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चुनावी माहौल: पश्चिम बंगाल में पहले चरण से निकलेगी सत्ता की राह!

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Mon, 20 Apr 2026 07:16 PM IST
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सार

उत्तर बंगाल में यह चुनाव चाय बागान मजदूरों के अलावा कोच-राजबंशी और कामतापुरी तबके की पहचान की लड़ाई के तौर पर उभरा है। साथ ही इसके नतीजे दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में दशकों पुरानी गोरखा समस्या के राजनीतिक समाधान का रास्ता भी खोल सकते हैं।

west bengal elections 2026 first phase of election review
ममता बनर्जी, सीएम, पश्चिम बंगाल - फोटो : ANI
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विस्तार

पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 23 अप्रैल को राज्य के 16 जिलों की 152 सीटों पर मतदान होना है, लेकिन इनमें खासकर उत्तर बंगाल की 54 सीटें सबसे अहम मानी जा रही हैं। इनके नतीजों से ही तय होगा कि इस बार बंगाल में जीत का सेहरा किसके माथे पर बंधेगा।

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उत्तर बंगाल में यह चुनाव चाय बागान मजदूरों के अलावा कोच-राजबंशी और कामतापुरी तबके की पहचान की लड़ाई के तौर पर उभरा है। साथ ही इसके नतीजे दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में दशकों पुरानी गोरखा समस्या के राजनीतिक समाधान का रास्ता भी खोल सकते हैं।
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खास तौर पर भाजपा के लिए मतदान का पहला दौर बेहद अहम है। वर्ष 2021 में उसने जो 77 सीटें जीती थी उनमें से 59 उसे इसी इलाके में मिली थी। अब उसके सामने पहले दौर में उन सीटों पर कब्जा करने या उसे बढ़ाने की गंभीर चुनौती है।

उत्तर बंगाल की सीटों की महत्व

उत्तर बंगाल की 54 सीटों के नतीजे राज्य में सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाती रहे हैं। इस इलाके के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरदुआर जिलों में फैले आठ सौ से ज्यादा चाय बागानों के करीब 15 लाख मजदूर इलाके की कम से कम 35 सीटों पर निर्णायक हैं।यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस और भाजपा इन मजदूरों को जमीन का मालिकाना हक देने और न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने जैसे वादों के साथ लुभाने की कोशिश कर रही है।

राज्य का चाय उद्योग लंबे अरसे से बदहाली के दौर से गुजर रहा है। कई बागान बरसों से बंद पड़े हैं। अब बागान मजदूरों की नई पीढ़ी पारंपरिक पेशे को छोड़कर दूसरे शहरों में जाकर नए-नए पेशे आअपना रही है।

इलाके के चाय बागान मजदूर कुछ साल के अंतराल पर पाला बदलते रहे हैं। यह लोग रोजगार और आधारभूत सुविधाओं के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के समर्थन का फैसला करते रहे हैं।

ट्रेड यूनियन आंदोलन मजबूत होने की वजह से लंबे समय तक यह इलाके वाममोर्चा का गढ़ रहे थे। लेकिन 2011 के बाद यहां मजदूरों का रुझान बदला और वो तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में उतरने लगे। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में में तृणमूल कांग्रेस ने इलाके की 54 में से 28 सीटें जीती थी। वर्ष 2016 में भी इलाके में पार्टी का दबदबा कायम रहा।

लेकिन वर्ष 2019 में तस्वीर तेजी से बदली। उस साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इलाके की आठ में से सात लोकसभा सीटें जीत कर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य के बाकी हिस्सों में बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम रहने के बावजूद उसने 30 सीटें जीत कर अपना वर्चस्व कायम रखा था। उस साल तृणमूल को 24 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने लोकसभा की आठ में से छह सीटों पर कब्जा बरकरार रखा था। कूचबिहार सूट उसके हाथ से निकल गई थी।

इलाके के राजबंशी और कामतापुरी तबके कम से कम 10 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं। राजबंशी समुदाय की गिनती राज्य में अनुसूचित जनजाति की सबसे बड़ी आबादी के तौर पर होती है। कूचबिहार और आसपास के इलाके में बसे कामतापुरी समुदाय के लोग अपनी पहचान के लिए लंबे समय से अलग राज्य की मांग करते रहे हैं। और इस मांग में हिंसक आंदोलन भी होते रहे हैं।

अब भाजपा ने उनकी समस्या के राजनीतिक समाधान का भरोसा दिया है। पार्टी ने राजबंसी और कामतापुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की भी बात कही है। लेकिन ममता बनर्जी का आरोप है कि भाजपा उत्तर बंगाल को बंगाल से काटने की साजिश रच रही है।

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में भाजपा और तृणमूल अपने स्थानीय सहयोग पर निर्भर हैं। तृणमूल कांग्रेस ने पर्वतीय इलाके की तीनों सीटें अनित थापा के नेतृत्व वाली भारतीय जनमुक्ति मोर्चा के लिए छोड़ दी हैं। दूसरी ओर, भाजपा विमल गुरुंग के नेतृत्व वाली गोरखा मुक्ति मोर्चा के सहयोग से मैदान में है।

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र

कभी अलग गोरखालैंड की मांग में सुर्खियां बटोरने वाले दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अब इस आंदोलन की गूंज नहीं सुनाई देती। इस मांग में आंदोलन करने वाली स्थानीय पार्टियां भी कई गुटों में बंट चुकी हैं। इस बार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गोरखालैंड की समस्या के राजनीतिक समाधान का भरोसा दिया है। वर्ष 2021 में इलाके की तीनों सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवार ही विजयी रहे थे।

जहां तक मुद्दों का सवाल है एसआईआर के तहत मतदाता सूची से कटे नाम के अलावा चाय उद्योग की मुश्किलें, मजदूरों की बदहाली और न्यूनतम मजदूरी के अलावा उत्तर बंगाल का विकास, राजबंशी और कर्मचारी के अलावा गोरखा समुदाय की पहचान और उनकी मांगों के राजनीतिक समाधान का मुद्दा ही इस बार चुनाव में छाया हुआ है। अब इनमें परिसीमन का मुद्दा भी जुड़ गया है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी परिसीमन के प्रमुख बनाते हुए अपनी रैलियों में कह रही हैं कि लोकसभा में इससे संबंधित बिल पास होने पर बंगाल का विभाजन तय था और दार्जिलिंग समेत उत्तर बंगाल के कई जिलों का अस्तित्व खत्म हो सकता था।

उत्तर बंगाल में कम से कम 15 सीटें ऐसी हैं जहां हार-जीत का फैसला बहुत कम अंतर से होता रहा है। एसआईआर के बाद चुनावी समीकरण बिगड़ने और बागान मजदूरों का रुझान बदलने के ट्रैक रिकार्ड के कारण इस बार उन सीटों को लेकर सत्ता के दावेदारों की चिंता बढ़ गई है।एकाध फीसदी वोट इधर-उधर होने की स्थिति में भी इनके नतीजे बदल सकते हैं।

मुस्लिम वोट बैंक का असर

देश में मुस्लिम आबादी के लिहाज से सबसे बड़े जिले मुर्शिदाबाद और उससे सटे मालदा में भी पहले चरण में ही मतदान होना है। वर्ष 2021 में मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थी और दो भाजपा ने। लेकिन एसआईआर के कारण जिले में साढ़े चार लाख से ज्यादा वोटरों के नाम कटने से तृणमूल की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

मालदा जिले के 12 में से पिछली बार आठ सीटें तृणमूल को मिली थी और चार भाजपा को। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे इस जिले में पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका था। एसआईआर के कारण करीब 2।40 लाख वोटरों के नाम कटने की वजह से इस बार भाजपा को बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है और कांग्रेस को खाता खुलने की।

विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के परिवार के असर वाले पूर्वी मेदिनीपुर के साथ ही पश्चिम मेदिनीपुर में भी इसी दौर में मतदान होना है। इनमें वो नंदीग्राम सीट भी शामिल है जिस पर पिछली बार शुभेंदु ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हरा दिया था।

परिसीमन के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के आक्रामक प्रचार की काट के लिए अब भाजपा ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब वह तृणमूल कांग्रेस पर महिला विरोधी होने का आरोप लगा रही है। भाजपा के एक बड़े नेता कहते हैं कि महिला मुख्यमंत्री के राज में महिलाएं तो पहले से ही सुरक्षित नहीं थी। अब संसद में बिल का विरोध कर तृणमूल कांग्रेस ने साबित कर  दिया है कि उसकी कथनी और करनी में अंतर है।

ममता बनर्जी अपनी रैलियों में भाजपा पर बंगाल के विभाजन की साजिश रचने के आरोप लगा रही हैं। लेकिन भाजपा अपने प्रचार में इस बात पर जोर दे रही कि बदली हुई जमीनी परिस्थितियों में परिसीमन से कई पुराने मुद्दों का समाधान किया जा सकता था। यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि उत्तर बंगाल में गोरखा के अलावा कोच-राजबंशी और कामतापुरी समुदाय के लोग लंबे अरसे से पहचान की लड़ाई लड़ते रहे हैं।

अमित शाह समेत भाजपा के तमाम नेता उत्तर बंगाल की अपनी रैलियों में इस समस्या के राजनीतिक समाधान का भरोसा देते रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भौगोलिक और जागितगतच विविधता को ध्यान में रखते हुए मतदान का पहला चरण सत्ता के दोनों दावेदारों यानी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के लिए बेहद अहम है। खासकर भाजपा इस दौर में अपनी पिछली सीटों पर कब्जा कायम रखने के साथ ही उसे और बढ़ाने की कोशिश करेगी जबकि तृणमूल कांग्रेस उत्तर बंगाल में अपनी सीटों की संख्या बढ़ा कर इलाके में अपने कमजोर होती पकड़ को दोबारा मजबूत करने का प्रयास करेगी।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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