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जब बेटी बन जाए मां की हत्यारी: आखिर हम किस समाज की ओर बढ़ रहे हैं?

Thu, 09 Jul 2026 03:21 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Thu, 09 Jul 2026 03:21 PM IST
सार

जब किसी व्यक्ति के भीतर से सहानुभूति, कृतज्ञता और पारिवारिक संवेदनाएं समाप्त होने लगती हैं, तब वह अपने सबसे निकट के रिश्ते को भी केवल एक बाधा के रूप में देखने लगता है।

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When a daughter becomes her mother killer: What kind of society are we heading towards
मां की हत्या। (साकेतिक तस्वीर)। - फोटो : Amar Ujala AI

विस्तार

जयपुर में सामने आया यह मामला केवल एक हत्या का नहीं, बल्कि रिश्तों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना के पतन का आईना है। अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी पाने, मकान पर कब्जा करने और जमीन के लालच में एक बेटी ने अपने ताऊ और चचेरे भाई के साथ मिलकर अपनी मां की हत्या की ऐसी साजिश रची, जिसे पहली नजर में हर कोई एक सामान्य सड़क दुर्घटना मान बैठा, लेकिन पुलिस की सतर्कता और जांच की बारीकी ने जब इस तथाकथित 'परफेक्ट मर्डर' की परतें खोलीं तो जो सच सामने आया, उसने पूरे समाज को झकझोर दिया।

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सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आज सरकारी नौकरी, संपत्ति और भौतिक सुख-सुविधाएं इतनी बड़ी हो गई हैं कि उनके सामने मां-बेटी जैसा सबसे पवित्र रिश्ता अर्थहीन हो जाए? यह घटना केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि हमारे समाज के भीतर गहराते मनोवैज्ञानिक और नैतिक संकट का संकेत है।
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इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक ऐसा मनोविज्ञान दिखाई देता है, जिसे समाजशास्त्र की भाषा में अति-महत्वाकांक्षा और नैतिक शून्यता कहा जा सकता है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने सफलता का अर्थ केवल धन, मकान, कार, बैंक बैलेंस और सुरक्षित सरकारी नौकरी तक सीमित कर दिया है।
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जब इन सबको पाने की तीव्र इच्छा तो पैदा हो जाए, लेकिन उन्हें परिश्रम, धैर्य और ईमानदारी से हासिल करने का संस्कार न हो, तब कुछ लोग शॉर्टकट तलाशने लगते हैं। यही शॉर्टकट धीरे-धीरे अपराध का रास्ता बन जाता है।

इस प्रकरण का सबसे पीड़ादायक पक्ष यह है कि मृतका का एक दिव्यांग बेटा भी है, जिसे अपनी मां के सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता थी, लेकिन लालच ने बेटी को इतना आत्मकेंद्रित बना दिया कि उसे न अपनी मां का जीवन दिखाई दिया और न ही अपने दिव्यांग भाई का भविष्य।

जब किसी व्यक्ति के भीतर से सहानुभूति, कृतज्ञता और पारिवारिक संवेदनाएं समाप्त होने लगती हैं, तब वह अपने सबसे निकट के रिश्ते को भी केवल एक बाधा के रूप में देखने लगता है।

यह घटना बताती है कि लालच जब चरम पर पहुंचता है तो वह सबसे पहले इंसान का विवेक और उसके सबसे पवित्र रिश्तों को निगल जाता है।

हम चाहे इसे मनोरंजन का नाम दें, लेकिन यह भी सच है कि आज की युवा पीढ़ी जिस प्रकार की सामग्री देख रही है, उसका प्रभाव उसके अवचेतन मन पर पड़ रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म और फिल्मों पर प्रसारित होने वाली अनेक अपराध-आधारित वेब सीरीज केवल अपराध की कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि कई बार अपराध की पूरी कार्यप्रणाली भी विस्तार से दिखाती हैं।

हत्या को दुर्घटना का रूप कैसे दिया जाए, जांच एजेंसियों को कैसे भ्रमित किया जाए और सबूत कैसे मिटाए जाएं, ऐसे दृश्य लगातार युवाओं के सामने परोसे जा रहे हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर अपराध का कारण फिल्में या वेब सीरीज हैं, लेकिन यह भी नकारा नहीं जा सकता कि अपराध के तरीकों का यह खुला प्रदर्शन कुछ लोगों के मन पर प्रभाव डाल सकता है।

जब अपराध को रोमांच और बुद्धिमत्ता का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, तब कुछ कमजोर मानसिकता वाले लोग वास्तविक जीवन में भी वैसी ही योजनाएं बनाने लगते हैं। हाल में पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में भी कुछ ऐसे ही पहलुओं पर चर्चा सामने आई है।

यह घटना हमारी शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। आज शिक्षा का उद्देश्य अच्छे अंक, बड़ा पैकेज और प्रतिष्ठित नौकरी तक सीमित होता जा रहा है।

चरित्र निर्माण, नैतिकता, संवेदनशीलता और पारिवारिक जिम्मेदारी जैसे विषय धीरे-धीरे पाठ्यक्रम और व्यवहार दोनों से गायब होते जा रहे हैं। हम शिक्षित तो हो रहे हैं, लेकिन क्या हम बेहतर इंसान भी बन रहे हैं? यह प्रश्न आज पहले से अधिक प्रासंगिक है।

समाज भी कहीं न कहीं इस स्थिति का भागीदार है। आज सम्मान का आधार व्यक्ति का चरित्र नहीं, बल्कि उसका पद, पैसा और प्रभाव बनता जा रहा है। माता-पिता भी बच्चों को बेहतर जीवन देने की दौड़ में उन्हें सुविधाएं तो उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन त्याग, संतोष, कर्तव्य, सेवा और परिवार के प्रति जिम्मेदारी जैसे जीवन मूल्यों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे।

जब भौतिक सफलता ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बना दी जाती है, तब ऐसे विकृत विचार जन्म लेने लगते हैं, जिनमें रिश्तों की कोई कीमत नहीं रह जाती।

आज इस जघन्य हत्या के आरोपित सलाखों के पीछे हैं। कानून अपना काम करेगा और न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देगा, लेकिन इस घटना को केवल एक आपराधिक मुकदमे तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह विश्वास, परिवार और सामाजिक मूल्यों पर गहरा प्रहार है।

ऐसे मामलों में यदि दोष सिद्ध होता है तो कानून के अनुसार कठोर दंड न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय का माध्यम होता है, बल्कि समाज के लिए भी एक स्पष्ट संदेश देता है कि लालच और विश्वासघात की ऐसी घटनाओं को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

जयपुर की यह घटना पूरे देश के लिए चेतावनी है। यदि हमने समय रहते अपनी शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों को पुनः स्थान नहीं दिया, यदि परिवारों में संवाद, संवेदना और संस्कारों को महत्व नहीं मिला और यदि समाज ने सफलता की परिभाषा केवल धन और संपत्ति तक सीमित रखी, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में और अधिक चिंता का विषय बन सकती हैं।

मकान ईंट और पत्थरों से बनते हैं, लेकिन परिवार विश्वास, प्रेम और संस्कारों से खड़े रहते हैं। जिस दिन भौतिक लालच इन मूल्यों पर भारी पड़ने लगे, उस दिन केवल एक परिवार नहीं टूटता, बल्कि पूरे समाज की आत्मा घायल हो जाती है।


इसलिए इस घटना से सबसे बड़ा सबक यही है कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ नैतिक चेतना और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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