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शंकराचार्य प्रकरण: यह राजसत्ता और धर्मसत्ता के बीच वर्चस्व की लड़ाई है...

Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Sat, 24 Jan 2026 02:59 PM IST
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सार

शंकराचार्य मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के लिए पालनी में सवार होकर जाना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने इसे नियमों का उल्लंघन कहकर रोक दिया।

Shankaracharya episode: This is a battle for supremacy between political power and religious power
शंकराचार्य स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद सरस्वती। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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प्रयागराज में इन दिनो दो सनातनियों के बीच जिस स्तर की रस्साकशी चल रही है, उसका रिश्ता धर्म से कम सांसारिक माया-मोह, धर्म सत्ता और राजसत्ता के बीच वर्चस्व की लड़ाई तथा व्यक्तिगत अहं टकराव ज्यादा लगता है।

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इसी की आड़ में राजनीतिक हित भी साधे जा रहे हैं। संतों का सम्मान होना चाहिए, इसमें दो राय नहीं, लेकिन इस घटनाक्रम से यह भी उजागर हो रहा है कि आम लोगों को मोह-माया से दूर होकर भगवत भक्ति में मन रमाने का उपदेश देने वाले खुद कितने सत्ता मोह से ग्रस्त हैं।
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भारतीय परंपरा में धर्म सत्ता को राजसत्ता से ऊपर माना गया है, लेकिन धर्म सत्ता और राजसत्ता एक हो जाएं तो धर्म सत्ता की जो हालत होती है, वह प्रयागराज प्रकरण से समझी जा सकती है। प्रयागराज माघ मेले में मेला प्रशासन के नोटिस और कथित दुर्व्यवहार से नाराज ज्योतिेषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठे हैं।

शंकराचार्य मौनी अमावस्या पर संगम स्नान के लिए पालनी में सवार होकर जाना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने इसे नियमों का उल्लंघन कहकर रोक दिया। उनके  शिष्यों के साथ झूमा झटकी भी हुई। मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को नोटिस थमा दिया कि वे किस आधार पर स्वयं को शंकराचार्य बता रहे हैं, जबकि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

प्रशासन के इस रवैये से नाराज शंकराचार्य धरने पर बैठे हैं। उन्होंने इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जिम्मेदार माना है। इस पर योगी ने शंकराचार्य को परोक्ष रूप से कालनेमि ( असुर) कहा। यानी यह योगी और जोगी की लड़ाई में तब्दील हो गई है।

उधर स्वामीजी के साथ प्रशासन के व्यवहार को लेकर सनातनी साधु संत भी दो खेमो में बंट गए हैं। आचार्य रामभद्राचार्य का कहना है कि मेले में संगम पर स्नान के लिए सभी को पैदल जाना होता है तो शंकराचार्य पालकी और रथ पर सवार होकर जाने की जिद क्यों कर रहे हैं? जबकि बाकी तीन पीठों के शंकराचार्यों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ प्रशासन के व्यवहार की कड़ी निंदा की है।

कुछ साधु संत इसे सनातनियों का आपसी विवाद मानकर मिल बैठकर सुलझाने की सलाह दे रहे हैं तो कुछ ने इसको लेकर आंदोलन की चेतावनी दी है। इस पूरे प्रकरण की गूंज उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा की आंतरिक खींचतान में भी साफ सुनाई देने लगी है। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सुर अलग-अलग हैं।

मौर्य ने कहा कि शंकराचार्य हमारे सम्माननीय हैं। उनके साथ दुर्व्यवहार करने वालों की जांच कर समुचित कार्रवाई होगी। यह डेमेज कंट्रोल  या और कुछ, यह आनेवाले समय में पता चलेगा। पहले राजसत्ता धर्मसत्ता से वैधता चाहती थी तो अब धर्मसत्ता राजसत्ता से वैधता मांग रही है।

इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है कि हिंदू धर्म में अब राजसत्ता ही धर्मसत्ता की वैधता, दिशा और कार्यप्रणाली तय करने लगी है। इस प्रकरण में जहां योगी के पीछे भाजपा का एक बड़ा वर्ग खड़ा है तो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पीछे कांग्रेस और कई विपक्षी राजनीतिक दल खड़े हैं। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को उनकी हैसियत बताने के पीछे यह भी बड़ा कारण है।

उल्लेखनीय है कि आदि शंकराचार्य ने देश में चार पीठ स्थापित कर उनकी सत्ता शंकराचार्यों को सौंपी थी ताकि सनातन धर्म का समुचित प्रबंधन, संवर्द्धन किया जा सके। लेकिन आज इन चारों के अलावा भी स्वयंभू शंकराचार्यों की संख्या भी  इतनी हो चुकी है कि शंकराचार्य पद की गरिमा, गुरूत्व और वैधता पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है।

अगर विवादों में घिरे ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ही बात करें तो उनका पहला ‘अपराध’ तो यही है कि वो वैचारिक रूप से ‘कांग्रेसी’ रूझान रखते हैं। भाजपाई खेमा तो संत अविमुक्तेश्वरानंद के गुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के बारे में भी यही राय रखता था। यानी वो राम मंदिर के समर्थक थे, लेकिन संघ विचार के विरूद्ध थे। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य का पद पहले भी विवादों में रहा है।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंदजी का असल नाम उमाशंकर उपाध्याय है तथा वो संस्कृत में उपाधिधारी हैं। वो छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे। बाद में स्वामी करपात्रीजी महाराज के सान्निध्य में रहकर संन्यास की ओर प्रवृत्त हुए और पूर्व शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उन्हें 2003 में दीक्षा दी।

स्वामी स्वरूपानंदजी का 11 सितंबर  2022 को 98 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। इसके दूसरे ही दिन यानी 12 सितंबर को अविमुक्तेश्वरानंदजी ने अपना पट्टाभिषेक कर स्वयं को शंकराचार्य  घोषित कर िदया। इसके खिलाफ एक और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती 21 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट चले गए।

उनका कहना था कि अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति परंपरा के अनुसार नहीं है। इस बीच अविमुक्तेश्वरानंद ने झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में 10 करोड़ मानहानि का मुकदमा दायर किया है, जो अभी विचाराधीन है। अविमुक्तेश्वरानंद खुद को ही ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बताते हैं। क्योंकि अदालत ने भी उन्हें ‘शंकराचार्य’ ही कहा है। हालांकि अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी।

हवाला दिया गया कि गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य ने अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति को मान्यता नहीं दी है। इस मामले में अंतिम फैसला अभी आना है। बताया जाता है कि दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद की वसीयत के आधार पर निजी सचिव और उनके शिष्य सुबोद्धानंद ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ और स्वामी सदानंद को द्वारका पीठ की गद्दी सौंपी थी।

इसके बाद भी शंकराचार्य पद को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। स्वामी  अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि कोर्ट का ऐसा कोई भी आदेश नहीं है, जो उन्हें शंकराचार्य कहलाने से रोकता हो।  वैसे अविमुक्तेश्वरानंद और उनके गुरू दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद की शंकराचार्य के रूप में नियुक्ति भी अविवादित नहीं थी।

वैसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरू और दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद की शंकराचार्य के रूप में नियुक्ति अविवादित नहीं थी। बरसों तक लुप्त माने गए ज्योतिष पीठ को फिर से पुनर्जीवित करने वाले स्वामी ज्ञानानंद ने ही शास्त्रार्थ के जरिए पहले शंकराचार्य के रूप में स्वामी ब्रह्मानंद को नियुक्त किया था।

1953 में उनके देहावासन के बाद वसीयत के आधार पर चार लोगों को आचार्य पद के लिए नामित किया गया, लेकिन ये  सभी अदालत के परीक्षण में अयोग्य घोषित कर दिए गए। इसके बाद 25 जून 1953 को स्वामी कृष्णबोधाश्रम का अभिषेक हुआ और उनके निधन के बाद स्वामी स्वरूपानंद का नाम शंकराचार्य पद के लिए घोषित किया गया था। लेकिन उनकी नियुक्ति पर भी विवाद हुआ। मामला कोर्ट तक गया। 

शंकरचार्यों की नियुक्ति व निलंबन गुरू शिष्य परंपरा में ‘मठाम्नाय महानुशासन’ ग्रंथ के अनुसार होता है। निरंजनी अखाड़े और गोवर्धन मठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने ज्योतिष पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति का समर्थन नहीं किया था।

यही नहीं, अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरिगिरि ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पद को लेकर कहा कि नए शंकराचार्य को समस्त 13 अखाड़े मिलकर एक साथ चादर ओढ़ाते हैं।  तभी  उन्हें पूरे समाज का शंकराचार्य माना जाता है।

हालांकि, बहुत से सनातनियों का मानना है कि भले ही शंकराचार्य अपनी सत्ता के लिए अदालतों में मुकदमें लड़ रहे हों, लेकिन जनमानस में उनके प्रति आदर और सम्मान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि वो धर्माधीश हैं। लेकिन आज धर्मसत्ता के लिए शंकराचार्यों का यह आचरण आदि शंकराचार्य के उस मूल सिद्धांत ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ के अनुरूप प्रतीत नहीं होता।

यहां सारी लड़ाई धर्म को सत्ता के रूप में हासिल करने और उस पर काबिज रहने तथा गृहस्थाश्रम को छोड़कर तमाम सांसारिक सुखों को उपभोगने की है।

वैसे शंकराचार्य बनने की लंबी और कठिन प्रक्रिया है। शंकराचार्य वही बन सकता है, जो दंडी संन्यासी हो, तन मन से पवित्र हो, वेदांत का ज्ञाता हो। जिसे प्रतिष्ठित संतों और काशी विद्वत परिषद की मान्यता हो। लेकिन इसमें एक अजीब शर्त यह भी है कि उसने कभी समुद्र पार न किया हो यानी विदेश यात्रा न की हो।

इस शर्त ने हिंदू धर्म का बहुत नुकसान किया है। आज जबरन धर्मांतरण रोकने के साथ साथ वैश्विक स्तर पर हिंदू और सनातन धर्म के प्रचार प्रसार की आवश्यकता है, तभी हम अन्य धर्मों के विश्व व्यापी धर्मांतरण नेटवर्क का मुकाबला कर पाएंगे। इस दृष्टि से सनातन धर्म शंकराचार्यों की कोई रचनात्मक भूमिका नहीं है। .
 
यहां सवाल फिर वही कि धर्मसत्ता सर्वोपरि है अथवा राजसत्ता? ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने भी धर्म का उपयोग राज्य हित में करने की वकालत की थी। लेकिन उनका तात्पर्य धर्म की नैतिक सत्ता से था न कि भौतिक सत्ता से।

जबकि धर्म निरपेक्षता राज्य और धर्म को अलग अलग मानती है। प्लेटो का मानना था कि राज्य के शासकों को सामाजिक एकता और स्थिरता बनाए रखने के लिए पौराणिक कहानियों या "उत्कृष्ट झूठ" ( नोबल लाई) का उपयोग करना चाहिए, जो एक तरह से धार्मिक विश्वास को नियंत्रित करना है।

इसमें दो राय नहीं कि आज भारत में जितने भी खुद को संत महात्मा पीठाधीश्वर आदि कहलवाने वाले लोग हैं, वो धर्म के प्रचारक भले हों, धर्म के नियंता और रक्षक तो शायद ही हैं। ज्यादातर राजसत्ता के कृपाकांक्षी हैं और राजसत्ता उनके समर्थन से अपनी वैधता के दायरे को और विस्तृत तथा गहरा करना चाहती है।

‘संत को कहा सीकरी सों काम’ की निर्मोही लेकिन नैतिक सत्ता वाले संत अब दुर्लभ हैं। कथावाचकों, बाबाओं, धर्माधिकारियों और धर्म के नाम पर स्वघोषित धर्माचार्यों की संख्या बढ़ती जा रही है और उसी तादाद में इनके भक्तों की तादाद भी बढ़ रही है। 

कौन कब किस बाबा का चोला पहन कर अवतरित हो जाए और लोग अपने विवेक को ताक पर रखकर उसकी सेवा में लीन हो जाएं, कहा नहीं जा सकता। धर्म और धर्माचार्यो की महत्ता और आदर होना ही चाहिए, लेकिन उसकी आड़ में पाखंड और सांसारिक सुखों के लिए निम्न स्तर की लड़ाई का विरोध भी जरूरी है। वरना एक आम इंसान और साधु-संतों और धर्माचार्यों में फर्क ही क्या है?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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