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जमा पैसा, जकड़ी अर्थव्यवस्था: ईरान के 100 अरब डॉलर फंसे हैं बाहर, कहां-कहां मौजूद है यह पैसा?
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सार
ईरान-अमेरिका तनाव और प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि में तेहरान की अर्थव्यवस्था भारी दबाव झेल रही है। करीब 100 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति विदेशों में जमा है, जिनमें चीन, भारत, इराक, जापान, कतर, यूरोप के कुछ देश शामिल हैं। विस्तार से पढ़ें पूरा लेख।
अमेरिका ईरान युद्ध
- फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
ईरान बार-बार अपने फ्रीज हुए पैसों की बात क्यों कर रहा है, यह अब समझना बहुत जरूरी है। मामला सिर्फ इतना नहीं कि उसका पैसा बाहर पड़ा है। असल बात यह है कि उसने तेल बेचा, कमाई हुई, लेकिन पैसा अपने घर नहीं आया। बैंक बाहर के, नियम बाहर के, मुहर बाहर की और ताला भी बाहर वालों के हाथ में। अलग-अलग आकलनों में ईरान की जब्त की हुई विदेशी रकम 100 अरब डॉलर से ऊपर मानी जा रही है और अभी की बातचीत में कम से कम 6 अरब डॉलर छोड़ने की मांग सबसे ज्यादा चर्चा में है।
सीधी भाषा में समझिए। यह कोई ऐसा पैसा नहीं है जो ईरान ने कहीं गड्ढा खोदकर दबा रखा हो। यह वही कमाई है, जो तेल बेचकर आई, लेकिन पाबंदियों की वजह से दूसरे देशों के बैंकों में अटकती चली गई। 1979 के बाद शुरू हुई यह कहानी बीच-बीच में ढीली हुई, फिर कसी गई, फिर थोड़ी खुली, फिर दोबारा बंद कर दी गई। 2015 के परमाणु समझौते के बाद कुछ राहत मिली थी, लेकिन 2018 में अमेरिका के उससे बाहर निकलते ही फिर वही पुराना खेल शुरू हो गया यानी कमाई उसकी, लेकिन पहुंच किसी और की मर्जी पर।
अब ‘फ्रोजन एसेट्स’ सुनकर बहुत लोग समझते हैं कि शायद 100 अरब डॉलर किसी तहखाने में बक्सों के अंदर कैश रखे हुए हैं, लेकिन मामला इतना भी फिल्मी नहीं है। इसमें बैंक खातों में पड़ी रकम, तेल बिक्री की कमाई, विदेशी मुद्रा, कुछ सिक्योरिटीज और दूसरे वित्तीय दावे शामिल हैं इसलिए हर रिपोर्ट में रकम का अंक थोड़ा ऊपर-नीचे दिखता है। ऊपर से यह भी सच है कि अगर सारी रोक हट भी जाए तो पूरा पैसा एक ही सुबह ईरान की जेब में नहीं आ जाएगा। कुछ रकम पहले से पुराने भुगतानों, कर्ज या वादों से बंधी है लेकिन इससे यह बात छोटी नहीं हो जाती कि यह रकम बहुत बड़ी है और ईरान के लिए बहुत अहम है।
अब जरा यह भी देखिए कि पैसा पड़ा कहां है। अलग-अलग जानकारी के अनुसार चीन, भारत, इराक, जापान, कतर, यूरोप के कुछ हिस्सों और खुद अमेरिका में है। पुराने आकलनों में चीन में कम से कम 20 अरब डॉलर, भारत में करीब 7 अरब डॉलर, इराक में लगभग 6 अरब डॉलर, जापान में करीब 1.5 अरब डॉलर, कतर में 6 अरब डॉलर और यूरोप में भी अरबों डॉलर का दावा है। कतर वाला 6 अरब डॉलर इसलिए सबसे ज्यादा मशहूर हुआ क्योंकि यह पहले दक्षिण कोरिया में जमा ईरानी तेल कमाई थी, जिसे 2023 की कैदी अदला-बदली के बाद कतर लाया गया, लेकिन बाद में उस पर भी रोक लग गई यानी पैसा थोड़ा चला, फोटो खिंची, सुर्खियां बनीं, फिर ताला चढ़ गया।
यहीं इस पूरे मसले की असली जलन है। बाहर से खबर आती है कि पैसा खुल गया लेकिन अंदर की लाइन छोटी सी होती है कि खर्च कैसे होगा, किस चीज पर होगा, किसकी निगरानी में होगा यानी नाम का खुलना और हाथ का खुलना, दोनों अलग चीजें हैं। अभी हाल की बातचीत में ईरान की तरफ से यह कहा गया कि कुछ पैसे छोड़े बिना भरोसा कैसे बनेगा। दूसरी तरफ अमेरिकी तरफ से ऐसी खबरों को तुरंत नकार दिया गया कि कोई नया समझौता हो गया है। मतलब वही पुरानी चाल जिसमे सामने तो मुस्कुराहट है लेकिन पीछे उंगली ताले पर है।
अब सवाल यह है कि यह पैसा ईरान के लिए इतना जरूरी क्यों है इसलिए कि उसकी अर्थव्यवस्था बरसों से थकी हुई अर्थव्यवस्था है। तेल है, गैस है, लोग हैं, बाजार है, लेकिन पाबंदियों ने उसकी रफ्तार की कमर तोड़ रखी है। तेल बेचो तो पैसा अटकता है। बाहर से सामान खरीदो तो बैंक रास्ता रोकते हैं। करंसी पर दबाव पड़ता है, महंगाई बढ़ती है, बाजार घबराता है और सरकार हर मोर्चे पर हांफती रहती है। ऐसे में 100 अरब डॉलर कोई मामूली रकम नहीं। एक विशेषज्ञ ने इसे ईरान की सालाना हाइड्रोकार्बन कमाई का लगभग चार गुना बताया है और इस जब्त की हुई रकम का आकार लगभग उसके सकल घरेलू उत्पाद के चौथाई हिस्से के आसपास बैठ सकता है यानी यह बैलेंस शीट का खेल नहीं, ऑक्सीजन का मामला है।
अब जरा हालात से जोड़िए। ताजा टकराव और समुद्री दबाव के बीच ईरान के तेल निर्यात पर चोट का खतरा बढ़ा है। आकलन यह भी है कि लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन के आसपास का निर्यात दबाव में आ सकता है और अगर निर्यात लंबा अटका तो असर सीधा उसके खजाने पर पड़ेगा। ऐसे में बाहर फंसा पैसा और भी ज्यादा अहम हो जाता है। मतलब यह कि एक तरफ कमाई का नल दबा हुआ है, दूसरी तरफ घर के बाहर रखी बाल्टी पर भी ताला लगा हुआ है। फिर कहा जाता है कि ईरान अपनी अर्थव्यवस्था क्यों नहीं संभालता। भाई, सांस रोकोगे तो आदमी गाना थोड़ी गाएगा।
यह मसला सिर्फ ईरान का घरेलू मामला भी नहीं है। होर्मुज में तनाव बढ़ता है तो उसका असर तेल, जहाज, बीमा, सप्लाई और महंगाई तक जाता है। इसी बड़े असर के बीच वैश्विक विकास दर के अनुमान नीचे आए हैं और महंगाई के जोखिम बने हुए हैं यानी तेहरान में सांस अटके तो असर सिर्फ तेहरान तक नहीं रुकता। दुनिया को भी जेब ढीली करनी पड़ती है इसलिए ईरान के जब्त हुए पैसे का सवाल सिर्फ उसे देना है या नहीं वाला सवाल नहीं, बल्कि इलाके को और कितना खींचना है, वाला सवाल भी है।
अब एक और सीधी बात। यह कहना कि 100 अरब डॉलर खुल गए तो ईरान रातों-रात संभल जाएगा, यह भी आधी बात है और यह कहना कि इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा, यह तो और भी बड़ी आधी बात है। फर्क पड़ेगा, खूब पड़ेगा लेकिन जादू की छड़ी की तरह नहीं। कुछ रकम बंधी होगी, कुछ पर शर्तें होंगी, कुछ के इस्तेमाल पर निगरानी होगी। फिर भी, बरसों से जकड़े हुए देश को अपनी ही कमाई का थोड़ा हिस्सा भी मिल जाए तो वह छोटा मोड़ नहीं होता इसलिए तेहरान इस मसले को सिर्फ पैसों की लाइन नहीं, हक और इज्जत की लाइन की तरह पेश कर रहा है। अमेरिका इसे दबाव का औजार मानता है, ईरान इसे अपना पैसा कहता है। लड़ाई यहीं फंसी हुई है।
और अब सबसे सीधी बात सुन लीजिए। ईरान का 100 अरब डॉलर बाहर फंसा होना सिर्फ बैंकिंग की खबर नहीं है। यह उस देश की कहानी है जो अपनी ही कमाई को छूने के लिए दूसरे के इशारे का मोहताज बना दिया गया। अभी छह अरब डॉलर की मांग इसलिए छोटी नहीं है क्योंकि कई बार पहली सीढ़ी ही सबसे मुश्किल होती है। अगर यह रकम खुलती है तो ईरान को राहत, बाजार को संकेत और इलाके को थोड़ा सुकून मिल सकता है। अगर नहीं खुलती, तो फिर वही पुराना नाटक चलेगा, बाहर बातचीत, अंदर ताला और सच पूछिए, यही इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सार है।
ईरान के जब्त हुए 100 अरब डॉलर वाला मामला सिर्फ पैसा अटकने की कहानी नहीं है। यह तेल की कमाई, पाबंदियों, बैंकिंग, महंगाई, करंसी, जंग के बाद की मरम्मत और सियासी इज्जत, सबका मिला-जुला झगड़ा है। छह अरब डॉलर की जो बात चल रही है, वह रकम में छोटी दिख सकती है लेकिन भरोसे और राहत में बड़ी है। तेहरान के लिए यह पैसा बंद तिजोरी नहीं, बंद सांस की तरह है। अगर ताला खुलता है तो राहत सिर्फ खाते में नहीं, पूरे माहौल में दिखेगी। अगर ताला जस का तस रहता है, तो फिर वही पुराना मंजर रहेगा, पैसा उसका, पकड़ किसी और की।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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अब ‘फ्रोजन एसेट्स’ सुनकर बहुत लोग समझते हैं कि शायद 100 अरब डॉलर किसी तहखाने में बक्सों के अंदर कैश रखे हुए हैं, लेकिन मामला इतना भी फिल्मी नहीं है। इसमें बैंक खातों में पड़ी रकम, तेल बिक्री की कमाई, विदेशी मुद्रा, कुछ सिक्योरिटीज और दूसरे वित्तीय दावे शामिल हैं इसलिए हर रिपोर्ट में रकम का अंक थोड़ा ऊपर-नीचे दिखता है। ऊपर से यह भी सच है कि अगर सारी रोक हट भी जाए तो पूरा पैसा एक ही सुबह ईरान की जेब में नहीं आ जाएगा। कुछ रकम पहले से पुराने भुगतानों, कर्ज या वादों से बंधी है लेकिन इससे यह बात छोटी नहीं हो जाती कि यह रकम बहुत बड़ी है और ईरान के लिए बहुत अहम है।
अब जरा यह भी देखिए कि पैसा पड़ा कहां है। अलग-अलग जानकारी के अनुसार चीन, भारत, इराक, जापान, कतर, यूरोप के कुछ हिस्सों और खुद अमेरिका में है। पुराने आकलनों में चीन में कम से कम 20 अरब डॉलर, भारत में करीब 7 अरब डॉलर, इराक में लगभग 6 अरब डॉलर, जापान में करीब 1.5 अरब डॉलर, कतर में 6 अरब डॉलर और यूरोप में भी अरबों डॉलर का दावा है। कतर वाला 6 अरब डॉलर इसलिए सबसे ज्यादा मशहूर हुआ क्योंकि यह पहले दक्षिण कोरिया में जमा ईरानी तेल कमाई थी, जिसे 2023 की कैदी अदला-बदली के बाद कतर लाया गया, लेकिन बाद में उस पर भी रोक लग गई यानी पैसा थोड़ा चला, फोटो खिंची, सुर्खियां बनीं, फिर ताला चढ़ गया।
यहीं इस पूरे मसले की असली जलन है। बाहर से खबर आती है कि पैसा खुल गया लेकिन अंदर की लाइन छोटी सी होती है कि खर्च कैसे होगा, किस चीज पर होगा, किसकी निगरानी में होगा यानी नाम का खुलना और हाथ का खुलना, दोनों अलग चीजें हैं। अभी हाल की बातचीत में ईरान की तरफ से यह कहा गया कि कुछ पैसे छोड़े बिना भरोसा कैसे बनेगा। दूसरी तरफ अमेरिकी तरफ से ऐसी खबरों को तुरंत नकार दिया गया कि कोई नया समझौता हो गया है। मतलब वही पुरानी चाल जिसमे सामने तो मुस्कुराहट है लेकिन पीछे उंगली ताले पर है।
अब सवाल यह है कि यह पैसा ईरान के लिए इतना जरूरी क्यों है इसलिए कि उसकी अर्थव्यवस्था बरसों से थकी हुई अर्थव्यवस्था है। तेल है, गैस है, लोग हैं, बाजार है, लेकिन पाबंदियों ने उसकी रफ्तार की कमर तोड़ रखी है। तेल बेचो तो पैसा अटकता है। बाहर से सामान खरीदो तो बैंक रास्ता रोकते हैं। करंसी पर दबाव पड़ता है, महंगाई बढ़ती है, बाजार घबराता है और सरकार हर मोर्चे पर हांफती रहती है। ऐसे में 100 अरब डॉलर कोई मामूली रकम नहीं। एक विशेषज्ञ ने इसे ईरान की सालाना हाइड्रोकार्बन कमाई का लगभग चार गुना बताया है और इस जब्त की हुई रकम का आकार लगभग उसके सकल घरेलू उत्पाद के चौथाई हिस्से के आसपास बैठ सकता है यानी यह बैलेंस शीट का खेल नहीं, ऑक्सीजन का मामला है।
अब जरा हालात से जोड़िए। ताजा टकराव और समुद्री दबाव के बीच ईरान के तेल निर्यात पर चोट का खतरा बढ़ा है। आकलन यह भी है कि लगभग 20 लाख बैरल प्रतिदिन के आसपास का निर्यात दबाव में आ सकता है और अगर निर्यात लंबा अटका तो असर सीधा उसके खजाने पर पड़ेगा। ऐसे में बाहर फंसा पैसा और भी ज्यादा अहम हो जाता है। मतलब यह कि एक तरफ कमाई का नल दबा हुआ है, दूसरी तरफ घर के बाहर रखी बाल्टी पर भी ताला लगा हुआ है। फिर कहा जाता है कि ईरान अपनी अर्थव्यवस्था क्यों नहीं संभालता। भाई, सांस रोकोगे तो आदमी गाना थोड़ी गाएगा।
यह मसला सिर्फ ईरान का घरेलू मामला भी नहीं है। होर्मुज में तनाव बढ़ता है तो उसका असर तेल, जहाज, बीमा, सप्लाई और महंगाई तक जाता है। इसी बड़े असर के बीच वैश्विक विकास दर के अनुमान नीचे आए हैं और महंगाई के जोखिम बने हुए हैं यानी तेहरान में सांस अटके तो असर सिर्फ तेहरान तक नहीं रुकता। दुनिया को भी जेब ढीली करनी पड़ती है इसलिए ईरान के जब्त हुए पैसे का सवाल सिर्फ उसे देना है या नहीं वाला सवाल नहीं, बल्कि इलाके को और कितना खींचना है, वाला सवाल भी है।
अब एक और सीधी बात। यह कहना कि 100 अरब डॉलर खुल गए तो ईरान रातों-रात संभल जाएगा, यह भी आधी बात है और यह कहना कि इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा, यह तो और भी बड़ी आधी बात है। फर्क पड़ेगा, खूब पड़ेगा लेकिन जादू की छड़ी की तरह नहीं। कुछ रकम बंधी होगी, कुछ पर शर्तें होंगी, कुछ के इस्तेमाल पर निगरानी होगी। फिर भी, बरसों से जकड़े हुए देश को अपनी ही कमाई का थोड़ा हिस्सा भी मिल जाए तो वह छोटा मोड़ नहीं होता इसलिए तेहरान इस मसले को सिर्फ पैसों की लाइन नहीं, हक और इज्जत की लाइन की तरह पेश कर रहा है। अमेरिका इसे दबाव का औजार मानता है, ईरान इसे अपना पैसा कहता है। लड़ाई यहीं फंसी हुई है।
और अब सबसे सीधी बात सुन लीजिए। ईरान का 100 अरब डॉलर बाहर फंसा होना सिर्फ बैंकिंग की खबर नहीं है। यह उस देश की कहानी है जो अपनी ही कमाई को छूने के लिए दूसरे के इशारे का मोहताज बना दिया गया। अभी छह अरब डॉलर की मांग इसलिए छोटी नहीं है क्योंकि कई बार पहली सीढ़ी ही सबसे मुश्किल होती है। अगर यह रकम खुलती है तो ईरान को राहत, बाजार को संकेत और इलाके को थोड़ा सुकून मिल सकता है। अगर नहीं खुलती, तो फिर वही पुराना नाटक चलेगा, बाहर बातचीत, अंदर ताला और सच पूछिए, यही इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सार है।
ईरान के जब्त हुए 100 अरब डॉलर वाला मामला सिर्फ पैसा अटकने की कहानी नहीं है। यह तेल की कमाई, पाबंदियों, बैंकिंग, महंगाई, करंसी, जंग के बाद की मरम्मत और सियासी इज्जत, सबका मिला-जुला झगड़ा है। छह अरब डॉलर की जो बात चल रही है, वह रकम में छोटी दिख सकती है लेकिन भरोसे और राहत में बड़ी है। तेहरान के लिए यह पैसा बंद तिजोरी नहीं, बंद सांस की तरह है। अगर ताला खुलता है तो राहत सिर्फ खाते में नहीं, पूरे माहौल में दिखेगी। अगर ताला जस का तस रहता है, तो फिर वही पुराना मंजर रहेगा, पैसा उसका, पकड़ किसी और की।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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