सब्सक्राइब करें

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   West Asia Conflict: What's going on inside Iran: War outside, conflict inside, and internal questions reveal

ईरान के अंदर क्या चल रहा है: बाहर जंग, अंदर खींचतान, भीतर से उठते सवाल क्या बताते हैं

Zahid Khan जाहिद खान
Updated Mon, 20 Apr 2026 02:24 PM IST
विज्ञापन
सार

जंग जब बाहर चल रही हो तो सबसे बड़ी जरूरत होती है अंदर की एकजुटता। दुश्मन सामने हो और घर के अंदर आवाजें अलग-अलग आने लगें तो मसला सिर्फ बयान का नहीं रहता, पूरी तस्वीर का हो जाता है। ईरान के बारे में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वहां सब कुछ एक ही लाइन पर चल रहा है या अंदर कहीं ऐसी खींचतान है जो आने वाले दिनों में बड़ा असर दिखा सकती है।

West Asia Conflict: What's going on inside Iran: War outside, conflict inside, and internal questions reveal
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार

ईरान इस वक्त बहुत नाजुक मोड़ पर खड़ा है। बाहर से दबाव है। जंग का माहौल है। समंदर के रास्तों पर तनाव है। अमेरिका अपनी चालें चल रहा है। इस्राइल अपना दबाव बनाए हुए है। ऐसे वक्त में किसी भी देश की असली ताकत सिर्फ मिसाइल या फौज नहीं होती, बल्कि ये होती है कि उसके अंदर फैसले किस तरह लिए जा रहे हैं। अगर ऊपर से एक बात कही जाए और अगले ही दिन उसी बात का रुख बदलता दिखे तो सवाल उठना लाजिमी है।
Trending Videos


असल मसला यहीं से शुरू होता है। एक तरफ ऐसा संदेश गया कि होर्मुज का रास्ता आसान किया जा रहा है, दूसरी तरफ थोड़ी ही देर बाद उसी मोर्चे पर सख्ती बढ़ती दिखी। अब आम इंसान चाहे किसी भी देश का हो, वो यही पूछेगा कि आखिर सच क्या है। क्या फैसला पहले सोच-समझकर लिया गया था या कोई बयान जल्दबाजी में दे दिया गया क्योंकि होर्मुज कोई मामूली जगह नहीं है। वह सिर्फ पानी का रास्ता नहीं, पूरी दुनिया की सांस की नली जैसा रास्ता है। वहां एक लाइन ऊपर नीचे होने से तेल, कारोबार, जहाज, दबाव, सब कुछ बदल जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यहीं से ईरान के अंदर की तस्वीर पर नजर जाती है। वहां सिर्फ एक दफ्तर से देश नहीं चलता। अलग-अलग ताकतें हैं, अलग-अलग जिम्मेदारी संभालने वाले लोग हैं। कोई मैदान देखता है, कोई कूटनीति देखता है, कोई सुरक्षा का बड़ा दायरा देखता है। जब सब एक दिशा में हों तो देश लोहे की तरह खड़ा रहता है लेकिन जब लहजे अलग दिखने लगें तो बाहर वाला दुश्मन तुरंत समझ जाता है कि यहां दरार खोजी जा सकती है।

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात ये नहीं कि किसने क्या कहा। असली बात ये है कि किसकी बात जमीन पर चली। अगर कोई बड़ा बयान आता है और उसके बाद एक्शन बिल्कुल उल्टा दिखाई देता है तो समझ लीजिए कि या तो अंदर सलाह एक नहीं थी या फिर आखिरी फैसला कहीं और से होना था। यही वह जगह है जहां से बाहर की दुनिया अपने मतलब की कहानियां बनाती है। अमेरिका जैसे देश ऐसे ही मौकों की तलाश में रहते हैं। जहां थोड़ा सा खालीपन दिखा, वहीं अपनी बात ठूंस दी, अपना नैरेटिव खड़ा कर दिया और दुनिया को ये जताने लगे कि सामने वाला बिखर रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप जैसे लोग तो वैसे भी ऐसे मौकों पर और शोर मचाते हैं। उनकी आदत है कि आधा सच पकड़कर पूरा ढोल पीट देते हैं। अगर सामने वाले के यहां एक पल की उलझन दिखी तो उसे हार साबित करने लगते हैं। यही वजह है कि ईरान के भीतर अगर कहीं छोटी सी भी गड़बड़ हुई तो बाहर उसे बहुत बड़ा करके पेश किया गया लेकिन दूसरी तरफ ईरान के असरदार लोगों की तरफ से जो सख्त रुख सामने आया, उसने ये भी दिखाया कि वहां अभी पूरी कमान किसी एक हाथ से फिसली नहीं है।

यहां एक और गहरी बात समझनी होगी। जंग के दिनों में फैसले सिर्फ किताब देखकर नहीं लिए जाते। उस वक्त हर बात में मैदान, सुरक्षा, सियासत, इज्जत और आने वाले दिनों की चाल सब शामिल होती है इसलिए कभी-कभी ऊपर से जो दिखता है, अंदर की कहानी उससे अलग होती है। हो सकता है कोई बयान दबाव कम करने के लिए आया हो। हो सकता है कोई लाइन बाहर को संदेश देने के लिए छोड़ी गई हो और ये भी हो सकता है कि अंदर सचमुच मतभेद हों, लेकिन जब एक के बाद एक संकेत उलझे हुए आने लगें, तब शक मजबूत होने लगता है कि मामला सिर्फ रणनीति का नहीं, अंदरूनी असहमति का भी है।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत हमेशा ये मानी गई कि वह दबाव में भी जल्दी टूटता नहीं। वहां फैसले भले देर से हों, लेकिन एक बार लाइन तय हो जाए तो फिर उस पर डटे रहने की आदत है। अगर अब वही देश ऐसा दिखने लगे कि अलग-अलग ताकतें अलग सुर में बोल रही हैं तो ये उसके लिए अच्छा इशारा नहीं क्योंकि जंग सिर्फ मैदान में नहीं जीती जाती, जंग दिमाग, मनोबल और संदेश में भी जीती जाती है। दुश्मन ये देखता है कि सामने वाला कितना थका, कितना टूटा, कितना बंटा और अगर उसे अंदर की खींचतान की बू आ जाए तो वह और दबाव बढ़ाता है।

इसका दूसरा पहलू भी है। कई बार बाहर वालों को जो बिखराव दिखता है, वह असल में किसी बड़े सिस्टम की अंदरूनी बहस भी होती है। फर्क बस इतना है कि ऐसी बहस अगर बाहर लीक हो जाए तो उसका नुकसान बहुत होता है क्योंकि फिर लोग फैसला नहीं, फूट देखने लगते हैं। आज ईरान के साथ यही हो रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि वहां असली लाइन कौन तय कर रहा है। कौन सख्त है, कौन नरम है, कौन बातचीत चाहता है, कौन मोर्चा कड़ा रखना चाहता है और जब ये सवाल आम हो जाएं तो समझिए कि दुश्मन अपना काम आधा कर चुका है।

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि जंग के बीच एक देश को अपने लोगों में यकीन पैदा करना होता है। लोगों को लगना चाहिए कि ऊपर बैठे लोग एक हैं, समझदार हैं और हर कदम सोचकर उठा रहे हैं। अगर आम लोग ही उलझन में पड़ जाएं कि अभी सच क्या है तो यह किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं। बाहर की नाकेबंदी, भीतर का दबाव, चारों तरफ दुष्प्रचार और ऊपर से अलग-अलग आवाजें, ये मिलकर किसी भी देश को मुश्किल में डाल सकती हैं।

आखिर में बात सीधी है। ईरान इस समय सिर्फ बाहर की जंग नहीं लड़ रहा, उसे अपने भीतर की तस्वीर भी संभालनी है। अगर अंदर की लाइन साफ रही तो बाहर का दबाव भी झेला जा सकता है लेकिन अगर अंदर ही बात उलझी रही तो दुश्मन को ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जंग के दिनों में बंदूक से पहले भरोसा बचाना पड़ता है और किसी भी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा वही होता है, जब बाहर का हमला कम और अंदर की उलझन ज्यादा दिखने लगे।

---------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed