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गौरवगाथा: तुर्कों पर विजय के बाद महाराजा अर्णोराज ने शुद्धीकरण से कराया था अजमेर में 'आनासागर' का निर्माण

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 20 Apr 2026 05:32 PM IST
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सार

आनासागर का इतिहास केवल लोककथाओं तक सीमित नहीं है। इसके ठोस पुरातात्विक और साहित्यिक प्रमाण मौजूद हैं। भीलवाड़ा का बिजोलिया शिलालेख चौहान इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसमें अर्णोराज की तुर्कों पर विजय का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

know History of King Arnoraja and AnaSagar why it is so famous
आनासागर - फोटो : Vinod Pathak
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विस्तार

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि केवल किलों और महलों की कहानी नहीं कहती, अपितु यहां की झीलें और बावड़ियां भी रक्त, पसीने और स्वाभिमान के इतिहास से सिंचित हैं। आनासागर झील इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जो अजमेर के हृदय में आज भी अतीत और वर्तमान के बीच खड़ी एक साक्षी की तरह मौजूद है।

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शाम ढलते ही जब पर्यटक इसकी बारादरी पर बैठकर ठंडी हवाओं का आनंद लेते हैं तो शायद ही कोई यह सोचता हो कि यह झील केवल एक सुंदर पर्यटन स्थल नहीं है। इसका जन्म एक भीषण युद्ध, रक्तपात और उसके बाद भूमि के शुद्धीकरण की भावना से जुड़ा हुआ है। आज यह झील एक दोराहे पर खड़ी है, एक ओर इसका गौरवशाली अतीत है, जो महाराजा अर्णोराज की वीरता से जुड़ा है तो दूसरी ओर इसका त्रासद वर्तमान, जो अतिक्रमण और प्रदूषण से जूझ रहा है।
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महाराजा अर्णोराज का शासनकाल

12वीं शताब्दी का भारत एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। उत्तर-पश्चिम से तुर्क आक्रांताओं के हमले लगातार बढ़ रहे थे। गजनवी सत्ता के सुल्तान भारत के समृद्ध नगरों और धार्मिक स्थलों को निशाना बना रहे थे। इसी कालखंड में (लगभग 1133-1151 ईस्वी) अजमेर की गद्दी पर महाराजा अर्णोराज विराजमान थे, जिन्हें लोकभाषा में आनाजी कहा जाता है। वे केवल एक शासक नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी रणनीतिकार और अपनी संस्कृति के सजग रक्षक थे।

जब बहराम शाह की तुर्क सेना ने अजमेर और पुष्कर की ओर बढ़ना शुरू किया तो उनका उद्देश्य साफ था, चौहानों की शक्ति को तोड़ना और मध्य भारत का रास्ता खोलना। 1135 ईस्वी के आसपास यह सेना अजमेर की सीमाओं तक पहुंच गई। 

जहां आज आनासागर झील है, वहां उस समय एक विशाल रेतीला मैदान हुआ करता था। यहीं महाराजा अर्णोराज ने अपनी सेना के साथ तुर्कों का सामना किया। यह युद्ध इतना भीषण था कि अरावली की घाटियां तलवारों की टंकार से गूंज उठीं। चौहान योद्धाओं ने ‘करो या मरो’ के संकल्प के साथ ऐसा प्रहार किया कि आक्रांताओं की विशाल सेना बिखर गई।

भीषण गर्मी, पानी की कमी और लगातार हमलों ने तुर्क सेना को तोड़ दिया। रणभूमि लाशों से भर गई। कहा जाता है कि इतना रक्त बहा कि रेतीला मैदान लाल हो उठा। यह केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि अजमेर के अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई थी।

युद्ध खत्म हुआ, लेकिन पीछे एक भयावह दृश्य छोड़ गया। हजारों सैनिकों की लाशें सड़ने लगीं, जिनकी दुर्गंध से पूरा क्षेत्र प्रभावित हो गया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि महाराजा अर्णोराज के अनुसार आक्रांताओं के रक्त से भूमि अपवित्र हो गई थी। ऐसे में उन्होंने एक असाधारण निर्णय लिया, भूमि के शुद्धीकरण का।

विजय स्मारक और शुद्धता का प्रतीक- ‘आनासागर’

ऐतिहासिक ग्रंथ पृथ्वीराज विजय के अनुसार उन्होंने नाग पहाड़ से निकलने वाली चंद्रा नदी (आज की बांडी नदी) का मार्ग मोड़ दिया और पूरे रणक्षेत्र को जलमग्न कर दिया। इस जल ने न केवल गंदगी को बहा दिया, बल्कि वहां एक विशाल झील का निर्माण हो गया। यही झील आगे चलकर ‘आनासागर’ कहलाई, अर्णोराज (आनाजी) के नाम पर। यह केवल एक जलाशय नहीं था, बल्कि एक विजय स्मारक और शुद्धता का प्रतीक था। इतिहास में शायद ही कोई दूसरा उदाहरण मिलता है, जहां एक झील का निर्माण युद्ध के बाद भूमि की पवित्रता स्थापित करने के लिए किया गया हो।

आनासागर का इतिहास केवल लोककथाओं तक सीमित नहीं है। इसके ठोस पुरातात्विक और साहित्यिक प्रमाण मौजूद हैं। भीलवाड़ा का बिजोलिया शिलालेख चौहान इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसमें अर्णोराज की तुर्कों पर विजय का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित ‘अजमेर प्रशस्ति’ उन्हें ‘तुरुष्क-दमन’ की उपाधि देती है और बताती है कि उन्होंने किस प्रकार रक्तरंजित भूमि को शुद्ध किया। वहीं ‘पृथ्वीराज विजय’ में कवि जयानक ने इस पूरे प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया है। ये प्रमाण इस बात को स्थापित करते हैं कि आनासागर केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि इतिहास की जीवित धरोहर है।

लेकिन, जिस झील को स्वाभिमान और पवित्रता के प्रतीक के रूप में बनाया गया था, आज वही झील उपेक्षा का शिकार है। शहर के विस्तार और ‘विकास’ के नाम पर झील के प्राकृतिक जलमार्गों को बाधित कर दिया गया है। आसपास की पहाड़ियों से आने वाले नालों को बंद कर दिया गया, और उनकी जगह कंक्रीट की इमारतें खड़ी हो गईं। स्थिति इतनी गंभीर है कि शहर के कई गंदे नाले सीधे झील में गिरते हैं।

कभी आचमन योग्य रहा जल अब प्रदूषण से काला पड़ चुका है। प्लास्टिक, घरेलू कचरा और रासायनिक अपशिष्ट ने इसकी आत्मा को जैसे जकड़ लिया है। झील का एक बड़ा हिस्सा जलकुंभी से ढक जाता है, जिससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसका सीधा असर जलीय जीवों पर पड़ता है। मछलियों की सामूहिक मौतें अब आम होती जा रही हैं।

आनासागर केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि पक्षियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण ठिकाना रहा है। मध्य एशिया से आने वाले प्रवासी पक्षी यहां सर्दियों में बसेरा करते थे, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। प्रदूषित जल और लगातार बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण इन पक्षियों की संख्या तेजी से घट रही है। यह केवल जैव विविधता का नुकसान नहीं, बल्कि एक पूरे ईको-सिस्टम के बिगड़ने का संकेत है।

आज आनासागर को केवल सजाने-संवारने की नहीं, बल्कि बचाने की जरूरत है। ‘सौंदर्यीकरण’ से ज्यादा जरूरी है ‘पुनरुद्धार’। झील में गिरने वाले नालों को तुरंत रोका जाए। अतिक्रमण हटाकर प्राकृतिक जलमार्ग बहाल किए जाएं। जलकुंभी और प्रदूषण की नियमित सफाई हो। सबसे महत्वपूर्ण, इसे ‘नेशनल हेरिटेज’ का दर्जा दिया जाए। महाराजा अर्णोराज ने आनासागर के रूप में अजमेर को केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि एक विचार दिया था, शुद्धता, स्वाभिमान और पुनर्निर्माण का। आज वही झील हमारी उपेक्षा का शिकार है।

अब समय आ गया है कि हम विकास और विरासत के बीच संतुलन बनाएं। आनासागर को बचाना केवल एक झील को बचाना नहीं है, यह उस इतिहास को बचाना है, जो हमें अपनी पहचान, अपने संघर्ष और अपने स्वाभिमान की याद दिलाता है, क्योंकि अगर हम अपनी ऐसी धरोहरों को नहीं बचा पाए तो आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों में इतिहास देखेंगी, जिंदा नहीं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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