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नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन: महिलाओं को सशक्त करने की राह और इंतजार के दशक

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सार

सरकार ने 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को संभव बनाकर आखिरी रुकावट को हटा दिया है। जिससे 2029 के लोकसभा चुनावों और उससे पहले होने वाले राज्यों के चुनावों के लिए महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

Nari Shakti Vandan Act Amendment Modi government fulfills promise to empower women
नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसोधन - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

नारीशक्ति वंदन अधिनियम संसोधन के लिए संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू है। संसद के इस विशेष सत्र में इस पर चर्चा होना है ताकि महिलाओं के लिए आरक्षण संबंधी 2023 के संवैधानिक प्रावधानों को लागू किया जा सके। यह संसोधन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की अनुमति देकर, भविष्य की जनगणना और पूर्ण परिसीमन पर निर्भरता को समाप्त करता है।

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दरअसल, इस बिल से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण 2029 के चुनावों तक या उससे पहले पूरा होने की उम्मीद है। आजादी के बाद पहली बार, महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को केवल नीतिगत वादों के बजाय संवैधानिक माध्यमों से सुनिश्चित किया जा रहा है। या यूं कहें जो यह बहस चल रही है नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन, यह आखिरी प्रक्रियात्मक कदम है जो महिलाओं के लिए आरक्षण के 2023 के संवैधानिक वादे को हकीकत में बदल देगा। यह एक ऐसे संवैधानिक ढांचे के जरिए सुनिश्चित किया जा रहा है जिसे बदला नहीं जा सकता।
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सरकार ने 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन को संभव बनाकर आखिरी रुकावट को हटा दिया है, जिससे 2029 के लोकसभा चुनावों और उससे पहले होने वाले राज्यों के चुनावों के लिए महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की प्रक्रिया तेज हो गई है।  यह एक व्यवस्थित बदलाव की परिणिती है। गरिमा और आर्थिक सशक्तिकरण से लेकर सुनिश्चित राजनीतिक सत्ता तक जिसे महज वादों के बजाय एक स्थायी संवैधानिक ढांचे का समर्थन हासिल है।

भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए एक व्यवस्थित, चरण-दर-चरण दृष्टिकोण अपनाया है जिसकी शुरुआत स्वच्छ भारत मिशन और उज्ज्वला जैसी पहलों के जरिए सामाजिक गरिमा को बहाल करने से हुई। इन पहलों ने करोड़ों महिलाओ के लिए स्वच्छता और खाना पकाने के लिए धुंआ रहित स्वच्छ ईंधन की पहुंच सुनिश्चित की। इसके बाद सरकार ने जन-धन खातों, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डी बी टी), मुद्रा ऋण, लखपति दीदी जैसी पहलों के जरिए वित्तीय समावेशन का विस्तार करके आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित की और आयुष्मान भारत के जरिये स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की। जिससे महिलाएं अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार बन गईं।

दरअसल, सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित होने के साथ ही राजनीतिक सशक्तिकरण को संस्थागत् रूप दे दिया गया। इस अधिनियम ने भारी संसदीय समर्थन के साथ लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया। यह नवीनतम संसोधन भविष्य की जनगणना का इंतजार करने की आखिरी शर्त को हटा देता है और 2011 के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन को संभव बनाता है। यह सुनिश्चित करता है कि 2029 के चुनावों तक, एक तिहाई विधायक महिलाएं होंगी। यह उनका संवैधानिक अधिकार होगा न कि कोई राजनीतिक रियायत!


हालांकि प्रयास पहले भी हुआ था लेकिन नीति व नियत के अभाव में आधे अधूरे मन से। महिला आरक्षण विधेयक जिसे पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के कार्यकाल में पेश किया गया था। लगभग तीन दशकों तक कानून का रूप नहीं ले पाया। राजनीतिक अस्थिरता और आम सहमति की कमी के कारण यह विधेयक बार बार निष्प्रभावी हो जाता था। 1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली सरकार ने इसे पास करने के कई प्रयास किए, लेकिन सपा और राजद जैसी पार्टियों से कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। संसद में रुकावटें और ओबीसी आरक्षण को प्राथमिकता देने की मांगों के कारण प्रगति रुक गई। यूपीए काल के दौरान राज्यसभा में विधयेक पारित होने के बावजूद इसे कभी भी लोकसभा में पेश नहीं किया गया। 

बहरहाल, मोदी सरकार 2023 में कानून पास करके और 2026 के संसोधन के माध्यम से इसके कार्यान्वयन में तेजी लाकर, दशकों से चले आ रहे गतिरोध को सुलझाने वाली सरकार के रूप में प्रस्तुत किया है। यह कांग्रेस की निष्क्रियता के बिल्कुल विपरीत है।  यह सुधार लंबे समय से बंद दरवाजे को खोलने सरीखा है। जो यह सुनिश्चित करता है कि 2029 तक संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई सदस्य महिलाएं होंगी। यह भारतीय राजनीति में पारंपरिक वोट बैंक की गतिशीलता से परे एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत है।

16 से 18 अप्रैल तक संसद के इस विशेष सत्र में, केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 यह 3 विधेयक पेश किये जायेंगे। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 में प्रस्ताव है कि लोकसभा में अधिकतम 850 सीटें होंगी। इनमें 815 सीटें राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से। फ़िलहाल लोकसभा में 543 सीटें हैं और संविधान में इनकी अधिकतम संख्या 550 तय की गई है। विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का भी प्रस्ताव है, ताकि 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या पर लगी रोक को हटाया जा सके।

अनुच्छेद 81 के इन्हीं प्रावधानों की वजह से 1976 से ही लोकसभा की सीटों की संख्या में इजाफा नहीं हुआ है। तो अगर मौजूदा लोकसभा का आधार 1971 की जनगणना थी, तो लोकसभा की सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव किस आधार पर दिया जा रहा है? इस सवाल का जवाब डीलिमिटेशन बिल (परिसीमन विधेयक 2026) में है, जिसे भी विशेष सत्र में पेश किया जाएगा।

फिलहाल लोकसभा में 78 महिला सांसद (कुल सीटों का 14%) और राज्यसभा में 42 महिला सांसद (कुल सीटों का 18%) है। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की एक प्रेस रिलीज़ मुताबिक़, दुनिया भर में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व औसतन 27.2% है। यानी भारत में महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व दुनिया की तुलना में काफी कम है। जबकि महिला संगठनों और महिला सांसदों ने दशकों से महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग उठाई है। इन तीनों विधयेक के पारित होने के बाद लोकसभा  और विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़ेगी तो उसी अनुपात में राज्यसभा व विधानपरिषद की सीटों की संख्या भी बढ़ेगी।

एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी तो हर राजनीतिक दल को एक तिहाई महिलाओं को उम्मीदवार बनाना मजबूरी होगी। यह बिल्कुल वैसे ही होगा जैसे अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सीटों के मामले में होता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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