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दूसरों की खुशी में खुश रहना सीखें: छोटे-छोटे काम और मुस्कान से जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएं
जैंसी डन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Shivam Garg
Updated Sun, 15 Mar 2026 07:13 AM IST
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सार
आपको अपना काम और व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि जो भी आपको देखे, वह खुद में बदलाव के लिए प्रेरित हो।
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : adobe stock
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विस्तार
हर रोज जब मैं अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाती हूं, तो रास्ते में एक मुस्कुराती हुई ट्रैफिक क्रॉसिंग गार्ड दिखाई देती है, जो वहां से गुजरने वाले हर वाहन चालक का बड़े उत्साह और खुशी के साथ हाथ हिलाकर अभिवादन करती है। शुरुआत में उसकी यह आदत मुझे थोड़ी अजीब लगी। पर धीरे-धीरे मेरा मन बदला। अब मैं भी पूरे उत्साह से हाथ हिलाकर उसे जवाब देती हूं।
उसकी यह लगातार बनी रहने वाली खुशमिजाजी मेरे लिए एक तरह की आदत बन गई है, खासकर जब मन थोड़ा उदास होता है। मेरे मन में जिज्ञासा भी जगी कि आखिर ऐसे लोग, जो दूसरों के मन को हल्का और खुश कर देते हैं, इतनी ऊर्जा कहां से लाते हैं? और वे ऐसा क्यों करते हैं? इन्हीं सवालों के जवाब खोजने के लिए मैंने ऐसे लोगों की तलाश शुरू की।
कुछ हफ्तों की खोजबीन के बाद मुझे तीन ऐसे बेहद दिलचस्प और खुशमिजाज लोग मिले, जो रोज अपने छोटे-छोटे कामों और मुस्कान से आसपास के माहौल में खुशी घोल देते हैं। पहले व्यक्ति थे बस ड्राइवर क्विंटन मिलर। वह प्रत्येक दिन मुस्कुराते हुए हर यात्री को ‘गुड मॉर्निंग’ कहकर स्वागत करते और बस से उतरने समय उन्हें स्नेहपूर्वक कहते कि आपका दिन शानदार रहे। मिलर जटिल व तनाव भरे काम को भी बेहद संतुलन के साथ संभालते हैं। तो आखिर वह यह सब कैसे कर पाते हैं? इस सवाल पर वह अपना फलसफा स्पष्ट करते हैं, ‘नौकरी का तनाव आपको बदल दे, इसके बजाय आपको अपना काम और व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि जो भी आपको देखे, वह खुद में बदलाव के लिए प्रेरित हो।’
कई शोध भी बताते हैं कि दूसरों के प्रति सहानुभूति हमें एक-दूसरे के करीब लाती है और जीवन में संतोष व मानसिक सुख के स्तर को बढ़ाती है। ऐसे ही एक और शख्स हैं ब्रायन बर्ट्रेंड। वह अक्सर अपने अंदाज और मजाकिया बातों से अपने दफ्तर में मुस्कान घोल देते हैं। कई शोध बताते हैं कि हंसी तनाव को कम करती है और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत बनाती है, भले ही वे एक-दूसरे को पहले से न जानते हों। इसी तरह का एक और प्रेरक उदाहरण रैचल ब्रूक्स का है। वह अपनी अदालत में बाकी ज्यूरी सदस्यों का स्वागत बेहद उत्साहपूर्ण ढंग से करती हैं। उनका उद्देश्य लोगों को सहज और सकारात्मक माहौल में लाना होता है।
ब्रूक्स के अनुसार, सकारात्मक सोच का सबसे महत्वपूर्ण आधार है उदार मन। हालांकि, वह यह भी स्वीकार करती हैं कि हर किसी को खुश रखना संभव नहीं है। फिर भी वह उस मानसिक प्रवृत्ति की शिकार नहीं बनतीं, जिसे मनोविज्ञान में निगेटिविटी बायस कहा जाता है, यानी वह आदत, जिसमें दिमाग सकारात्मक घटनाओं की तुलना में नकारात्मक अनुभवों पर अधिक ध्यान देता है।
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उसकी यह लगातार बनी रहने वाली खुशमिजाजी मेरे लिए एक तरह की आदत बन गई है, खासकर जब मन थोड़ा उदास होता है। मेरे मन में जिज्ञासा भी जगी कि आखिर ऐसे लोग, जो दूसरों के मन को हल्का और खुश कर देते हैं, इतनी ऊर्जा कहां से लाते हैं? और वे ऐसा क्यों करते हैं? इन्हीं सवालों के जवाब खोजने के लिए मैंने ऐसे लोगों की तलाश शुरू की।
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कुछ हफ्तों की खोजबीन के बाद मुझे तीन ऐसे बेहद दिलचस्प और खुशमिजाज लोग मिले, जो रोज अपने छोटे-छोटे कामों और मुस्कान से आसपास के माहौल में खुशी घोल देते हैं। पहले व्यक्ति थे बस ड्राइवर क्विंटन मिलर। वह प्रत्येक दिन मुस्कुराते हुए हर यात्री को ‘गुड मॉर्निंग’ कहकर स्वागत करते और बस से उतरने समय उन्हें स्नेहपूर्वक कहते कि आपका दिन शानदार रहे। मिलर जटिल व तनाव भरे काम को भी बेहद संतुलन के साथ संभालते हैं। तो आखिर वह यह सब कैसे कर पाते हैं? इस सवाल पर वह अपना फलसफा स्पष्ट करते हैं, ‘नौकरी का तनाव आपको बदल दे, इसके बजाय आपको अपना काम और व्यवहार ऐसा रखना चाहिए कि जो भी आपको देखे, वह खुद में बदलाव के लिए प्रेरित हो।’
कई शोध भी बताते हैं कि दूसरों के प्रति सहानुभूति हमें एक-दूसरे के करीब लाती है और जीवन में संतोष व मानसिक सुख के स्तर को बढ़ाती है। ऐसे ही एक और शख्स हैं ब्रायन बर्ट्रेंड। वह अक्सर अपने अंदाज और मजाकिया बातों से अपने दफ्तर में मुस्कान घोल देते हैं। कई शोध बताते हैं कि हंसी तनाव को कम करती है और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत बनाती है, भले ही वे एक-दूसरे को पहले से न जानते हों। इसी तरह का एक और प्रेरक उदाहरण रैचल ब्रूक्स का है। वह अपनी अदालत में बाकी ज्यूरी सदस्यों का स्वागत बेहद उत्साहपूर्ण ढंग से करती हैं। उनका उद्देश्य लोगों को सहज और सकारात्मक माहौल में लाना होता है।
ब्रूक्स के अनुसार, सकारात्मक सोच का सबसे महत्वपूर्ण आधार है उदार मन। हालांकि, वह यह भी स्वीकार करती हैं कि हर किसी को खुश रखना संभव नहीं है। फिर भी वह उस मानसिक प्रवृत्ति की शिकार नहीं बनतीं, जिसे मनोविज्ञान में निगेटिविटी बायस कहा जाता है, यानी वह आदत, जिसमें दिमाग सकारात्मक घटनाओं की तुलना में नकारात्मक अनुभवों पर अधिक ध्यान देता है।