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तभी तो पूरी होगी भारत की कहानी: हिंदी सिनेमा से गायब हो रहे गांव? शहर खलनायक नहीं है, लेकिन हमें बना देता है
नीरज घेवाण
Published by: पवन पांडेय
Updated Mon, 26 Jan 2026 08:06 AM IST
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सार
सिनेमा को सिर्फ समाज का आईना नहीं होना चाहिए। इसे एक हथौड़ा होना चाहिए आकार देने के लिए, सवाल उठाने के लिए, जहां सहानुभूति नहीं है, वहां उसे बनाने के लिए।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
हम देखते हैं कि हिंदी सिनेमा से गांव गायब हो रहे हैं? देश का एक बड़ा हिस्सा अब ग्रामीण भारत में रहता है, लेकिन हम उन किरदारों के बारे में बात नहीं करते। अगर वे होते भी हैं, तो ज्यादातर स्टीरियोटाइप होते हैं। तो एक मकसद यह भी था कि वहां की कहानी के बारे में बात की जाए। हमारी भारतीय फिल्मों में कोई भी हाशिये पर पड़े लोगों या अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के बारे में बात नहीं कर रहा है। हमारी कहानियां सिर्फ हमारी 15 फीसदी आबादी तक ही सीमित हैं... शहर खलनायक नहीं है, लेकिन यह हमें खलनायक बना देता है। जब हम हाशिये पर पड़ी पहचानों की बात करते हैं, चाहे वे नस्लीय अल्पसंख्यक हों, या धार्मिक, या जाति, या यौन अल्पसंख्यक, या फिर प्रवासी, हम हमेशा उनके बारे में आंकड़ों में बात करते हैं।
आंकड़ा जरूरी है, लेकिन यह उन्हें अमानवीय भी बनाता है, क्योंकि जब शहरी भारत के लोग या दुनिया भर के शहरी इलाकों के लोग इनके बारे में बात करते हैं, तो वे खोखली सहानुभूति दिखाते हैं, जिसमें जवाबदेही की कमी होती है। हम सच में यह जानना नहीं चाहते कि उनके साथ क्या होता है। मानवीय पहलू इस फिल्म (होमबाउंड) को बनाने की असली वजहों में से एक था, और पीछे मुड़कर देखने के लिए भी। इसमें मैंने अपने बचपन से बहुत कुछ लिया है। मैं एक बड़े चॉल वाले घर में पला-बढ़ा हूं। मेरे बहुत सारे अनुभव, यहां तक कि 35 वर्षों तक खुद को छिपाने और पूरी तरह से सामने न आने की शर्म, मैंने इस फिल्म में डाली है।
मुझे भी अपनी शर्म को उस तरह से सामने लाने में डर लग रहा था। उस लिहाज से, यह मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से भी काफी राहत देने वाला था। मुझे यह फिल्म बनाने में डर लग रहा था कि इसका विरोध होगा। जब मैंने काम शुरू किया, तो एहसास हुआ कि इस फिल्म को देखने का तरीका यह होगा कि नारेबाजी, राजनीतिक दिखावे और उपदेश से दूर रहा जाए। दोस्ती का जरिया इतना शक्तिशाली है कि जब आप ऐसा करते हैं, तो यह विरोध का एक तरीका होता है। मुझे लगा कि इस पर कोई सवाल नहीं उठाएगा, क्योंकि सेंसर बोर्ड दोस्ती को कैसे सेंसर करेगा?
मेरी फिल्म व्यवस्था-विरोधी नहीं है; यह इन्सानियत के लिए है। यह लोगों में हमदर्दी जगाने की एक विनम्र अपील भी है, और मुझे लगता है कि जिस तरह से दुनिया चल रही है, उसमें बहुत नफरत है। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हम अपने दुश्मनों के सामने बैठें और उन्हें हमदर्दी दिखाएं। सिनेमा को सिर्फ समाज का आईना नहीं होना चाहिए। इसे एक हथौड़ा होना चाहिए-आकार देने के लिए, सवाल उठाने के लिए, और जहां सहानुभूति नहीं है, वहां उसे बनाने के लिए। हमारी खाने की आदतें, धर्म और जाति, या विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन सबसे जरूरी है एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और इन्सानियत। ऐसा सिर्फ उनके लिए नहीं होना चाहिए, जो हमारे जैसे दिखते हैं या हमारे जैसी बात करते हैं, बल्कि उनके लिए भी होना चाहिए, जो हमसे अलग हैं। हमें इन्सानियत को कम नहीं समझना चाहिए। यह सही समय है, क्योंकि हमारे पास ज्यादा फिल्में नहीं आई हैं, खासकर हाशिये पर पड़े लोगों की, जो अपने समुदाय के बारे में बात करती हों। -(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित )
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आंकड़ा जरूरी है, लेकिन यह उन्हें अमानवीय भी बनाता है, क्योंकि जब शहरी भारत के लोग या दुनिया भर के शहरी इलाकों के लोग इनके बारे में बात करते हैं, तो वे खोखली सहानुभूति दिखाते हैं, जिसमें जवाबदेही की कमी होती है। हम सच में यह जानना नहीं चाहते कि उनके साथ क्या होता है। मानवीय पहलू इस फिल्म (होमबाउंड) को बनाने की असली वजहों में से एक था, और पीछे मुड़कर देखने के लिए भी। इसमें मैंने अपने बचपन से बहुत कुछ लिया है। मैं एक बड़े चॉल वाले घर में पला-बढ़ा हूं। मेरे बहुत सारे अनुभव, यहां तक कि 35 वर्षों तक खुद को छिपाने और पूरी तरह से सामने न आने की शर्म, मैंने इस फिल्म में डाली है।
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मुझे भी अपनी शर्म को उस तरह से सामने लाने में डर लग रहा था। उस लिहाज से, यह मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से भी काफी राहत देने वाला था। मुझे यह फिल्म बनाने में डर लग रहा था कि इसका विरोध होगा। जब मैंने काम शुरू किया, तो एहसास हुआ कि इस फिल्म को देखने का तरीका यह होगा कि नारेबाजी, राजनीतिक दिखावे और उपदेश से दूर रहा जाए। दोस्ती का जरिया इतना शक्तिशाली है कि जब आप ऐसा करते हैं, तो यह विरोध का एक तरीका होता है। मुझे लगा कि इस पर कोई सवाल नहीं उठाएगा, क्योंकि सेंसर बोर्ड दोस्ती को कैसे सेंसर करेगा?
मेरी फिल्म व्यवस्था-विरोधी नहीं है; यह इन्सानियत के लिए है। यह लोगों में हमदर्दी जगाने की एक विनम्र अपील भी है, और मुझे लगता है कि जिस तरह से दुनिया चल रही है, उसमें बहुत नफरत है। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हम अपने दुश्मनों के सामने बैठें और उन्हें हमदर्दी दिखाएं। सिनेमा को सिर्फ समाज का आईना नहीं होना चाहिए। इसे एक हथौड़ा होना चाहिए-आकार देने के लिए, सवाल उठाने के लिए, और जहां सहानुभूति नहीं है, वहां उसे बनाने के लिए। हमारी खाने की आदतें, धर्म और जाति, या विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन सबसे जरूरी है एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और इन्सानियत। ऐसा सिर्फ उनके लिए नहीं होना चाहिए, जो हमारे जैसे दिखते हैं या हमारे जैसी बात करते हैं, बल्कि उनके लिए भी होना चाहिए, जो हमसे अलग हैं। हमें इन्सानियत को कम नहीं समझना चाहिए। यह सही समय है, क्योंकि हमारे पास ज्यादा फिल्में नहीं आई हैं, खासकर हाशिये पर पड़े लोगों की, जो अपने समुदाय के बारे में बात करती हों। -(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित )