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जिजीविषा: क्या अपने विचारों को भी देख सकते हैं आप?

Ananya Mishra अनन्या मिश्रा
Updated Sun, 25 Jan 2026 03:10 PM IST
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सार

मेटा-कॉग्निशन यानी अपनी सोच की प्रक्रिया को देख पाना, आत्म-जागरूकता की आधारशिला है। भारतीय दर्शन और आधुनिक मनोविज्ञान दोनों में इसे मानसिक स्वतंत्रता, आंतरिक शांति और आध्यात्मिक विकास का मूल साधन माना गया है।

IIM Indore's Dr. Ananya Mishra's column: 'Can you see your own thoughts?'
मेटा-कॉग्निशन विचारों के पीछे का विज्ञान। - फोटो : freepik AI
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विस्तार
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क्या आपने कभी यह अनुभव किया है कि किसी निर्णय के बाद आप स्वयं से ही कह बैठते हैं– मुझे यह नहीं सोचना चाहिए था, पर मैंने सोचा? या किसी बातचीत के बाद मन में यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या सामने वाले की बात में नहीं, बल्कि उसे लेकर बनी आपकी सोच में थी? ऐसे क्षण बहुत साधारण लगते हैं, पर वास्तव में यहीं से मनुष्य की सबसे गहरी चेतना का द्वार खुलता है। यही वह बिंदु है जहां हम केवल सोचते नहीं, बल्कि अपने सोचने की प्रक्रिया को देखने लगते हैं और यहीं से आत्म-जागरूकता की वास्तविक यात्रा आरम्भ होती है।

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आज के समय में एक सामान्य-सा प्रश्न लगभग हर व्यक्ति के भीतर उठता है, भले ही वह उसे शब्द न दे पाएं – हम जो सोच रहे हैं, क्या हम उस सोच को भी देख पा रहे हैं? दिन भर विचार आते-जाते रहते हैं, निर्णय बनते-बिगड़ते रहते हैं, भावनाएं उठती-गिरती रहती हैं, पर बहुत कम क्षण ऐसे होते हैं, जब हम रुककर यह ध्यान देते हैं कि यह सब भीतर हो कैसे रहा है। इसी बिंदु से ‘मेटा-कॉग्निशन’ की अवधारणा आरंभ होती है, जिसे सरल शब्दों में अपने ही सोचने की प्रक्रिया के प्रति सजग होना कहा जा सकता है। वर्तमान समय में यह सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंडिंग’ है, किन्तु यह धारणा प्राचीन है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यही वह क्षण है, जहां मनुष्य अनुभवकर्ता से साक्षी बनने की यात्रा शुरू करता है।
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मानसिक स्वतंत्रता का आरम्भ
मेटा-कॉग्निशन का अर्थ केवल बुद्धिमत्ता या अधिक सोचने की क्षमता नहीं है। इसका मूल अर्थ है यह जानना कि हम क्या सोच रहे हैं, क्यों सोच रहे हैं और उस सोच का हमारे व्यवहार, निर्णय और भावनात्मक अवस्था पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। जब तक व्यक्ति अपने विचारों के साथ पूरी तरह तादात्म्य बनाए रखता है, तब तक वह उनके अधीन रहता है। जैसे ही वह विचारों को देखने लगता है, उनके पीछे के कारण और शैली को समझने लगता है, वहीं से मानसिक स्वतंत्रता का आरम्भ होता है। आध्यात्मिक परंपराएं इसी स्थिति को चित्त की जागरूक अवस्था कहती हैं।

उपनिषदों में आत्मा को द्रष्टा और मन को दृश्य कहा गया
भारतीय दर्शन में भले ही मेटा-कॉग्निशन शब्द का प्रयोग न हुआ हो, पर इसकी अवधारणा अत्यंत स्पष्ट रूप से विद्यमान है। उपनिषदों में आत्मा को द्रष्टा और मन को दृश्य कहा गया है। इसका आशय यही है कि विचार, भाव और स्मृतियां देखी जा सकती हैं। जब यह बोध स्थिर होने लगता है, तब व्यक्ति केवल सोचता नहीं, बल्कि अपने सोचने को भी देखता है। यही स्थिति आध्यात्मिक साधना की आधार भूमि है, क्योंकि वहीं से विवेक और वैराग्य का विकास होता है।

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मानसिक तनाव का कारण क्या?
आधुनिक मनोविज्ञान में मेटा-कॉग्निशन को मानसिक स्वास्थ्य और सीखने की क्षमता से गहराई से जोड़ा गया है। शोध बताते हैं कि जो व्यक्ति अपनी सोच की प्रक्रिया को पहचान पाता है, वह तनाव, चिंता और आवेगपूर्ण निर्णयों से अधिक सुरक्षित रहता है। लगभग 60 प्रतिशत मानसिक तनाव का कारण यह नहीं होता कि समस्या क्या है, बल्कि यह होता है कि व्यक्ति उस समस्या के बारे में कैसे सोच रहा है। जब यह समझ विकसित हो जाती है कि विचार भी घटनाओं की तरह आते-जाते हैं, तब व्यक्ति उनके साथ बहने के बजाय उन्हें दिशा दे पाता है।

यह व्यक्ति को प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर ले जाता 
आध्यात्मिक संदर्भ में मेटा-कॉग्निशन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह व्यक्ति को प्रतिक्रिया से उत्तरदायित्व की ओर ले जाता है। सामान्य अवस्था में मनुष्य किसी घटना पर तुरंत प्रतिक्रिया करता है, क्योंकि विचार और स्वयं के बीच कोई दूरी नहीं होती। पर जब वह यह देख पाता है कि अभी मेरे भीतर क्रोध का विचार उठा है या भय की छाया आई है, तो वहीं एक अंतराल बनता है। उसी अंतराल में विवेक जन्म लेता है। यही अंतराल ध्यान और साधना का वास्तविक फल है। आज के डिजिटल युग में मेटा-कॉग्निशन की आवश्यकता और भी अधिक हो गई है। निरंतर सूचनाएं, मत, तुलना और अपेक्षाएं मन में विचारों की बाढ़ ला देती हैं। व्यक्ति यह भूल जाता है कि कौन-सा विचार उसका अपना है और कौन-सा आरोपित। जब यह भेद मिट जाता है, तब व्यक्ति अपनी ही सोच का शिकार बन जाता है। मेटा-कॉग्निशन यहां एक आंतरिक स्वच्छता का कार्य करता है, जहां व्यक्ति यह पहचानने लगता है कि कौन-सा विचार उपयोगी है और कौन-सा केवल मानसिक शोर। आध्यात्मिक साधना में ध्यान का वास्तविक उद्देश्य भी यही है। ध्यान का अर्थ विचारों को रोकना नहीं, बल्कि विचारों को स्पष्टता से देख पाना है। जब व्यक्ति विचारों को दबाने की कोशिश करता है, तब वे और अधिक तीव्र हो जाते हैं। पर जब वह उन्हें साक्षीभाव से देखता है, तब उनकी शक्ति क्षीण होने लगती है। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे व्यक्ति को मानसिक स्थिरता और आंतरिक शांति की ओर ले जाती है। यह शांति किसी विचार की अनुपस्थिति से नहीं, बल्कि विचारों पर जागरूकता से उत्पन्न होती है।

मन, बुद्धि और आत्मा के बीच वास्तविक समन्वय
मेटा-कॉग्निशन व्यक्ति को आत्म-धोखे से भी बचाता है। अकसर हम अपने निर्णयों को तर्कसंगत मान लेते हैं, जबकि वे भीतर छिपे भय, अहंकार या असुरक्षा से प्रेरित होते हैं। जब व्यक्ति अपनी सोच को देखना सीखता है, तब वह यह पहचान पाता है कि वह वास्तव में किस प्रेरणा से कार्य कर रहा है। यही पहचान आध्यात्मिक ईमानदारी का आधार है। बिना इस ईमानदारी के साधना भी केवल आदत बनकर रह जाती है। मेटा-कॉग्निशन और आध्यात्मिकता का संगम व्यक्ति को भीतर से स्वतंत्र बनाता है। वह विचारों का दमन नहीं करता, न ही उनसे पलायन करता है, बल्कि उन्हें समझकर अपने जीवन में उनका सही स्थान निर्धारित करता है। जब सोच पर यह दृष्टि विकसित हो जाती है, तब जीवन की परिस्थितियां पहले जैसी ही रहती हैं, पर उनके प्रति प्रतिक्रिया बदल जाती है। यही परिवर्तन आध्यात्मिक विकास का वास्तविक संकेत है। यह आत्म-जागरूकता की वह सीढ़ी है, जो मनुष्य को अचेतन जीवन से सचेत जीवन की ओर ले जाती है। जब व्यक्ति अपने सोचने को देखना सीख लेता है, तब ही वह अपने जीवन को सच में जीना प्रारंभ करता है। यही बोध आध्यात्मिकता का मर्म है, और यही वह मार्ग है जहां मन, बुद्धि और आत्मा के बीच वास्तविक समन्वय संभव हो पाता है।

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