फिल्में, सियासत और मिथुन: जब मिथुन ने कहा था, 'मैं अब और अपने बच्चे की आंखों में आंखें डालकर नहीं देख सकता'
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पिछले 30 साल में महाराष्ट्र में बहुत कुछ बदल गया है। बंबई अब मुंबई हो चुका है। वर्सोवा की जेटी पर अब 'कुछ भी' पहुंचाना आसान नहीं है। मड आइलैंड के समुद्र तट भी पहले से वीरान नहीं रहे। इसी टापू पर बने मिथुन चक्रवर्ती के बंगले में अब किसी का आना-जाना गोपनीय नहीं रह पाता। ये और बात है कि इसी बंगले में रहते हुए मिथुन कभी शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के निशाने पर भी आए थे।
भगवा के निशाने पर आने से पहले मिथुन को लाल झंडा बहुत भाया था। पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार संग अपनी नजदीकी दोस्ती वह कोलकाता में हुए 'होप 86' कार्यक्रम में जगजाहिर कर भी चुके थे। मिथुन के इसी बंगले से इस बार पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक नया रंग निकला है। इस बंगले से मेरी भी तमाम यादें जुड़ी हैं।
ये उन दिनों की बात है जब टीवी न्यूज चैनल होते नहीं थे। 'इंडिया टुडे' मैगजीन पर खबरों में दिलचस्पी रखने वाले हर शख्स की नजर रहती। इस पत्रिका का 15 मई 1993 का अंक मुंबई में अब भी कई लोगों ने सहेज कर रखा है। इसकी कवर स्टोरी ने तब हिंदी फिल्म जगत के कपड़े सरे बाजार उतारे थे। इसी में मिथुन चक्रवर्ती के बारे में तमाम बातें पहली बार लोगों के सामने उजागर हुईं। इसी आलेख के मुताबिक मिथुन ने तब उस माहौल से दुखी होकर कहा था, 'मैं फिल्में छोड़ देना चाहता हूं। मैं अब और अपने बच्चे की आंखों में आंखें डालकर नहीं देख सकता।'
मिथुन चक्रवर्ती ने ऐसा क्यों कहा, इसका जवाब बीती सदी के आखिरी दशकों में हिंदी सिनेमा से जरा सा भी जुड़ा रहा शख्स बखूबी समझ सकता है। इसी के बाद मिथुन ने लंबे समय तक अपना बोरिया बिस्तर ऊटी में ही जमाए रखा।
उन दिनों मुंबई (तब बंबई) उनका आना-जाना बहुत कम रहा। तब मुंबई पुलिस शहर में हुए बम धमाकों की जांच कर रही थी। मैग्नम वीडियो के मालिकों हनीफ-समीर पर पुलिस का शिकंजा कस चुका था और मिथुन की इन दोनों से दोस्ती जगजाहिर थी। दाऊद की एक दावत का भी खूब शोर मचा था, जिसमें हवाई जहाज भरके फिल्मी सितारे शामिल हुए थे।मिथुन ने तब कहा था-
'हम सब डर में जी रहे हैं। इस पूरे प्रकरण ने सितारों को लेकर बनी भ्रांतियां तोड़ दी हैं। हम परदे पर दिखने वाले माचोमैन नहीं हैं।'
टीवी न्यूज चैनलों के तब दूर-दूर तक चर्चे भी नहीं थे। नहीं तो 'इंडिया टुडे' की इस कवर स्टोरी पर हफ्तों स्पेशल कार्यक्रम बन सकते थे। अब टीवी चैनल हैं तो इतना पीछे जाकर रिसर्च करने की परंपरा नहीं रही। इंस्टैंट टीआरपी के दौर में लोग मिथुन का इतिहास सिर्फ ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस से उनके सांसद बनने तक पलट पाए हैं। न लोग उनका नक्सल इतिहास टटोल रहे हैं और न ही महाराष्ट्र की सियासत में उनके पुराने जिक्र को तलाश पा रहे हैं।
मिथुन चक्रवर्ती के जिस बंगले में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के जाने की चर्चा इन दिनों जमाने में आम है, उसमें मेरा जाना कई बार हुआ। मिथुन अपने काम से काम रखने वाले इंसान है। कोई 13-14 साल पहले मिथुन पर मेरी बनाई एक डॉक्यूमेंट्री जी न्यूज पर प्रसारित हुई तो टीआरपी चार्ट में इसके नंबर देख तब जी के मुख्यालय में हलचल मच गई थी।
मुंबई से कोलकाता फोन गया। वहां से फोन मेरे पास आया। मिथुन ने तब टीवी पर काम करने को लेकर मुझसे लंबा सलाह मशविरा किया था। मैंने उन्हें 'आई एम ए डिस्को डांसर' डांस रियलिटी शो करने का सुझाव दिया।
जी ने इसी विचार पर उनके साथ पहले 'डांस बांग्ला डांस' और फिर 'डांस इंडिया डांस' बनाया। मिथुन का ये बड़प्पन रहा कि उस समय जी के प्रोग्रामिंग हेड रहे आशीष गोलवलकर को हां करने से पहले उन्होंने मुझसे इजाजत मांगी, क्योंकि इस डांस रियलिटी शो का मूल विचार मेरा ही था।
ये मिथुन के फिल्मी करियर का पुनर्जीवन था। मिथुन लंबे समय तक सिनेमा की सियासत में शामिल रहे हैं। सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन के वह सबसे लोकप्रिय अध्यक्ष रहे हैं। बीजेपी अब उनका नया घर है। देश की सियासत में उनका अब नवजीवन हो रहा है। प्रधानमंत्री के पैर छूकर इसका संकेत भी उन्होंने खुद दे दिया है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।