गांधी जयंती विशेष: गांधी की जरूरत दुनिया को आज भी है
- गांधी मानते थे कि जो बातें भय की वजह से कायम होती, वह भय के बिना टिक नहीं सकती। इस संदर्भ में आज अमरीका की भूराजनीति को याद करना ज्यादा प्रासंगिक होगा।कुछ वैसी ही परिस्थितियां आज अल्पसंख्यक समुदाय के साथ पूरे देश और खासकर उत्तर प्रदेश में कायम करने की कोशिश भी हो रही हैं।
विस्तार
महात्मा गांधी शायद दुनिया के उन विरले व्यक्तियों में एक होंगे, जो सत्य और मृत्यु साथ अपने जीवन में एक साथ प्रयोग कर रहे थे। सत्य के साथ उनके प्रयोग का पूरा विवरण दर्ज है। पर मृत्य के साथ उनके प्रयोगों का पूरा ब्योरा उनके संघर्ष के विभिन्न पड़ावों पर खोजना पड़ेगा। दक्षिण अफ्रीका में उसकी शुरुआत हुई और दिल्ली में 30 जनवरी 1948 को उनकी मृत्यु के साथ पूरी हुई। दक्षिण अफ्रीका में गांधी उन्नीसवीं सदी के अन्त में अपने ऊपर हो रहे हमले से मरने की कला सीख रहे थे।
इस विषय में उन्होंने लिखा भी है- "जिस तरह से हिंसा के प्रशिक्षण के दौरान आपको हत्या की कला सीखना अनिवार्य होता है, उसी तरह से अहिंसा के प्रशिक्षण में आपको मरने की कला भी सिखनी चाहिए।" इस बार संयोग ऐसा कि जिस दिन महात्मा गांधी की जन्म जयंती है, उसी दिन दशहरे का त्योहार भी है।
एक संयोग यह भी है कि उसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष भी पूरा हो रहा है। लेकिन जरूरी मुद्दा यह है कि हम महात्मा गांधी को किस रूप में याद करें और वी डी सावरकर को अपना आदर्श मानने वाले आर एस एस को समाज जीवन में किए योगदान को किस रुप में याद किया जाना चाहिए? खासकर ऐसे समय में जब केन्द्र समेत कई राज्यों में संघ विचार पोषित कई सरकारें चल रही हैं और उसे हाल तक भारतीय जनता का व्यापक समर्थन भी हासिल रहा था। जाहिर है कि गांधी उनकी जरूरत नहीं होंगे।
भले ही आज दुनिया भर में चल रहे युद्ध में बुद्ध और महात्मा गांधी की जरूरत शिद्दत से महसूस किया जा रहा है। फिर क्या था गांधी का ऐसा करिश्मा जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है? बिना किसी जोर-जबर्दस्ती, धौंस पट्टी के अपने घोर विरोधी के साथ भी संवाद कर उसका दिल जीतने की कोशिश। क्योंकि गांधी मानते थे कि जो बातें भय की वजह से कायम होती, वह भय के बिना टिक नहीं सकती।
इस संदर्भ में आज अमरीका की भूराजनीति को याद करना ज्यादा प्रासंगिक होगा। कुछ वैसी ही परिस्थितियां आज अल्पसंख्यक समुदाय के साथ पूरे देश और खासकर उत्तर प्रदेश में कायम करने की कोशिश भी हो रही हैं। गांधीवाद में ऐसे विचारों की कोई जगह नहीं। पर सावरकर समर्थकों के लिए की वर्ग घृणा और हिंसा पर आधारित ऐसे कार्य न सिर्फ वांछनीय हैं, बल्कि उसके समर्थन में उनके पास पर्याप्त कारण भी मौजूद हैं।
गांधी पर ऐसी हिंसक घटनाएं दक्षिण अफ्रीका में कई बार हो चुकी थी। एक भयानक हिंसक घटना कर्जन विली की हत्या के रुप में महात्मा गांधी के लन्दन पहुंचने के पहले 1 जुलाई 1909 घट चुकी थी। गांधी 10 जुलाई को लन्दन पहुंचे थे। दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों की ओर से ब्रिटिश सरकार को की तकलीफों के बारे में प्रतिवेदन पेश करने। इसके पहले सन् 1906 में सावरकर से गांधी की मुलाकात इंडिया हाऊस में हो चुकी थी।
मदन लाल धींगरा ने बी डी सावरकर के बहकावे में आकर कर्जन विली की हत्या की थी। गांधी ने तब मदन लाल धींगरा को बेकसूर बताया और कहा कि " यह हत्या नशे की हालत में की गई थी। नशा केवल शराब और भांग का ही नहीं होता कोई विचार भी यह कम कर सकता है।"
गांधी को शायद यह पता था कि नशें में पगलायी इस विचार के कभी वे स्वयं भी शिकार हो सकते है। फिर भी उनसे मिलने, संवाद करने और उनकी बनायी मांद में घुसकर अपनी बात कहने का साहस गांधी जैसे विरले किसी में होता है। गांधी लन्दन में दशहरे के दिन 24 अक्टूबर 1909 को सावरकर समर्थकों की एक अतिवादी समूह के बुलावे पर आयोजित समारोह में शामिल हुए।
उस समारोह की दो शर्तें थीं। भोजन शाकाहारी होगा, दूसरी यह कि किसी विवादास्पद राजनीति पर चर्चा नहीं होगी। पर हुआ उसके ठीक उल्टा। दो प्रतिस्पर्धी विचारों की टकराव की वह शुरुआत थी। कहा जा सकता है कि भविष्य के भारत में दो सर्वथा भिन्न विचारों के राजनीति शुरुआत। उस समारोह में पहले गांधी को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया।
गांधी ने रामायण कथा के हवाले से वनवास के दौरान राम की पीड़ा, पत्नी सीता की सहनशीलता और छोटे भाई लक्ष्मण के संयम का उल्लेख करते हुए कहा कि -"अगर हिन्दुस्तानी उस ढंग से जीना सीख लेते हैं; तो वे उसी क्षण से स्वयं को स्वतंत्र मान सकते हैं।" यह झूठ पर सच्चाई की नई विजय का स्रोत होगा। सावरकर ने अपने भाषण में अन्याय और दमन के प्रतीक रावण के बध को जरूरी बताया।
स्पष्ट तौर पर विवादास्पद राजनीति की चर्चा के बहाने ही गांधी और सावरकर राजनीति के उस मर्म तक पहुंचे - जो भारत के भविष्य की राजनीति में आगे होनी थी।
भारत आने के बाद महात्मा गांधी सन् 1927 में जब रत्नागिरी में सावरकर से मिलकर बाहर निकल रहे थे, तब भी गांधी को एक तरह से आगाह करते हुए सावरकर ने कहा कि "आप जो प्रयोग कर रहे है उसकी बड़ी कीमत देश को एक दिन चुकानी पड़ेगी।" तब गांधी ने सावरकर से कहा कि " आपके और मेरे रास्ते अलग- अलग हैं। फिर भी यह प्रयोग मैं करता रहूंगा।" अन्ततः वैचारिक नशे के शिकार एक ऐसे ही पागल व्यक्ति नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या कर दिया।
शायद उसको नहीं मालूम कि गांधी देह की हत्या भले उसने कर दिया हो, गांधी विचार की हत्या किसी के बूते की की बात नहीं।यह भी कहा जाता है कि गांधी अपने हत्यारे के साथ भी एक सप्ताह बिताना चाहते थे।गांधी के ऐसे प्रयोगों को ही सत्य के के साथ मृत्यु के प्रयोग की संज्ञा दी जा सकती है।
अमरीकी लेखक जेम्स डगलस के इस बात से सहमत होने की प्रयाप्त गुंजाइश है कि "आज हत्या की राजनीति दुनिया के विपरीत हिस्सों में परीक्षा ले रही है। अगर सत्य और प्रेम के बल पर उससे मुक़ाबला करने का साहस हममें हैं जैसा कि गांधी ने किया था, तो उम्मीद की जीत होगी।"
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