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फैसला वही लें, जिससे सुकून मिले: पुश्तैनी घर छोड़ना मुश्किल, पर अकेलापन भी सच
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Fri, 17 Apr 2026 07:44 AM IST
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सार
70 वर्षीय बुजुर्ग को अमेरिका में बसे बेटे के पास जाने को लेकर हो रही दुविधा पर नीलकंठ ने कुछ यों सुझाया।
ब्लॉग
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मेरा इकलौता बेटा अपने परिवार के साथ अमेरिका में बस गया है। वह मुझे और अपनी मां को वहीं बुलाना चाहता है, पर पुश्तैनी घर को छोड़कर जाने का मन नहीं होता।
क्या करूं? आप जिस गहरे भावनात्मक द्वंद्व का सामना कर रहे हैं, उसे समझा जा सकता है। पुश्तैनी घर, पुरानी यादें, रोजमर्रा की आदतें और अपनी जगह की सुरक्षा-ये सब आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। वहीं दूसरी ओर, इकलौते बेटे की पुकार, पोते-पोती के साथ समय बिताने की चाहत और वृद्धावस्था में परिवार की देखभाल की जरूरत। यह द्वंद्व पूरी तरह स्वाभाविक है।
सबसे पहले, अपनी भावनाओं को बिना किसी अपराधबोध के स्वीकार करें। घर छोड़ने का डर वास्तव में ‘अटैचमेंट’ और ‘आइडेंटिटी’ से जुड़ा है। सत्तर साल की उम्र में हमारी पहचान हमारे परिवेश, दिनचर्या और सामाजिक संबंधों से गहराई से जुड़ी होती है। अमेरिका जाना सिर्फ जगह बदलना नहीं, बल्कि अपनी पूरी जीवनशैली, स्वतंत्रता और अपने होने की भावना को छोड़ना लगता है। यह डर स्वाभाविक है और यह किसी भी रूप में आपकी कमजोरी का परिचायक नहीं है। आपकी पत्नी भी शायद यही महसूस कर रही होंगी। दोनों मिलकर इस पर खुलकर बात करें।
अब वास्तविकता की ओर देखें। बेटा आपको बुला रहा है, तो इसका मतलब है कि वह आपकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है। वहां पोते-पोती के साथ भावनात्मक जुड़ाव आपके जीवन में नई सकारात्मक ऊर्जा ला सकता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि परिवार के साथ निकटता से बुजुर्गों में डिप्रेशन और अकेलेपन की संभावना काफी कम हो जाती है। लेकिन जबर्दस्ती या अपराधबोध से लिया गया फैसला आगे चलकर तनाव बढ़ा सकता है।
मेरा सुझाव है कि आप ‘ट्रांजिशनल अप्रोच (संक्रमणकालीन दृष्टिकोण)’ अपनाएं, यानी धीरे-धीरे बदलाव लाएं। पहले तीन से छह महीने के लिए अमेरिका जाएं, जैसे कोई लंबी छुट्टी। वहां रहकर देखें कि नया वातावरण, मौसम, भोजन और बेटे के घर की दिनचर्या आपको कितना सुकून देती है। इस दौरान घर को बेचने या किराये पर देने की कोई जल्दबाजी न करें। भारत में अपने बैंक, पेंशन और मेडिकल सुविधाओं को बनाए रखें। बेटे से स्पष्ट रूप से कहें कि यह सिर्फ परीक्षण का समय है, ताकि दबाव न रहे। अगर दोनों जगहों में संतुलन बन सके, तो वह सबसे स्वस्थ विकल्प होगा। साल में चार-पांच महीने अमेरिका में परिवार के साथ, और बाकी समय भारत में अपनी जड़ों के साथ। कई बुजुर्ग इस ‘ट्रांसनेशनल लिविंग’ को सफलतापूर्वक अपना चुके हैं। इससे दोनों पीढ़ियों को फायदा होता है-आप बच्चों को भारतीय संस्कार सिखा सकते हैं और खुद नई ऊर्जा पा सकते हैं।
अंत में, फैसला पूरी तरह आपका और आपकी पत्नी का होना चाहिए। न बेटे के दबाव में, न समाज की अपेक्षाओं में। अपने मन की शांति, स्वास्थ्य और खुशी को प्राथमिकता दें। अगर जरूरत हो, तो किसी स्थानीय काउंसलर या परिवार के साथ चर्चा करें। छोटे कदम से शुरू करें और धैर्य रखें।
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क्या करूं? आप जिस गहरे भावनात्मक द्वंद्व का सामना कर रहे हैं, उसे समझा जा सकता है। पुश्तैनी घर, पुरानी यादें, रोजमर्रा की आदतें और अपनी जगह की सुरक्षा-ये सब आपके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। वहीं दूसरी ओर, इकलौते बेटे की पुकार, पोते-पोती के साथ समय बिताने की चाहत और वृद्धावस्था में परिवार की देखभाल की जरूरत। यह द्वंद्व पूरी तरह स्वाभाविक है।
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सबसे पहले, अपनी भावनाओं को बिना किसी अपराधबोध के स्वीकार करें। घर छोड़ने का डर वास्तव में ‘अटैचमेंट’ और ‘आइडेंटिटी’ से जुड़ा है। सत्तर साल की उम्र में हमारी पहचान हमारे परिवेश, दिनचर्या और सामाजिक संबंधों से गहराई से जुड़ी होती है। अमेरिका जाना सिर्फ जगह बदलना नहीं, बल्कि अपनी पूरी जीवनशैली, स्वतंत्रता और अपने होने की भावना को छोड़ना लगता है। यह डर स्वाभाविक है और यह किसी भी रूप में आपकी कमजोरी का परिचायक नहीं है। आपकी पत्नी भी शायद यही महसूस कर रही होंगी। दोनों मिलकर इस पर खुलकर बात करें।
अब वास्तविकता की ओर देखें। बेटा आपको बुला रहा है, तो इसका मतलब है कि वह आपकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर चिंतित है। वहां पोते-पोती के साथ भावनात्मक जुड़ाव आपके जीवन में नई सकारात्मक ऊर्जा ला सकता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि परिवार के साथ निकटता से बुजुर्गों में डिप्रेशन और अकेलेपन की संभावना काफी कम हो जाती है। लेकिन जबर्दस्ती या अपराधबोध से लिया गया फैसला आगे चलकर तनाव बढ़ा सकता है।
मेरा सुझाव है कि आप ‘ट्रांजिशनल अप्रोच (संक्रमणकालीन दृष्टिकोण)’ अपनाएं, यानी धीरे-धीरे बदलाव लाएं। पहले तीन से छह महीने के लिए अमेरिका जाएं, जैसे कोई लंबी छुट्टी। वहां रहकर देखें कि नया वातावरण, मौसम, भोजन और बेटे के घर की दिनचर्या आपको कितना सुकून देती है। इस दौरान घर को बेचने या किराये पर देने की कोई जल्दबाजी न करें। भारत में अपने बैंक, पेंशन और मेडिकल सुविधाओं को बनाए रखें। बेटे से स्पष्ट रूप से कहें कि यह सिर्फ परीक्षण का समय है, ताकि दबाव न रहे। अगर दोनों जगहों में संतुलन बन सके, तो वह सबसे स्वस्थ विकल्प होगा। साल में चार-पांच महीने अमेरिका में परिवार के साथ, और बाकी समय भारत में अपनी जड़ों के साथ। कई बुजुर्ग इस ‘ट्रांसनेशनल लिविंग’ को सफलतापूर्वक अपना चुके हैं। इससे दोनों पीढ़ियों को फायदा होता है-आप बच्चों को भारतीय संस्कार सिखा सकते हैं और खुद नई ऊर्जा पा सकते हैं।
अंत में, फैसला पूरी तरह आपका और आपकी पत्नी का होना चाहिए। न बेटे के दबाव में, न समाज की अपेक्षाओं में। अपने मन की शांति, स्वास्थ्य और खुशी को प्राथमिकता दें। अगर जरूरत हो, तो किसी स्थानीय काउंसलर या परिवार के साथ चर्चा करें। छोटे कदम से शुरू करें और धैर्य रखें।

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