मतदान से पहले मात: जब चुनाव का निवाला मुंह तक आकर छिन गया
मध्यप्रदेश के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के साथ जो हुआ, वह इसी श्रेणी की घटना है। कांग्रेस का तर्क है कि मीनाक्षी नटराजन के विरुद्ध कोई ऐसा लंबित आपराधिक मामला नहीं था जिसे छिपाने का आरोप लगाया जा सके। पार्टी का कहना है कि नामांकन निरस्त करना कानून और चुनाव आयोग की स्थापित परंपराओं के विपरीत है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राजनीति में हार हमेशा मतपेटियों से नहीं निकलती। कई बार पराजय की पटकथा मतदान से पहले ही लिख दी जाती है। कभी नामांकन पत्र की मेज पर, कभी कानूनी व्याख्या में, कभी रणनीतिक चूक में और कभी राजनीतिक प्रबंधन के किसी ऐसे मोड़ पर, जहां चुनाव औपचारिकता बनकर रह जाता है। मध्यप्रदेश के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के साथ जो हुआ, वह इसी श्रेणी की घटना है।
11 जून को भारतीय जनता पार्टी के तीनों प्रत्याशी - तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट - निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए। इससे पहले मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निर्वाचन अधिकारी द्वारा निरस्त किया जा चुका था। कांग्रेस चुनाव आयोग पहुंची, सुप्रीम कोर्ट पहुंची, विरोध प्रदर्शन हुए, संवैधानिक सवाल उठाए गए, लेकिन तत्काल राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार करते हुए मामले की सुनवाई बाद के लिए रखी। परिणामस्वरूप राजनीतिक फैसला पहले हो गया और कानूनी बहस बाद के लिए बची रह गई।
यही इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अदालत का अंतिम निर्णय जो भी हो, फिलहाल भाजपा तीन सीटें जीत चुकी है और कांग्रेस एक ऐसी चुनावी लड़ाई हार चुकी है, जिसमें मतदान तक नहीं हुआ।
सिर्फ राज्यसभा सीट का मामला नहीं
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक राज्यसभा सीट का मामला नहीं है। यह चुनावी कानून, निर्वाचन अधिकारियों की शक्तियों, राजनीतिक दलों की तैयारी, चुनावी प्रबंधन और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की प्रकृति से जुड़ा प्रश्न बन गया है।
कांग्रेस का तर्क है कि मीनाक्षी नटराजन के विरुद्ध कोई ऐसा लंबित आपराधिक मामला नहीं था जिसे छिपाने का आरोप लगाया जा सके। पार्टी का कहना है कि नामांकन निरस्त करना कानून और चुनाव आयोग की स्थापित परंपराओं के विपरीत है। कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग की और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया।
दूसरी ओर भाजपा का पक्ष है कि शपथ पत्र में आवश्यक जानकारी का खुलासा न करना गंभीर मामला है और चुनावी पारदर्शिता के सिद्धांत के तहत निर्वाचन अधिकारी ने सही निर्णय लिया। भाजपा इसी तर्क के आधार पर इसे कानून की स्वाभाविक प्रक्रिया बता रही है।
कानूनी दृष्टि से विवाद का केंद्र जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 36 और नामांकन पत्रों की जांच की प्रक्रिया है। प्रश्न यह है कि क्या कथित रूप से छूटी हुई जानकारी इतनी महत्वपूर्ण थी कि उसके आधार पर नामांकन निरस्त किया जा सके। कांग्रेस का कहना है कि नहीं। भाजपा और निर्वाचन अधिकारी की कार्रवाई का समर्थन करने वाले लोग कहते हैं कि हां। यही प्रश्न आगे न्यायिक समीक्षा का विषय बनेगा।
लेकिन राजनीति में अक्सर कानूनी सत्य और राजनीतिक सत्य अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस की पहली हार अदालत में नहीं, तैयारी में हुई है। यह मानना कठिन है कि राहुल गांधी की निकट सहयोगी और पूर्व सांसद जैसी वरिष्ठ नेता का नामांकन भरने से पहले कानूनी जांच नहीं हुई होगी। यदि हुई थी तो यह त्रुटि कैसे रह गई? यदि नहीं हुई थी तो यह और भी गंभीर प्रश्न है।
मध्यप्रदेश में पहला मामला नहीं है यह
यहीं से यह मामला कांग्रेस की संगठनात्मक क्षमता पर सवाल खड़े करता है। मध्यप्रदेश की राजनीति में यह पहली बार नहीं हुआ कि चुनाव का निवाला मुंह तक आकर छिन गया हो।
सबसे ताजा उदाहरण 2024 का इंदौर लोकसभा चुनाव है। कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने नामांकन वापसी की अंतिम घड़ियों में चुनाव मैदान छोड़ दिया और बाद में भाजपा के साथ दिखाई दिए। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस मध्यप्रदेश की सबसे चर्चित शहरी सीटों में से एक पर वास्तविक मुकाबले से बाहर हो गई। चुनाव हुआ, मतदान हुआ, लेकिन राजनीतिक लड़ाई उससे पहले ही समाप्त हो चुकी थी। उस समय कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर आघात बताया था, जबकि भाजपा ने इसे कांग्रेस के प्रति अविश्वास का प्रमाण कहा था।
उससे पहले मध्यप्रदेश की राजनीति में सुषमा स्वराज और राजकुमार पटेल से जुड़ा विदिशा लोकसभा चुनाव भी लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक चर्चा का विषय बना रहा। चुनाव समाप्त होने के बाद भी विवाद अदालतों तक पहुंचा और चुनावी प्रक्रिया, निर्वाचन संबंधी नियमों तथा उम्मीदवारों की जवाबदेही पर बहस चलती रही। यद्यपि उस मामले की प्रकृति अलग थी, लेकिन वह भी इस बात का उदाहरण था कि चुनावी संघर्ष केवल मतदान केन्द्रों तक सीमित नहीं रहते।
मीनाक्षी नटराजन प्रकरण इन दोनों घटनाओं से अलग होते हुए भी एक समान संदेश देता है कि मध्यप्रदेश में कई बार चुनावी परिणाम मतदान से पहले आकार लेने लगते हैं। यही कारण है कि इस मामले को केवल कानूनी विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता।
भाजपा की रणनीतिक सफलता
भाजपा की दृष्टि से यह एक बड़ी रणनीतिक सफलता है। पार्टी ने तीसरा प्रत्याशी उतारकर पहले ही राजनीतिक संदेश दे दिया था कि वह राज्यसभा चुनाव को औपचारिक प्रक्रिया नहीं मान रही। कांग्रेस के भीतर संभावित क्रॉस वोटिंग की चर्चाएं भी चल रही थीं। यहां तक कि कांग्रेस ने तोड़फोड़ से बचने के इरादे से अपने विधायकों को बेंगलुरू भेजने के लिए विमान में बैठा दिया था। लेकिन नामांकन निरस्त होने के बाद पूरा समीकरण ही बदल गया।
भाजपा को न क्रॉस वोटिंग की चिंता करनी पड़ी और न राजनीतिक जोड़-तोड़ की। उसे तीनों सीटें निर्विरोध मिल गईं। कांग्रेस के लिए यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक झटका भी है।
पिछले कुछ वर्षों में पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह मध्यप्रदेश में पुनर्गठन के दौर से निकलकर संघर्ष की स्थिति में लौट रही है। लेकिन यह घटना उस दावे को कमजोर करती है। भाजपा अब इसे कांग्रेस की संगठनात्मक अराजकता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगी। आने वाले महीनों में भाजपा नेताओं के भाषणों में यह तर्क बार-बार सुनाई देगा कि जो दल अपना नामांकन नहीं बचा पाया, वह सत्ता कैसे संभालेगा।
भाजपा भी पूरी तरह निश्चिंत न रहे
यदि भविष्य में अदालत यह मानती है कि नामांकन पत्र गलत ढंग से निरस्त किया गया था, तो भले ही तत्काल चुनाव परिणाम पलटना आसान न हो, लेकिन भाजपा की निर्विरोध जीत की नैतिक वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं। कांग्रेस तब इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के बड़े उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करेगी। इसलिए भाजपा की वास्तविक रणनीति केवल राजनीतिक विजय का उत्सव मनाने की नहीं होगी, बल्कि कानूनी रूप से निर्णय का बचाव करने की भी होगी।
इस मामले का एक और दिलचस्प पहलू चुनाव आयोग की भूमिका है। कांग्रेस का कहना है कि आयोग के पास हस्तक्षेप की शक्ति थी और उसने उसका उपयोग नहीं किया। भाजपा और आयोग समर्थक पक्ष का तर्क है कि निर्वाचन अधिकारी की प्रक्रिया विधिसम्मत थी। यह बहस भविष्य में भी चलती रहेगी, क्योंकि भारतीय चुनाव प्रणाली में निर्वाचन अधिकारियों के विवेक और चुनाव आयोग की पर्यवेक्षी भूमिका के बीच संतुलन का प्रश्न बार-बार उठता रहा है।
आगे क्या हो सकता है?
पहली संभावना यह है कि मामला चुनाव याचिका और लंबी न्यायिक प्रक्रिया में बदल जाए। दूसरी संभावना यह है कि अदालत नामांकन निरस्तीकरण की वैधता पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां करे, जिससे भविष्य के चुनावों के लिए नई न्यायिक कसौटियां तय हों। तीसरी संभावना राजनीतिक है। कांग्रेस इसे अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और भाजपा पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण संभावना कांग्रेस के भीतर है। क्या पार्टी इस घटना से सबक लेगी? क्या उम्मीदवार चयन, कानूनी परीक्षण और चुनावी प्रबंधन की प्रक्रियाओं की समीक्षा होगी? क्या जिम्मेदारी तय होगी?... या फिर यह मामला भी कुछ समय बाद राजनीतिक बयानबाजी में खो जाएगा?
लोकतंत्र में चुनाव केवल लोकप्रियता की परीक्षा नहीं होते। वे तैयारी, अनुशासन और सतर्कता की भी परीक्षा होते हैं। आधुनिक चुनावों में एक शपथ पत्र, एक कॉलम, एक कानूनी व्याख्या और एक प्रशासनिक निर्णय पूरे राजनीतिक समीकरण को बदल सकता है।
मीनाक्षी नटराजन प्रकरण का अंतिम कानूनी फैसला अभी आना बाकी है। लेकिन राजनीतिक फैसला आ चुका है। भाजपा तीन सीटें जीत चुकी है। कांग्रेस एक ऐसी लड़ाई हार चुकी है, जिसका मतदान नहीं हुआ। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सबक है कि लोकतंत्र में कभी-कभी सबसे निर्णायक हार मतगणना कक्ष में नहीं, नामांकन कक्ष में भी हो जाती है।
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।