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मुड़-मुड़ के देख: समझ की परिपक्व ऋतु; क्योंकि जीवन एक बहती हुई नदी की तरह है
Fri, 10 Jul 2026 08:37 AM IST
Pavan
जूडिथ विओर्स्ट
जूडिथ विओर्स्ट
Published by: Pavan
Updated Fri, 10 Jul 2026 08:37 AM IST
सार
जीवन एक बहती हुई नदी की तरह है, जो हर उम्र के तट से गुजरती हुई अंत तक कुछ न कुछ नया सीखती और सिखाती रहती है। जैसे-जैसे उम्र व अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे मनुष्य शब्दों से नहीं, जीवन से पढ़ना सीखता जाता है।
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समझ की परिपक्व ऋतु
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
समय का सबसे बड़ा उपहार यह है कि वह हमें उन लोगों को नए सिरे से देखने की दृष्टि देता है, जिन्हें कभी हमने साधारण समझ लिया था। बचपन में मैं और मेरी बहन अपने पिता को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते थे, जिनके जीवन में कोई रोमांच नहीं था। वह कभी काम पर जाना नहीं छोड़ते थे। बचपन में हमें वही लोग आकर्षित करते हैं, जो हंसते हैं या कहानियां सुनाते हैं।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति चुपचाप अपना कर्तव्य निभाता रहता है, वह हमें नीरस प्रतीत होता है। हम उसके मौन को भावनाओं की कमी समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में वही मौन त्याग, चिंता और नि:स्वार्थ प्रेम की सबसे गहरी भाषा होता है।
समय बीतने के साथ मुझे समझ आया कि पिता को मैंने केवल नौकरी करने वाला, कम बोलने वाला और साधारण व्यक्ति माना था, जबकि वह प्रतिदिन एक ऐसे अदृश्य संघर्ष से गुजर रहे थे, जिसका हमें कभी आभास ही नहीं हुआ। उनका हर निर्णय एक उद्देश्य से जुड़ा था कि परिवार सुरक्षित रहे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल आजीविका कमाना नहीं थी, बल्कि अपने प्रियजनों को हर संकट से बचाए रखना थी। धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ में आया कि मेरी दृष्टि एकांगी थी। मैं युवावस्था को ही जीवन की सबसे ऊर्जावान, सुंदर और मूल्यवान अवस्था मानती थी। जो व्यक्ति शांत जीवन जीता था, उसे मैं दुखों से भरा हुआ समझ लेती थी। परंतु, वृद्धावस्था ने सिखाया कि जीवन एक बहती हुई नदी की तरह है, जो हर उम्र के तट से गुजरती हुई अंत तक कुछ न कुछ नया सीखती और सिखाती रहती है।
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जैसे-जैसे उम्र व अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे मनुष्य शब्दों से नहीं, जीवन से पढ़ना सीखता जाता है। तब समझ आता है कि किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी कहानी उसके कहे हुए वाक्यों में नहीं, बल्कि उसके निभाए हुए दायित्वों में छिपी होती है। शायद यही वृद्धावस्था का सबसे बड़ा सौंदर्य है। यह हमें नई उपलब्धियां नहीं देती, बल्कि पुरानी स्मृतियों को नया अर्थ देती है। हर उम्र अपने भीतर एक अलग सत्य लिए होती है। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब दुनिया पहले से कहीं अधिक मानवीय, करुणामयी और सुंदर दिखाई देने लगती है।
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इसके विपरीत, जो व्यक्ति चुपचाप अपना कर्तव्य निभाता रहता है, वह हमें नीरस प्रतीत होता है। हम उसके मौन को भावनाओं की कमी समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में वही मौन त्याग, चिंता और नि:स्वार्थ प्रेम की सबसे गहरी भाषा होता है।
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समय बीतने के साथ मुझे समझ आया कि पिता को मैंने केवल नौकरी करने वाला, कम बोलने वाला और साधारण व्यक्ति माना था, जबकि वह प्रतिदिन एक ऐसे अदृश्य संघर्ष से गुजर रहे थे, जिसका हमें कभी आभास ही नहीं हुआ। उनका हर निर्णय एक उद्देश्य से जुड़ा था कि परिवार सुरक्षित रहे। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि केवल आजीविका कमाना नहीं थी, बल्कि अपने प्रियजनों को हर संकट से बचाए रखना थी। धीरे-धीरे मुझे यह भी समझ में आया कि मेरी दृष्टि एकांगी थी। मैं युवावस्था को ही जीवन की सबसे ऊर्जावान, सुंदर और मूल्यवान अवस्था मानती थी। जो व्यक्ति शांत जीवन जीता था, उसे मैं दुखों से भरा हुआ समझ लेती थी। परंतु, वृद्धावस्था ने सिखाया कि जीवन एक बहती हुई नदी की तरह है, जो हर उम्र के तट से गुजरती हुई अंत तक कुछ न कुछ नया सीखती और सिखाती रहती है।
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जैसे-जैसे उम्र व अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे मनुष्य शब्दों से नहीं, जीवन से पढ़ना सीखता जाता है। तब समझ आता है कि किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी कहानी उसके कहे हुए वाक्यों में नहीं, बल्कि उसके निभाए हुए दायित्वों में छिपी होती है। शायद यही वृद्धावस्था का सबसे बड़ा सौंदर्य है। यह हमें नई उपलब्धियां नहीं देती, बल्कि पुरानी स्मृतियों को नया अर्थ देती है। हर उम्र अपने भीतर एक अलग सत्य लिए होती है। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब दुनिया पहले से कहीं अधिक मानवीय, करुणामयी और सुंदर दिखाई देने लगती है।