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विश्लेषण: चीन में दो शीर्ष जनरलों की बर्खास्तगी का असली मतलब क्या है?
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सार
चीन में दो शीर्ष जनरलों- झांग योउशिया और लियू झेनली की बर्खास्तगी को सिर्फ एक अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में देखना अधूरी व्याख्या होगी। इस घटनाक्रम को चीन की आंतरिक राजनीति, सैन्य रणनीति और भविष्य की दिशा तीनों के संदर्भ में एक साथ पढ़ना जरूरी है।
भ्रष्टाचारियों के खिलाफ शी जिनपिंग का एक्शन जारी
- फोटो : ANI
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विस्तार
चीन की राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी बड़े फैसले का अर्थ उसके आधिकारिक बयान से कहीं आगे जाकर समझना पड़ता है। दो शीर्ष जनरलों की बर्खास्तगी को सिर्फ एक अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में देखना अधूरी व्याख्या होगी। यह घटनाक्रम उस सत्ता-संतुलन की ओर इशारा करता है, जिसमें शी जिनपिंग बीते एक दशक से सेना को न केवल पेशेवर, बल्कि पूरी तरह व्यक्तिगत और राजनीतिक रूप से वफादार संस्थान में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
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ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या यह कदम किसी वास्तविक अनुशासनहीनता का नतीजा है या फिर भविष्य की संभावित चुनौतियों से पहले सैन्य नेतृत्व को पूरी तरह पुनर्गठित करने की रणनीति?
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इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय सामरिक विश्लेषकों और चीन मामलों के विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यप्रणाली में नेतृत्व परिवर्तन या बर्खास्तगी अक्सर तभी सामने आती है जब अंदरूनी स्तर पर लंबे समय से मंथन हो चुका होता है। लेकिन इस मामले में तेजी, गोपनीयता और शीर्ष स्तर पर खालीपन यह संकेत देता है कि मामला सामान्य भ्रष्टाचार जांच से आगे का हो सकता है।
यह भी संभव है कि शी जिनपिंग सेना के भीतर किसी भी तरह के वैकल्पिक शक्ति-केंद्र को खत्म करने की अंतिम अवस्था में हों। खासतौर पर ऐसे समय में जब चीन ताइवान, दक्षिण चीन सागर और अमेरिका के साथ रणनीतिक टकराव के दौर में है।
नई नियुक्तियों के दूरगामी अर्थ
आने वाले समय में यह भी देखा जाना चाहिए कि शी जिनपिंग इन रिक्त पदों को तुरंत भरते हैं या जानबूझकर खाली रखते हैं। यदि नियुक्तियां टलती हैं, तो यह संकेत होगा कि वे व्यक्तिगत नियंत्रण को और मजबूत करना चाहते हैं। वहीं, यदि नई नियुक्तियां होती हैं, तो यह इस बात का संकेत होगी कि पीएलए के भीतर एक नई, अधिक वफादार और राजनीतिक रूप से विश्वसनीय पीढ़ी को आगे लाया जा रहा है।
यही वजह है कि इस घटनाक्रम को चीन की आंतरिक राजनीति, सैन्य रणनीति और भविष्य की दिशा तीनों के संदर्भ में एक साथ पढ़ना जरूरी है।
योउशिया और झेनली कौन थे और उनका हटना क्यों असाधारण है?
झांग योउशिया अक्टूबर 2022 से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सबसे वरिष्ठ जनरल थे। वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 24 सदस्यीय पोलितब्यूरो में सबसे उच्च रैंकिंग सैन्य प्रतिनिधि थे और केंद्रीय सैन्य आयोग के वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में सेना पर वास्तविक नियंत्रण रखते थे।
वहीं, लियू झेनली पहले पीएलए ग्राउंड फोर्स के कमांडर रह चुके थे और हाल के समय में केंद्रीय सैन्य आयोग के जॉइंट स्टाफ डिपार्टमेंट का नेतृत्व कर रहे थे, जो सैन्य अभियानों की योजना और समन्वय की रीढ़ माना जाता है। इन दोनों का एक साथ हटना चीन की सैन्य कमान में असामान्य शून्य पैदा करता है।
शी जिनपिंग की स्थिति: मजबूत या असहज
चीनी प्रणाली में पीएलए सीधे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधीन है और पार्टी पर अंतिम नियंत्रण शी जिनपिंग का है, जो एक साथ राष्ट्रपति, पार्टी महासचिव और केंद्रीय सैन्य आयोग के अध्यक्ष हैं। झांग और लियू की बर्खास्तगी के बाद केंद्रीय सैन्य आयोग में सक्रिय रूप से सिर्फ शी जिनपिंग और जनरल झांग शेंगमिन बचे हैं।
2024 के बाद से आयोग के तीन अन्य सदस्य भी हटाए जा चुके हैं और उनकी जगह नई नियुक्तियां नहीं हुई हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सेना का नियंत्रण अभूतपूर्व रूप से केंद्रीकृत हो गया है, जो ताकत भी दर्शाता है और संस्थागत असंतुलन भी।
भ्रष्टाचार नहीं, मामला उससे कहीं आगे
पिछले कुछ वर्षों में पीएलए के भीतर भ्रष्टाचार और सैन्य खरीद से जुड़े मामलों में कई वरिष्ठ अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है। 2022 के बाद से लगभग दो दर्जन शीर्ष सैन्य अधिकारी जांच या बर्खास्तगी का सामना कर चुके हैं, खासकर मिसाइल, अंतरिक्ष और तकनीकी शाखाओं में।
झांग और लियू का मामला अलग इसलिए है क्योंकि उनके खिलाफ कार्रवाई तेज रही और कोई सार्वजनिक चेतावनी नहीं दिखी। दोनों अधिकारी एक महीने पहले तक सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रिय थे।
जासूसी के आरोप ने मामले को और गंभीर बनाया
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार झांग योउशिया पर चीन के परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी अमेरिका को देने का आरोप है। साथ ही उन पर रिश्वत लेने और राजनीतिक गुट बनाने के भी आरोप लगाए गए हैं। यदि ये आरोप साबित होते हैं, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सबसे गंभीर संकट माना जाएगा। इसी संदर्भ में इस कार्रवाई की अचानकता और कठोरता को देखा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां और वास्तविकता
बीबीसी और ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन जैसी संस्थाओं ने इसे सैन्य संकट और अभूतपूर्व शुद्धिकरण के रूप में पेश किया। लेकिन चीन की आंतरिक राजनीति और नेतृत्व संबंधों की अपारदर्शिता को देखते हुए ऐसे निष्कर्षों पर पहुंचना फिलहाल जल्दबाजी माना जा रहा है। उपलब्ध तथ्यों से सिर्फ इतना स्पष्ट है कि चीनी नेतृत्व सेना के भीतर निष्ठा, नियंत्रण और अनुशासन को लेकर बेहद संवेदनशील स्थिति में है।
ऑपरेशन सिंदूर और चीनी हथियारों की विश्वसनीयता पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम को व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हालिया भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को दिए गए चीनी हथियारों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठे हैं। भारतीय सैन्य कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए कई चीनी मूल के हथियार और प्रणालियां अपेक्षित असर नहीं दिखा पाईं।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इससे न सिर्फ पाकिस्तान की सैन्य क्षमता उजागर हुई, बल्कि चीन के हथियार निर्यात मॉडल और उनकी युद्ध-परीक्षित विश्वसनीयता पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई। यह पहलू ऐसे समय सामने आया है जब चीन अपनी सैन्य तकनीक को वैश्विक बाजार में अमेरिका और पश्चिमी देशों के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।
यह दो व्यक्तियों का पतन नहीं व्यवस्थागत विफलता है
झांग योउशिया और लियू झेनली की बर्खास्तगी को सिर्फ दो व्यक्तियों के पतन के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह कदम चीन की सेना के भीतर गहरे अविश्वास, अत्यधिक केंद्रीकरण और रणनीतिक असहजता की ओर इशारा करता है। साथ ही, बाहरी मोर्चों पर चाहे हथियारों की विश्वसनीयता हो या वैश्विक शक्ति संतुलन, चीन को लगातार सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
असली तस्वीर आने वाले महीनों में साफ होगी, जब यह दिखेगा कि यह शुद्धिकरण पीएलए को मजबूत करता है या उसके भीतर छिपी कमजोरियों को और उजागर करता है।
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