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संस्कृति के पन्नों से: पतित को पापों से कैसे मिली मुक्ति, जानना जरूरी है
आशुतोष गर्ग, लेखक एवं अनुवादक
Published by: पवन पांडेय
Updated Sun, 25 Jan 2026 07:18 AM IST
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सार
पतित को पापों से कैसे मिली मुक्ति? ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद से कहा, 'पश्चाताप और सदाचार से मनुष्य पुनरुत्थान के मार्ग पर जा सकता है। सदाचारी मनुष्य का पाप प्रतिदिन घटता है तथा दुराचारी मनुष्य का पुण्य प्रतिदिन नष्ट होता है।'
पतित को पापों से कैसे मिली मुक्ति?
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देवर्षि नारद ने भगवान ब्रह्मा से पूछा, 'यदि कोई व्यक्ति अनेक पाप करने के बाद फिर पुण्य का आचरण करे, तो उसे कौन-सी गति मिलती है?' नारद जी का प्रश्न रोचक था। ब्रह्माजी ने कहा, 'वत्स, जो मनुष्य पाप करने के बाद भी अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है और सच्चे हृदय से धर्म के मार्ग पर लौट आता है, तो वह अपने पापों से मुक्त हो जाता है।'
फिर ब्रह्माजी ने इस विषय पर एक कथा सुनाई। पूर्वकाल में एक ब्राह्मण का युवा पुत्र था, जिसने एक चांडाल स्त्री के साथ संबंध बना लिए। उस स्त्री से युवक की कई संतानें हुईं। फिर वह अपना घर छोड़कर चांडाली के साथ रहने लगा, पर भीतर से वह पूरी तरह भ्रष्ट नहीं हुआ था। वह अभक्ष्य भोजन और मदिरा का सेवन नहीं करता था। चांडाली उसे बार-बार मांस खाने और मदिरा पीने को कहती थी, लेकिन युवक ने कभी चांडाली की बात नहीं मानी।
उस आग में चांडाली, उसके बच्चे और उसका घर, सब जलकर भस्म हो गए। तभी युवक जाग गया और उस दृश्य को देखकर रोने लगा। वह बोला, 'यह आग कहां से आई? मेरा घर कैसे जल गया?'
तभी आकाशवाणी हुई, 'यह अग्नि तुम्हारे ब्रह्मतेज से उत्पन्न हुई है। जब तुम्हारे मुख में शराब डाली गई, तब तुम्हारा तेज प्रकट हो गया।' यह सुनकर युवक आश्चर्य में पड़ गया। उसने मन में सोचा, 'मैं पथभ्रष्ट हो गया था, फिर भी मेरा ब्रह्मतेज नष्ट नहीं हुआ। अब मुझे इस अधर्म से दूर रहकर धर्म का पालन करना चाहिए।' ऐसा निश्चय करके वह ऋषि-मुनियों के पास गया और बोला, 'मैं पतित हूं। कृपया मुझे कोई उपाय बताइए, जिससे मैं फिर से अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लूं।' मुनि बोले, 'वत्स, दान, तप और व्रत से सब तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं। तुम शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करो। चांद्रायण, कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र और प्राजापत्य व्रत का अनुष्ठान करो। ये व्रत मनुष्य के दोषों को नष्ट कर देते हैं। श्रीहरि की भक्ति करो। यही तुम्हारे उद्धार का मार्ग है। तीर्थ और भक्ति के प्रभाव से तुम्हारे पाप अवश्य नष्ट हो जाएंगे और तुम फिर ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सकोगे।'
ऋषियों की आज्ञा मानकर युवक ने तपस्या आरंभ की। प्रारंभ में उसे कठिनाई हुई, पर उसने धैर्य नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे उसका मन शुद्ध हो गया और उसे शांति व संतोष का अनुभव होने लगा। कुछ समय बाद उसके सब पाप नष्ट हो गए और वह फिर ब्राह्मणत्व के योग्य बन गया। उसने स्वर्गलोक को प्राप्त किया। ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद से कहा, 'पश्चाताप और सदाचार से मनुष्य पुनरुत्थान के मार्ग पर जा सकता है। सदाचारी मनुष्य का पाप प्रतिदिन घटता है और दुराचारी मनुष्य का पुण्य प्रतिदिन नष्ट होता है। जो अनाचार से गिर गया हो, वह यदि पुन: सदाचार का मार्ग अपनाए, तो देवत्व को प्राप्त कर सकता है। इसलिए द्विजों को चाहिए कि वे संकट में भी धर्म का मार्ग न छोड़ें। सदाचार ही मनुष्य की रक्षा करता है और वही उसे मोक्ष की ओर ले जाता है।'
फिर ब्रह्माजी बोले, 'नारद, तुम भी मन, वाणी व कर्म से सदाचार का पालन करो। शुद्ध मन से शुद्ध वाणी निकलती है और शुद्ध वाणी से शुद्ध कर्म होते हैं। यही धर्म का सार है तथा यही जीवन का उद्देश्य है।' गलती करने के बाद भी यदि मनुष्य सच्चे मन से पश्चाताप करे और धर्म का मार्ग अपनाए, तो उसमें सुधार संभव है। संयम, दया, सेवा, भक्ति और सत्य के साथ जिया गया जीवन, मन को शुद्ध करता है और समाज में शांति और विश्वास बढ़ाता है, जिससे सभी का कल्याण होता है।
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फिर ब्रह्माजी ने इस विषय पर एक कथा सुनाई। पूर्वकाल में एक ब्राह्मण का युवा पुत्र था, जिसने एक चांडाल स्त्री के साथ संबंध बना लिए। उस स्त्री से युवक की कई संतानें हुईं। फिर वह अपना घर छोड़कर चांडाली के साथ रहने लगा, पर भीतर से वह पूरी तरह भ्रष्ट नहीं हुआ था। वह अभक्ष्य भोजन और मदिरा का सेवन नहीं करता था। चांडाली उसे बार-बार मांस खाने और मदिरा पीने को कहती थी, लेकिन युवक ने कभी चांडाली की बात नहीं मानी।
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एक दिन युवक थका हुआ था और उसे नींद आ गई। उसी समय चांडाली ने उसके मुंह में शराब की कुछ बूंदें डाल दीं। जैसे ही मदिरा की बूंद मुख में पड़ी, युवक के मुंह से अग्नि निकलने लगी। आग फैलती चली गई और उसने पूरे घर को जला डाला।
उस आग में चांडाली, उसके बच्चे और उसका घर, सब जलकर भस्म हो गए। तभी युवक जाग गया और उस दृश्य को देखकर रोने लगा। वह बोला, 'यह आग कहां से आई? मेरा घर कैसे जल गया?'
तभी आकाशवाणी हुई, 'यह अग्नि तुम्हारे ब्रह्मतेज से उत्पन्न हुई है। जब तुम्हारे मुख में शराब डाली गई, तब तुम्हारा तेज प्रकट हो गया।' यह सुनकर युवक आश्चर्य में पड़ गया। उसने मन में सोचा, 'मैं पथभ्रष्ट हो गया था, फिर भी मेरा ब्रह्मतेज नष्ट नहीं हुआ। अब मुझे इस अधर्म से दूर रहकर धर्म का पालन करना चाहिए।' ऐसा निश्चय करके वह ऋषि-मुनियों के पास गया और बोला, 'मैं पतित हूं। कृपया मुझे कोई उपाय बताइए, जिससे मैं फिर से अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लूं।' मुनि बोले, 'वत्स, दान, तप और व्रत से सब तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं। तुम शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करो। चांद्रायण, कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र और प्राजापत्य व्रत का अनुष्ठान करो। ये व्रत मनुष्य के दोषों को नष्ट कर देते हैं। श्रीहरि की भक्ति करो। यही तुम्हारे उद्धार का मार्ग है। तीर्थ और भक्ति के प्रभाव से तुम्हारे पाप अवश्य नष्ट हो जाएंगे और तुम फिर ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सकोगे।'
ऋषियों की आज्ञा मानकर युवक ने तपस्या आरंभ की। प्रारंभ में उसे कठिनाई हुई, पर उसने धैर्य नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे उसका मन शुद्ध हो गया और उसे शांति व संतोष का अनुभव होने लगा। कुछ समय बाद उसके सब पाप नष्ट हो गए और वह फिर ब्राह्मणत्व के योग्य बन गया। उसने स्वर्गलोक को प्राप्त किया। ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद से कहा, 'पश्चाताप और सदाचार से मनुष्य पुनरुत्थान के मार्ग पर जा सकता है। सदाचारी मनुष्य का पाप प्रतिदिन घटता है और दुराचारी मनुष्य का पुण्य प्रतिदिन नष्ट होता है। जो अनाचार से गिर गया हो, वह यदि पुन: सदाचार का मार्ग अपनाए, तो देवत्व को प्राप्त कर सकता है। इसलिए द्विजों को चाहिए कि वे संकट में भी धर्म का मार्ग न छोड़ें। सदाचार ही मनुष्य की रक्षा करता है और वही उसे मोक्ष की ओर ले जाता है।'
फिर ब्रह्माजी बोले, 'नारद, तुम भी मन, वाणी व कर्म से सदाचार का पालन करो। शुद्ध मन से शुद्ध वाणी निकलती है और शुद्ध वाणी से शुद्ध कर्म होते हैं। यही धर्म का सार है तथा यही जीवन का उद्देश्य है।' गलती करने के बाद भी यदि मनुष्य सच्चे मन से पश्चाताप करे और धर्म का मार्ग अपनाए, तो उसमें सुधार संभव है। संयम, दया, सेवा, भक्ति और सत्य के साथ जिया गया जीवन, मन को शुद्ध करता है और समाज में शांति और विश्वास बढ़ाता है, जिससे सभी का कल्याण होता है।