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Jaspal Rana Death: भारतीय निशानेबाजी के अग्रदूत जसपाल राणा, एक स्वर्णिम गाथा

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Fri, 12 Jun 2026 12:34 PM IST
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सार

जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के चिल्ला गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ था। उनके पिता, नारायण सिंह राणा, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में एक अधिकारी थे।

Jaspal Rana a Pioneer of Indian Shooting A Golden Saga
जसपाल राणा - फोटो : ANI
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विस्तार

निशानेबाजी को भारत के सबसे सफल ओलंपिक खेलों में से एक बनाने की नींव जिन कुछ चुनिंदा खिलाड़ियों ने रखी, उनमें जसपाल राणा का नाम सबसे ऊपर आता है। 90 के दशक में, जब भारतीय खेल परिदृश्य पर मुख्य रूप से क्रिकेट का बोलबाला था, तब उत्तराखंड के इस युवा निशानेबाज ने अपनी सटीक एकाग्रता और अचूक निशानों से देश में एक नई खेल क्रांति का सूत्रपात किया। 



पिस्तौल स्पर्धाओं में उनके असाधारण प्रदर्शन ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिरंगे का मान बढ़ाया, बल्कि देश के युवाओं को यह विश्वास भी दिलाया कि भारत निशानेबाजी में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है।
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प्रारंभिक जीवन, पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दिन

जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के चिल्ला गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ था। उनके पिता, नारायण सिंह राणा, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में एक अधिकारी थे।
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पिता के सैन्य और सुरक्षा बलों से जुड़े होने के कारण घर में हमेशा अनुशासन और हथियारों के प्रति एक स्वाभाविक सम्मान का माहौल था। जसपाल का बचपन देहरादून की वादियों और बाद में दिल्ली में बीता, जहाँ उनके पिता ही उनके पहले कोच, मार्गदर्शक और सबसे बड़े आलोचक बने। उस दौर में भारत में निशानेबाजी एक बेहद महंगा और आम पहुंच से दूर का खेल माना जाता था।

आधुनिक शूटिंग रेंज की कमी, हथियारों के आयात में प्रशासनिक बाधाएं और कारतूसों की सीमित उपलब्धता जैसी कई गंभीर चुनौतियां थीं। इन सबके बावजूद, नारायण सिंह राणा ने जसपाल और उनके भाई-बहनों को इस खेल में आगे बढ़ाने के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी।

जसपाल ने मात्र 12 वर्ष की आयु में 1988 में अपनी पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेकर अपने सफर की शुरुआत कर दी थी।

खेल करियर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक सफलताएं

जसपाल मुख्य रूप से 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल, रैपिड फायर पिस्टल और 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धाओं के विशेषज्ञ रहे हैं। उनका पूरा करियर देश-विदेश में पदकों और रिकॉर्ड्स से भरा रहा है।

जसपाल राणा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहली बड़ी कामयाबी 1994 में इटली के मिलान में आयोजित विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में मिली। उन्होंने जूनियर वर्ग की 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में न केवल स्वर्ण पदक जीता, बल्कि 588/600 का स्कोर बनाकर तत्कालीन विश्व रिकॉर्ड की बराबरी भी की।

इस एक पदक ने भारतीय खेल जगत का ध्यान उनकी ओर खींचा। इसके बाद एशियाई खेलों में जसपाल राणा का प्रदर्शन हमेशा से भारतीय खेल इतिहास के सुनहरे अध्यायों में गिना गया। 1994 के हिरोशिमा एशियाई खेलों में मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने पुरुषों के 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल एकल में स्वर्ण पदक जीतकर धमाका कर दिया।

इसके बाद 1998 (बैंकॉक) और 2002 (बुसान) के खेलों में उन्होंने टीम और व्यक्तिगत स्पर्धाओं में रजत और कांस्य पदक जीते। 2006 का दोहा एशियाई खेल उनके करियर का सबसे यादगार और भावुक कर देने वाला टूर्नामेंट था।

खेल विश्लेषक मान चुके थे कि राणा का सर्वश्रेष्ठ समय बीत चुका है, लेकिन उन्होंने आलोचकों को करारा जवाब दिया। गंभीर शारीरिक दर्द और तेज बुखार के बावजूद उन्होंने 3 स्वर्ण पदक (25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल एकल, टीम और 25 मीटर स्टैंडर्ड पिस्टल) जीते। सेंटर फायर पिस्टल में उन्होंने 589/600 का स्कोर बनाकर एक बार फिर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की। इसके साथ ही, राष्ट्रमंडल खेलों में भी जसपाल राणा का एकछत्र राज रहा।

उन्होंने 1994 से 2006 के बीच इन खेलों में 9 स्वर्ण, 4 रजत और 2 कांस्य सहित कुल 15 पदक अपने नाम किए और समरेश जंग व गगन नारंग के साथ मिलकर भारतीय निशानेबाजी का दबदबा कायम किया।

प्रमुख खेल पुरस्कार और राष्ट्रीय सम्मान

जसपाल राणा की असाधारण खेल उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक और खेल पुरस्कारों से सम्मानित किया। हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्हें 1994 में प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया।

इसके ठीक अगले वर्ष, 1995 में बहुत कम उम्र में खेल क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया। बाद के वर्षों में, बतौर कोच देश के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों को तैयार करने के लिए उन्हें 2020 में खेल कोचिंग के सर्वोच्च सम्मान 'द्रोणाचार्य पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया।

बतौर कोच 'दूसरी पारी' और चैंपियन मेकर की भूमिका

सक्रिय निशानेबाजी से संन्यास लेने के बाद जसपाल राणा ने खेल को अलविदा नहीं कहा, बल्कि वे नई पीढ़ी को तराशने के काम में जुट गए। उन्होंने देहरादून में 'जसपाल राणा इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी' की स्थापना की, ताकि उत्तराखंड और देश के अन्य हिस्सों के ग्रामीण युवाओं को खेल और शिक्षा के बेहतर अवसर मिल सकें।

इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय जूनियर और सीनियर पिस्तौल टीम के मुख्य कोच के रूप में जिम्मेदारी संभाली। जसपाल राणा को एक बेहद सख्त, अनुशासित और तकनीकी रूप से निपुण कोच माना जाता है। उनकी कोचिंग की सबसे शानदार बानगी स्टार निशानेबाज मनु भाकर हैं, जिन्हें विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनाने और उनकी तकनीक को धार देने में जसपाल राणा का सबसे बड़ा योगदान रहा है।

मनु के अलावा सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला, चिंकी यादव और अभिषेक वर्मा जैसे शीर्ष निशानेबाजों ने जसपाल राणा के मार्गदर्शन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आईएसएसएफ (ISSF) विश्व कप और चैंपियनशिप में दर्जनों स्वर्ण पदक जीते।

प्रशासनिक सक्रियता और समृद्ध खेल विरासत

जसपाल राणा खेल के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी हमेशा मुखर रहे। वे कुछ समय के लिए सक्रिय राजनीति का हिस्सा भी रहे और उन्होंने उत्तराखंड में खेल नीतियों के सुधार, बुनियादी ढांचे के विकास और जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को खोजने के लिए लगातार पैरवी की।

उनका हमेशा से मानना रहा कि भारत के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, बस उन्हें सही समय पर सही संसाधन और मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

जसपाल राणा को भारतीय निशानेबाजी का 'अग्रदूत' कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा। आज जब भारतीय निशानेबाज ओलंपिक पोडियम पर खड़े होते हैं, तो उसके पीछे उस बुनियादी आत्मविश्वास की भूमिका होती है, जिसे जसपाल राणा ने 90 के दशक में अपनी पिस्तौल से उपजाया था।

उन्होंने दुनिया को दिखाया कि बिना किसी आलीशान व्यवस्था के भी, केवल कड़ी मेहनत, एकाग्रता और अटूट इच्छाशक्ति के बल पर विश्व रिकॉर्ड तोड़े जा सकते हैं। खेल के प्रति उनका समर्पण, एक खिलाड़ी के रूप में उनकी उपलब्धियां और एक कोच के रूप में उनकी दूरदर्शिता उन्हें भारतीय खेल इतिहास का एक अमर नायक बनाती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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