेपन का प्रतीक बने, या फिर चुनावी भाषणों की भावनात्मक पंक्तियां। टुली गांवों में गए, वहां रहे और देखा कि जाति, परंपरा, धर्म और स्थानीय सत्ता किस तरह रोजमर्रा के जीवन को गढ़ते हैं।

उनके लेखन में ग्रामीण भारत कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि सांस लेता समाज है, जहां टकराव भी है, समझौते भी हैं और उम्मीद भी। वे यह भी दिखाते हैं कि गांव केवल समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा भी हो सकते हैं, बशर्ते उन्हें समझा जाए, उन पर निर्णय थोपे न जाएं।

पुस्तक 'नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया' में मार्क टुली भारत को एक ऐसी कहानी बताते हैं, जिसका कोई पूर्णविराम नहीं है। भारत में कोई भी फैसला आखिरी नहीं होता, कोई भी आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं होता। इतिहास यहां बंद किताब नहीं, बल्कि चलती बातचीत है। शायद यही वजह है कि भारत बार-बार टूटने के बाद भी खुद को जोड़ लेता है। टुली का मानना था कि यह अधूरापन ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

पंजाब संकट और ऑपरेशन ब्लू स्टार पर लिखी गई पुस्तक 'अमृतसर : मिसेज गांधी लास्ट बैटल' टुली के सबसे गंभीर लेखनों में गिनी जाती है। इसमें उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को केवल सुरक्षा या कानून-व्यवस्था का मामला नहीं माना, बल्कि इसे राजनीतिक संवाद की विफलता बताया। उनका तर्क था कि जब राज्य समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को समझे बिना निर्णय लेता है तो उसके घाव लंबे समय तक रिसते रहते हैं। यह आलोचना किसी विदेशी का उपदेश नहीं थी, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की चिंता थी, जो भारत को अपना मानने लगा था।

मार्क टुली भारत से प्रेम करते थे, लेकिन वे कभी भावुक अंधभक्त नहीं बने। उन्होंने नौकरशाही की जड़ता, राजनीतिक अवसरवाद, भ्रष्टाचार और आर्थिक असमानता पर खुलकर लिखा। उन्होंने पश्चिमी समाज की भी आलोचना की। उपभोक्तावाद, अति-व्यक्तिवाद और बाजार-केंद्रित जीवन-दृष्टि उन्हें खोखली लगती थी। उनके अनुसार पश्चिम ने सुविधाएं तो बढ़ाईं, लेकिन सामाजिक जुड़ाव खो दिया। भारत, अपनी तमाम समस्याओं के बावजूद, अब भी परिवार, समाज और आस्था को जीवन के केंद्र में रखता है, यही बात उन्हें यहां रोके रही।

बीबीसी से सेवानिवृत्ति के बाद भी मार्क टुली इंग्लैंड नहीं लौटे। इसका कारण कोई भावनात्मक क्षण नहीं, बल्कि वर्षों में बना एक विश्वास था कि भारत उन्हें सोचने, लिखने और संवाद करने का अर्थ देता है। भारत ने भी उन्हें केवल विदेशी पत्रकार नहीं, बल्कि एक ईमानदार मित्र की तरह स्वीकार किया। वर्ष 2002 में पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना इसी आपसी सम्मान का संकेत था।

आज जब मीडिया अक्सर शोर, ध्रुवीकरण और तात्कालिकता का शिकार है, मार्क टुली की पत्रकारिता हमें याद दिलाती है कि पत्रकार का काम सिर्फ बोलना नहीं, सुनना भी है। उनका लेखन भारत का आईना भी है और चेतावनी भी कि विकास की दौड़ में हम अपनी आत्मा न खो दें।

मार्क टुली का भारत पर लिखा साहित्य किसी विचारधारा का घोषणापत्र नहीं है। यह एक लंबी, धैर्यपूर्ण और ईमानदार बातचीत का दस्तावेज है। उन्होंने भारत को परिभाषित करने का दावा नहीं किया, बल्कि उसे समझने की कोशिश की। शायद इसी वजह से वे आज भी भारत को लेकर होने वाली गंभीर बहसों में एक भरोसेमंद आवाज माने जाते हैं।शायद यही वजह है कि मार्क टुली को भारत में अजनबी नहीं, अपना माना जाता है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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