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Blog: जीवन कोई सीधी रेखा नहीं, पूर्ण वृत्त; वृद्धावस्था एक शांत आंगन

चार्ल्स डिकेंस Published by: शिवम गर्ग Updated Fri, 30 Jan 2026 07:32 AM IST
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सार

वृद्धावस्था वह शांत आंगन है, जहां स्मृतियां धूप बनकर फैल जाती हैं। वहीं बैठकर आत्मा बिना हड़बड़ी और बिना छल के अपने संपूर्ण जीवन-पथ को निहारती है। यही वह क्षण होता है, जब जीवन अपने अर्थ स्वयं प्रकट करता है।

Old Age Is Not Emptiness, but a Peaceful Phase Where Memories Become Strength
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
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विस्तार
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जब मनुष्य जीवन की संध्या में प्रवेश करता है, तब समय मानो अपनी चाल बदल लेता है। जो बचपन कभी अतीत की धुंध में विलीन प्रतीत होता था, वही अचानक स्मृतियों के द्वार पर दस्तक देने लगता है, बिल्कुल वैसा ही सरल, वैसा ही निष्कलुष, जैसा वह कभी था। तब प्रतीत होता है कि जीवन कोई सीधी रेखा नहीं, बल्कि एक पूर्ण वृत्त है और जैसे-जैसे हम अंत की ओर बढ़ते हैं, आरंभ उतना ही समीप आता जाता है।

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वृद्धावस्था किसी रिक्तता का नाम नहीं, बल्कि यह तो वह शांत आंगन है, जहां स्मृतियां धूप बनकर फैल जाती हैं। वहीं बैठकर आत्मा बिना हड़बड़ी और बिना छल के अपने संपूर्ण जीवन-पथ को निहारती है। यह वह क्षण होता है, जब जीवन अपने अर्थ स्वयं प्रकट करता है। इन्हीं एकांत घड़ियों में, ‘मां’ की छवि किसी जलते हुए दीये की भांति सबसे अधिक दीप्तिमान हो उठती है। मां, जिसकी गोद संसार की सबसे सुरक्षित शरणस्थली थी। उसके हाथों की गर्मी, लोरी, और आंखों में छिपी नि:स्वार्थ चिंता-ये स्मृतियां जीवन की सारी थकान को चुपचाप हर लेती हैं। जब शरीर साथ छोड़ने लगता है, तब मां की यादें मन को थाम लेती हैं, जैसे अदृश्य हाथ सहारा दे रहे हों।
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समय ने हमें व्यवहारकुशल अवश्य बनाया, किंतु कहीं न कहीं हमारी मासूमियत (बचपना) पीछे ही छूट गई। और आश्चर्य यह है कि वृद्धावस्था में वही मासूमियत पुनः द्वार खटखटाने लगती है। यह जीवन का वह चरण है, जहां बाहरी दौड़भाग थम जाती है तथा सफलता व असफलता के तराजू बदल जाते हैं। अब मूल्य इस बात का नहीं रहता कि हमने क्या अर्जित किया, बल्कि इसका होता है कि हमने किससे प्रेम किया, किसके लिए जिया, और किन स्मृतियों को अपने हृदय में सहेज कर रखा।

इस अवस्था में यह बोध गहराता है कि मां केवल एक संबंध नहीं, बल्कि संपूर्ण संसार होती है। और बचपन कोई बीता हुआ कालखंड नहीं, बल्कि वह भावना है, जो समय के साथ पीछे छूट तो जाती है, पर कभी खत्म नहीं होती। वृद्धावस्था उसी भावना को पुन: जीवित करने का अवसर प्रदान करती है।

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