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शूटर जसपाल राणा का यूं चले जाना: आखिर क्यों कमजोर पड़ रहे युवाओं के दिल?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Fri, 12 Jun 2026 12:17 PM IST
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सार

राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता तथा ओलंपियन मनु भाकर के द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच जसपाल राणा का अचानक जाना दुखद है। जसपाल राणा ने अपना पूरा जीवन देश के लिए पदक जीतने और नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने में समर्पित कर दिया। उनकी उपलब्धियां हमेशा भारतीय खेल इतिहास का हिस्सा रहेंगी।

Renowned Indian shooting coach Jaspal Rana passed away his journey
जसपाल राणा का निधन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

कभी-कभी एक खबर केवल एक व्यक्ति के निधन की सूचना नहीं होती, अपितु पूरे समाज के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है। 49 वर्ष की उम्र में भारतीय शूटिंग के दिग्गज, एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता तथा ओलंपियन मनु भाकर के द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच जसपाल राणा का अचानक जाना भी ऐसा ही एक क्षण है।



खेल के मैदान में सटीक निशाने लगाने वाला यह खिलाड़ी लाखों युवाओं के लिए अनुशासन, मेहनत और फिटनेस का प्रतीक था। इसलिए उनका असमय निधन सिर्फ खेल जगत की क्षति नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास को भी झकझोरता है कि जो व्यक्ति फिट दिखाई देता है। उसे दिल की बीमारी नहीं हो सकती।
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कम उम्र में बढ़ती हृदय संबंधी समस्याएं

सबसे बड़ा सवाल यही है, आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि 35, 40 और 50 वर्ष से कम उम्र के लोगों में भी हृदय संबंधी समस्याओं की चर्चा बढ़ने लगी है? क्या इसका कारण केवल तनाव है? क्या हमारी बदलती जीवनशैली जिम्मेदार है? क्या आनुवंशिक कारण भी इसके पीछे भूमिका निभाते हैं? या फिर कई छोटे-छोटे कारण मिलकर एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं?
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चिकित्सा विज्ञान हमें बताता है कि दिल की बीमारियां किसी एक कारण से पैदा नहीं होतीं। इसके पीछे कई कारक काम करते हैं। लगातार मानसिक तनाव, अनियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद की कमी, धूम्रपान, असंतुलित भोजन, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, बढ़ता वजन और पारिवारिक इतिहास जैसे कई कारण हृदय रोग के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

आज की युवा पीढ़ी एक ऐसी दौड़ में शामिल है जहां सफलता पाने की जल्दी है, लेकिन शरीर की आवाज सुनने का समय कम होता जा रहा है। देर रात तक काम करना, मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन के सामने घंटों बैठे रहना, समय पर भोजन न करना और तनाव को सामान्य मान लेना हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन गया है।

विडंबना यह है कि आज बहुत से लोग शरीर को सुंदर दिखाने पर अधिक ध्यान देते हैं, लेकिन अंदरूनी स्वास्थ्य की जांच को नजरअंदाज कर देते हैं। सिक्स पैक, मजबूत शरीर और अच्छी फिटनेस हमेशा यह गारंटी नहीं होते कि हृदय पूरी तरह स्वस्थ है। कई बार शरीर के भीतर बढ़ रही समस्या लंबे समय तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं देती। इसी कारण नियमित स्वास्थ्य जांच का महत्व बढ़ जाता है।

35 वर्ष की उम्र के बाद विशेष रूप से उन लोगों को, जिनके परिवार में हृदय रोग का इतिहास रहा है या जिनकी जीवनशैली जोखिमपूर्ण है, समय-समय पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच करानी चाहिए।

इस पूरे विषय का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हम अक्सर शरीर की छोटी-छोटी चेतावनियों को नजरअंदाज कर देते हैं। सीने में दबाव या भारीपन, अचानक सांस फूलना, बिना कारण अत्यधिक पसीना आना, कमजोरी महसूस होना या दर्द का हाथ, पीठ या जबड़े की ओर जाना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन पर तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। हर सीने का दर्द हार्ट अटैक नहीं होता और हर हार्ट अटैक एक जैसा महसूस नहीं होता, इसलिए स्वयं अनुमान लगाकर घर पर बैठना जोखिम भरा हो सकता है।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है, क्या हमारा स्वास्थ्य तंत्र केवल बीमारी आने के बाद इलाज पर केंद्रित है या हम बचाव की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? स्कूलों में बच्चों को गणित और विज्ञान सिखाया जाता है, लेकिन क्या उन्हें हृदय स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन और जीवनशैली से जुड़ी बुनियादी बातें सिखाई जाती हैं? बड़े कार्यालयों में कर्मचारियों से लंबे समय तक काम लेने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन क्या वहां मानसिक स्वास्थ्य और नियमित स्वास्थ्य जांच को पर्याप्त महत्व दिया जाता है?

दिल की सुरक्षा की भी योजना जरूरी

आज जरूरत केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने की नहीं है, बल्कि समाज की सोच बदलने की है। जिस तरह हम करियर की योजना बनाते हैं, आर्थिक सुरक्षा की चिंता करते हैं, उसी तरह हमें अपने दिल की सुरक्षा की भी योजना बनानी होगी। सार्वजनिक स्थानों, खेल परिसरों, हवाई अड्डों और बड़े संस्थानों में आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।

सीपीआर जैसी जीवन रक्षक तकनीकों की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचनी चाहिए, क्योंकि कई बार शुरुआती कुछ मिनट किसी व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के बीच अंतर पैदा कर सकते हैं।

जसपाल राणा ने अपना पूरा जीवन देश के लिए पदक जीतने और नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने में समर्पित कर दिया। उनकी उपलब्धियां हमेशा भारतीय खेल इतिहास का हिस्सा रहेंगी। लेकिन उनका जाना हमारे सामने एक कड़वा सवाल छोड़ गया है, क्या हम सफलता की दौड़ में अपने शरीर की चेतावनियों को सुनना भूलते जा रहे हैं?

आधुनिक जीवन में उपलब्धियां जरूरी हैं, सपने जरूरी हैं, मेहनत जरूरी है, लेकिन इन सबसे पहले जरूरी है वह दिल, जो इन सपनों को पूरा करने की ताकत देता है। शायद जसपाल राणा की विदाई हमें यही संदेश देती है कि जीवन की दौड़ में थोड़ा रुककर अपने शरीर की आवाज भी सुनिए। क्योंकि समय पर लिया गया एक छोटा-सा निर्णय कई बार पूरे जीवन को बचा सकता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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