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Nari Shakti Vandan Adhiniyam: नारी शक्ति वंदन और पहाड़ का राजनीतिक भविष्य
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सार
नारी शक्ति वंदन विधेयक के साथ जुड़ा परिसीमन का फॉर्मूला उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है। यदि राज्य की विधानसभा सीटें 70 से बढ़ाकर 105 की जाती हैं, तो जनसंख्या आधारित वितरण पहाड़ के विरुद्ध जाता दिख रहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को आशीर्वाद देती बुजुर्ग महिला।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
उत्तराखंड के वर्तमान राजनीतिक विमर्श में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लेकर एक अत्यंत जटिल और विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हो गई है। हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र ने उस राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है जिसमें महिला सशक्तिकरण के समर्थन के साथ-साथ परिसीमन के छिपे हुए खतरों पर चिंता जताई जा रही है।
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एक ओर जहां महिलाओं को सत्ता में भागीदारी देने का ऐतिहासिक कदम उठाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर 'परिसीमन' की वह अदृश्य तलवार लटक रही है जो उत्तराखंड के पर्वतीय अस्तित्व के राजनीतिक आधार को कमजोर कर सकती है।
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राज्य का सबसे बड़ा संकट यह है कि इस आरक्षण की आड़ में होने वाले संभावित परिसीमन से पहाड़ की राजनीतिक शक्ति का केंद्र मैदानों की ओर खिसक सकता है।
सत्ता का असंतुलन और परिसीमन का गणित
नारी शक्ति वंदन विधेयक के साथ जुड़ा परिसीमन का फॉर्मूला उत्तराखंड के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है। यदि राज्य की विधानसभा सीटें 70 से बढ़ाकर 105 की जाती हैं, तो जनसंख्या आधारित वितरण पहाड़ के विरुद्ध जाता दिख रहा है।
अब तक सीटों के निर्धारण के लिए 'विचलन' (Variation) का एक निश्चित मानक अपनाया जाता रहा है। पूर्व में एक सीट के लिए औसतन एक लाख की जनसंख्या का मानक रखा गया था, जिसमें 10 प्रतिशत के विचलन की अनुमति थी।
इसके तहत मैदानी क्षेत्रों में एक लाख 10 हजार की जनसंख्या पर एक सीट और पहाड़ में 90 हजार की जनसंख्या पर एक सीट का निर्धारण हुआ था। लेकिन वर्तमान जनसंख्या असंतुलन को देखते हुए यह 10 प्रतिशत का अंतर पहाड़ की सीटों को बचाने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है।
25 प्रतिशत विचलन की मांग और क्षेत्रीय सरोकार
इसी संकट को देखते हुए ज्योत सिंह बिष्ट जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों द्वारा एक व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। उनकी मांग है कि उत्तराखंड जैसे विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए इस विचलन (Variation) की सीमा को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जाना चाहिए।
यदि इस मानक को अपनाया जाता है, तो पहाड़ की कम जनसंख्या वाली सीटों को भी संवैधानिक सुरक्षा मिल सकेगी और परिसीमन के बाद भी पर्वतीय क्षेत्रों की सीटों में कटौती नहीं होगी।
यह मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व को बचाने की एक अनिवार्य शर्त बन गई है, ताकि जनसंख्या के आधार पर होने वाला 'सिरों का गणित' पहाड़ के भूगोल को राजनीतिक रूप से बेदखल न कर दे।
भूगोल बनाम जनसंख्या: एक जटिल चुनौती
उत्तराखंड राज्य का गठन किसी सामान्य प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं, बल्कि पहाड़ की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया था। विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान यह तर्क प्रमुखता से उभरा कि परिसीमन का आधार केवल 2011 या 2027 की जनगणना को नहीं बनाया जाना चाहिए।
विपक्ष और क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में 'भौगोलिक परिस्थितियों' को प्राथमिकता मिलना अनिवार्य है। मैदान में जहाँ एक विधायक सुगमता से लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, वहीं पहाड़ में एक प्रतिनिधि को कई सौ किलोमीटर के दुर्गम और कटे-फटे भूगोल का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है। यदि केवल जनसंख्या ही आधार रही, तो पहाड़ का प्रतिनिधित्व सदन में 'अल्पमत' जैसा हो जाएगा।
पलायन की मार और राजनीतिक विस्थापन
पहाड़ के लोगों को उनके 'त्याग' और 'मजबूरी' की दोहरी सजा मिल रही है। सुविधाओं के अभाव में जिस जनता को पलायन करना पड़ा, अब उसी पलायन के कारण घटी जनसंख्या को आधार बनाकर उनसे उनकी राजनीतिक पहचान छीनी जा रही है। यह उस 'पर्वतीय राज्य' की मूल अवधारणा पर प्रहार है जिसके लिए राज्य आंदोलन में भारी बलिदान दिए गए थे।
महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को सत्ता में भागीदारी देना है, जो कि एक सराहनीय कदम है, लेकिन यदि इसकी आड़ में भौगोलिक प्रतिनिधित्व ही समाप्त हो जाए, तो पहाड़ की विशिष्ट समस्याओं जैसे भू-कानून और संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों पर निर्णय लेने की शक्ति पहाड़वासियों के हाथ से निकल जाएगी।
अस्तित्व की रक्षा और सामूहिक उत्तरदायित्व
उत्तराखंड की जनता को यह समझना होगा कि महिला आरक्षण का लाभ तभी सार्थक है जब वह राज्य की भौगोलिक विशिष्टताओं के साथ न्याय करे।
यदि परिसीमन में 'हिमालयी भूगोल' और 'विचलन के मानक' को जनसंख्या के समान महत्व देने का प्रावधान नहीं किया गया, तो उत्तराखंड केवल मानचित्र पर एक पहाड़ी राज्य दिखेगा, जबकि उसकी राजनीतिक आत्मा मैदानों के दबाव में दम तोड़ चुकी होगी।
अब समय आ गया है कि राज्य के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह सुनिश्चित किया जाए कि विकास और प्रतिनिधित्व की नीति केवल आंकड़ों पर नहीं, बल्कि पहाड़ की धड़कन और उसकी विषम परिस्थितियों पर आधारित हो।
यदि आज इस राजनीतिक विस्थापन के विरुद्ध ठोस विमर्श नहीं खड़ा किया गया, तो भविष्य का इतिहास हमें इस मौन 'कुर्बानी' के लिए कभी माफ नहीं करेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
