ममता बनर्जी की सियासी दिशा: टीएमसी का कांग्रेस में विलय या आत्म-तर्पण?
क्या तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय तय है? पश्चिम बंगाल की राजनीति, ममता बनर्जी की चुनौतियों और कांग्रेस से अलग होकर बनी पार्टियों के इतिहास का विश्लेषण करता अजय बोकिल का विशेष लेख।
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विस्तार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी मात खाने और उसके बाद तार-तार हो रही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी के अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में संभावित विलय की चर्चाएं जोरों पर हैं। यह विलय कैसे, कब और किन शर्तों पर होगा, होगा भी या नहीं, यह टीएमसी का आईएनसी में विलीनीकरण होगा या फिर आत्म-तर्पण होगा, इन सब सवालों के जवाब देर-सवेर मिलेंगे। लेकिन भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से लोगों का टूटकर नई पार्टी बनाने और कुछ समय तक जनसमर्थन के सागर में हाथ-पैर मारने की नाकाम अथवा आंशिक रूप से सफल कोशिशों के बाद वापस अपनी मूलगंगा में तिरोहित हो जाने का इतिहास बहुत पुराना है।
1885 में अपनी स्थापना से लेकर 2026 तक 63 बार कांग्रेस से अलग होकर इसके नेताओं ने अपनी नई पार्टियां बनाई हैं। इनमें से केवल 8 पार्टियां अपने दम पर अथवा किसी गठबंधन के साथ सत्ता के सिंहासन तक पहुंचीं और कुल 13 पार्टियां किसी तरह अपना वजूद बचाए हुए हैं। बाकी काल के गाल में समा गईं। इनमें से भी अलग बनी केरल कांग्रेस के कई टुकड़े हो चुके हैं, जबकि कुछ ने भाजपा अथवा वाम दलों का दामन थाम लिया है।
कांग्रेस से टूटकर बनने वाली पार्टियों का ऐतिहासिक पैटर्न
ऐसे में पश्चिम बंगाल में लगातार 15 साल तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलीन होने पर क्या हश्र होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इस विलीनीकरण कथा का अंत जानते हुए भी यदि ममता बनर्जी कोलकाता में अपनी पार्टी को बिखरने से बचाने के उपाय करने की जगह दिल्ली में रुककर अपने पुराने घर कांग्रेस में वापसी की गुहार लगा रही हैं, तो इसी से समझा जा सकता है कि कभी दबंग नेत्री कहलाने वाली और कांग्रेस को ठेंगे पर रखने वाली ममता बनर्जी की मानसिक दशा क्या है। घर में लगी आग को बुझाने के बजाय वे दिल्ली में भाजपा का घर राख करने का शेखचिल्ली सपना देख रही हैं।
महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय राजनीति का उदय
दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रीय मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस से अलग होकर नया दल बनाने और नाकाम होने के बाद घर वापसी की मजबूरी के पीछे भी नेताओं की अपना वजूद बचाने की जद्दोजहद ही मुख्य कारण रही है। ममता बनर्जी को ही लें तो 1998 में उन्होंने अपना राजनीतिक वजूद चमकाने के लिए कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई और सियासी दृष्टि से वे सफल भी रहीं। लेकिन हाल के चुनावों में करारी पराजय के बाद वे खुद इतनी असहाय महसूस करने लगीं कि उन्हें लगने लगा कि कांग्रेस की छत ही उनकी राजनीतिक लाज बचा पाएगी। यह हताशा-जनित प्रतिशोध का विरल उदाहरण है।
क्षेत्रीय दलों की बनावट और सत्ता का मनोविज्ञान
यूं भी कांग्रेस से अलग होने के पीछे नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही प्रेरक तत्व रही है। जब इन नेताओं को लगने लगता है कि वे अजेय प्रादेशिक क्षत्रप हैं और राष्ट्रीय पार्टी का छत्र छोड़कर खुद अपनी सल्तनत कायम कर सकते हैं, तो वे अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं में क्षेत्रीय अस्मिता, स्थानीय मुद्दों और जनाकांक्षाओं का तड़का लगाकर अपनी सूबाई फौज तैयार करते हैं, जो मुख्यतः व्यक्ति-निष्ठा और सत्ता-स्वार्थ में पगी होती है। इनका अपना कोई अलग वैचारिक आधार या आग्रह नहीं होता। ऐसी पार्टियों में व्यक्ति का चमत्कार ही मुख्य कारक होता है। जैसे ही संबंधित नेता का जादू खत्म होता है, पार्टी धड़ाम से जमीन पर आ जाती है। सत्ता की सलाइन हटते ही पार्टी में बिखराव शुरू हो जाता है। ऐसे में ममता जैसे नेताओं को लगने लगता है कि अब उसी उद्गम-स्थल पर फिर से राजनीतिक आचमन करना चाहिए, जहां से यह सफर शुरू हुआ था।
विलय की संभावनाएं और सीमाएं
राजनीतिक हलकों में चर्चा यह भी है कि बंगाल चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस की ओर से दबी जुबान में विलीनीकरण का प्रस्ताव मूल पार्टी से अलग हुई वाईएसआर कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) को भी दिया गया है। लेकिन इनके वापस कांग्रेस में लौटने की संभावना कम ही है। इसका मूल कारण भी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ही है। अलग पार्टी बनाने और उसे सत्ता में विराजित करने के बाद कांग्रेस से विलगित नेता खुद को निरंकुश सूबेदार मानने लगते हैं, क्योंकि सत्ता का असली स्वाद भी इसी निरंकुशता में है। ऐसे में किसी ‘बादशाह’ के अधीन काम करना उनकी फितरत में नहीं बैठता।
क्षेत्रीय क्षत्रपों की सत्ता-राजनीति
शरद पवार व्हीलचेयर पर चलने के बाद भी यह माहौल बनाए रखते हैं कि उनमें अभी भी खम ठोंकने का दम है। लिहाजा वे कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस को खुश करने वाले बयान देते रहते हैं। राजनीति में सत्ता ही अंतिम लक्ष्य होती है। सत्ताविहीन सियासी दल विपक्ष की भूमिका निभाते जरूर हैं, लेकिन कई बार उसका महत्व राजनीतिक मनोरंजन से ज्यादा नहीं होता। जहां तक विभाजन की बात है, तो खुद कांग्रेस भी दो बार विभाजित हो चुकी है। और तो और, कांग्रेस के प्रेरणा-स्रोत महात्मा गांधी ने भी 1934 में पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था।
कांग्रेस से निकली पार्टियों का वर्तमान परिदृश्य
बहरहाल, कांग्रेस से अलग हुई 13 पार्टियों में से कुछ पूरी तरह सक्रिय हैं तो कुछ बराए नाम हैं। मसलन, हिंदू महासभा (जिसे कांग्रेस से अलग होकर पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1915 में बनाया था), ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा कांग्रेस से अलग होकर बनाई गई यह पार्टी लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में वाम दलों के साथ सत्ता में भागीदार रही। संभव है कि बंगाल में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के चलते वह भाजपा के साथ आ जाए, क्योंकि भाजपा भी नेताजी को अपना नेता मानती है)।
इनके अलावा अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार), केरल कांग्रेस, तमिल मनीला कांग्रेस, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, विदर्भ जनता कांग्रेस, नागालैंड पीपुल्स फ्रंट (जो नागालैंड में एनडीए के साथ सत्ता में है), अखिल भारतीय एन.आर. कांग्रेस (जो पुडुचेरी में एनडीए के साथ सत्ता में है), छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस तथा लोकतांत्रिक प्रगतिशील आजाद पार्टी। यह कांग्रेस से अलग हुई नवीनतम पार्टी है, जिसे पूर्व कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने 2022 में बनाया था।
संभावित विलय से कांग्रेस की ताकत में बदलाव
विगत 131 वर्षों में कांग्रेस से अलग होकर बनी बाकी 54 पार्टियों का आज कोई नामोनिशान नहीं है। शेष 13 में से भी 3 पर कांग्रेस की नजर इसलिए है, क्योंकि इनके पास कैडर और जनप्रतिनिधि हैं, जो संसद और विधानसभाओं में कांग्रेस की ताकत बढ़ा सकते हैं। मसलन, आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस के पास 4 लोकसभा, 4 राज्यसभा सांसद और 11 विधायक हैं, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार) के पास क्रमशः 8 लोकसभा, 1 राज्यसभा सदस्य तथा 3 विधायक हैं। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस में विभाजन के बाद भी ममता बनर्जी के पास (यदि और टूट-फूट नहीं हुई तो) 9 लोकसभा, 9 राज्यसभा सदस्य तथा 22 विधायक शेष हैं।
ये सब यदि कांग्रेस में विलय हो जाएं, तो कांग्रेस की ताकत लोकसभा में 21 तथा राज्यसभा में 13 सांसदों और विधानसभाओं में कुल 29 विधायकों के रूप में बढ़ सकती है। इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और आगामी चुनाव वह अधिक ताकत से लड़ सकती है तथा सीटों की सौदेबाजी भी अधिक दबंगई से कर सकती है। हालांकि जनप्रतिनिधियों के विलय की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है। लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती नेताओं और पार्टी कैडर के भावनात्मक समन्वय तथा आपसी विश्वास की है, क्योंकि कुछ राज्यों में कांग्रेस से टूटी पार्टियां उसी के विरोध में राजनीति कर रही हैं।
वंशवाद बनाम वंशवाद: राजनीतिक भविष्य की टकराहट
इससे भी बड़ा सवाल यह है कि संभावित नई और एकीकृत कांग्रेस का शीर्ष नेता कौन होगा? आलाकमान कौन होगा? क्योंकि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी अपने चरित्र में व्यक्तिवाद, वंशवाद और विचारधारा का रामबाण चूर्ण है। चाहे-अनचाहे और तमाम खामियों तथा आलोचनाओं के बावजूद नेहरू-गांधी परिवार ही कांग्रेस की संजीवनी बूटी है। जबकि अलग हुए क्षत्रपों ने उत्तर-मुगल काल की तर्ज पर अपनी-अपनी सल्तनतें कायम कर (पार्टी में विरोध के बावजूद) अपने राजवंश तैयार कर लिए हैं।
जैसे ममता बनर्जी के संभावित वारिस अभिषेक बनर्जी हैं, शरद पवार की वारिस सुप्रिया सुले हैं, जबकि वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के बच्चे अभी पढ़ रहे हैं। लेकिन वहां भी जल्द ही किसी परिजन की ताजपोशी हो सकती है। इन नेताओं की पहली चिंता भी अपने वंशजों की ताजपोशी है।
ऐसे में कांग्रेस में केंद्रीय वंशवाद और क्षेत्रीय वंशवाद में कितना तालमेल रह पाएगा, व्यक्तिगत आकांक्षाओं और वर्चस्व की टकराहट क्या मोड़ लेगी, कौन कितना झुकेगा, क्या ममता भाजपा को हराने के लिए हर मुमकिन समझौता करेंगी, या फिर कांग्रेस एक नए संघीय दल के रूप में उभरेगी, यह देखने की बात है।
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